अरेंज मैरिज बनाम लव मैरिज

पहले माता-पिता अपने बच्चों के लिए अपनी ही बिरादरी में कोई रिश्ता ढूंढ लेते थे लेकिन अब उनके बच्चे गैरबिरादरी में से किसी को भी पसंद कर प्रेम विवाह रचा लेते हैं। आज के युवक-युवतियां आजाद ख्यालों के हैं। वे धर्म, जाति, बिरादरी इन सबमें विश्वास नहीं रखते मगर फिर भी सबके अलग-अलग विचार हैं। जहां आज लव मैरिज उनकी पसंद है, वहीं कुछ अरेंज मैरिज में ही विश्वास रखते हैं।
इसी बीच कुछ शादियां लव-कम-अरेंज भी हो रही हैं। जमाना है, बदलता रहता है मगर माता-पिता के ख्याल नहीं बदलते। चाहे माता-पिता खुद लव-मैरिज से बंधे हों लेकिन वे अपनी संतान का विवाह अपनी इच्छा से ही करना पसंद करते हैं। इसके विपरीत कुछ माता-पिता अपने बच्चों को प्रेम-विवाह की खुली छूट भी देने लगे हैं। विवाह चाहे कैसा भी हो लेकिन सवाल उठता है कि सफल विवाह कैसा होता है?
अरेंज शादियों में वर-वधू दोनों एक-दूसरे से अनजान होते हैं। एक दूसरे को समझने में उन्हें अपनी शादी का पहला वर्ष तक लग जाता है। हालांकि इन शादियों में माता-पिता कई बार लड़के-लड़की को शादी से पूर्व मिलने की इजाजत दे देते हैं लेकिन इतनी जल्दी वे एक-दूसरे को फिर भी नहीं जान पाते। सिर्फ एक-दूसरे की पसंद नापसंद तक ही पहुंच पाते हैं और इसी बीच उनकी शादी हो जाती है जबकि लव मैरिज में लड़का-लड़की एक-दूसरे को पहले से ही जानते हैं। उनका प्रेम कुछ माह पूर्व ही शुरू हुआ हो या वे कई वर्षों के प्रेमी हों, वे एक-दूसरे से पूरी तरह वाकिफ होते हैं। शादी के बाद उन्हें एक-दूसरे को समझने में समय नहीं गवाना पड़ता मगर हां, जिंदगी की सच्चाई और सपनों के बीच का अंतर जरूर उनकी समझ में आ जाता है।
माता-पिता द्वारा तय शादी का रूप थोड़ा अनोखा होता है। वर-वधू दोनों के लिए सब कुछ नया होता है। उनके बीच प्रेम भी बिना किसी शर्त के पनपता है। दोनों का एक-दूसरे के लिए कुछ नया करना, नई-नई जगहों पर साथ घूमना जबकि प्रेम-विवाह में दोनों पहले काफी घूम चुके होने के कारण अपनी घर-गृहस्थी के बंधन को ज्यादा एन्जॉय करते हैं लेकिन तस्वीर का यह रूख सिर्फ उन्हीं दंपतियों के लिए है जो अपनी शादी को हर हाल में खुश रखने को तैयार होते हैं। यह कहना मुश्किल है कि असफलता लव मैरिज में हासिल होगी या अरेंज मैरिज में क्योंकि यह निर्भर करता है उन दोनों की प्रकृति पर।
माना जाता है कि प्रेम विवाह अधिक सफल नहीं हो पाते क्योंकि उसमें पति-पत्नी का अहम् आड़े आ जाता है। कई वर्षो का शादी से पूर्व किया गया उनका प्रेम शादी की हकीकत के सामने कमजोर पड़ जाता है। शादी पति-पत्नी में से किसी एक के सहारे सफल नहीं हो सकती। इसे चलाने के लिए दोनों का साथ-साथ आगे बढ़ना बहुत जरूरी होता है। यदि एक भी पीछे छूट जाता है तो दूसरा उसे क्या, अपनी गृहस्थी को भी खो बैठता है।
शादी के बाद लड़के समझते हैं कि उनकी पत्नी घर पर ही रहे, कहीं आये जाये नहीं या नौकरी न करे। कहीं वह उनसे आगे न निकल जाये। फिर दुनियां क्या कहेगी। यहां पति का अहंकार पत्नी के आड़े आता है लेकिन पत्नी जिद्दी हो तो उसका भी अहंकार जाग जाता है और उनकी शादी के लिए खतरा उत्पन्न हो जाता है।
कभी-कभी पत्नी में ज्यादा ईगो आ जाती है या वह अपने पति को विवाह से पहले की तरह प्यार न करने पर उल्टी सीधी बातें सुनाने लगती है। इससे भी उनके बीच में कलह होने लगता है। इसके अलावा यह देखा जाता है कि प्रेम-विवाह माता-पिता की मर्जी के खिलाफ ही होते हैं और माता-पिता उन दोनों को अपनी आंखों के सामने देखना भी पसंद नहीं करते। अपने-अपने मां-बाप के ठुकराये ये दंपति प्रेम-विवाह के बाद अधिकतर आर्थिक संकट में फंस जाते हैं जिस कारण उनमें तनाव रहने लगता है अन्यथा वे गलत रास्तों पर चलने लगते हैं।
लेकिन वे जो मां-बाप की इच्छा से विवाह बंधन में बंधते हैं और एक दूसरे से अंजान होते हैं, कभी-कभी वे एक-दूसरे को समझने में नाकामयाब रहते हैं या समझते हैं तो एक-दूसरे को सिर्फ गलत। एक-दूसरे की उम्मीदों पर खरा न उतर पाना उनके वैवाहिक जीवन की कमजोरी बनता चला जाता है। यदि एक गलतफहमियां बढ़ाता चलता है तो दूसरा भी उसमें उलझकर रह जाता है। इनके बीच भी ईगो विकसित हो जाती है।
पति के अपनी पत्नी को बात-बात पर ताने देने या अपने परिवार वालों के साथ मिलकर उसको बुरा-भला कहने से पत्नी भी अपने पति के साथ एडजस्ट नहीं हो पाती। उसे पति के बेरूखे व्यवहार से खीझ हो जाती है और वह भी समझने को तैयार नहीं होती।
ऐसी शादियां इंसान के मन को दहशत से भर देती हैं। इसलिए कुछ लड़के-लड़कियां यह सोचते हैं कि वे शादी न ही करें तो बेहतर है। सभी के साथ ऐसा नहीं होता। प्रेम-विवाह हो या माता-पिता द्वारा कराया गया विवाह, समझौते सभी में करने पड़ते हैं।
अपनी कहो और उसकी सुनो, यह फलसफा अपनाना चाहिए। कभी भी अपने साथी से उसका दिल तोड़ने वाली बात नहीं कहनी चाहिए। उसकी कोई बात बुरी लगे तो उस पर प्रश्नचिन्ह लगाकर उसी से पूछ लेना चाहिए। अपने दिल में कोई बात नहीं रखनी चाहिए। उसके सामने किसी दूसरे की तारीफे नहीं करनी चाहिए।
प्यार को जताना जरूर चाहिए। उसे छिपाकर अपना और अपने साथी का सपना मत टूटने दीजिए। प्रेम विवाह किया हो या अरेंज, उसको निभाना चाहिये। यह एक जिम्मेदारी है जिसमें अनेकों जिम्मदारियां निहित हैं। एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र करें । एक-दूसरे का मजाक न बनायें। एक-दूसरे के हंसने पर बुरा न मानें। छोटी-छोटी बातों को दिल से न लगायें।
देखिए अपने माता-पिता को, वो कितने खुश हैं। देखिए अपने दोस्तों की विवाहित जिंदगी को, वे भी खुश हैं। जो खुश नहीं हैं वो कमजोर हैं और जो खुश हैं, उन्होंने बहुत समझौते किये हैं। जरूरी नहीं कि आपको पता चले। आप अपने ढंग से अपनी शादी को सफल बनाइये। (उर्वशी)

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