ईश्वर की कृतियां

एक बार एक किसान के घर में रखे बर्तनों में कांसे की बनी थाली और अल्यूमीनियम के कटोरे में वार्तालाप हो गया।
थाली ने कहा, ‘मैं तुमसे बड़ी हूं, क्योंकि मैं कांसा धातु की बनी हूं, तुमसे ज्यादा कीमती हूं तथा रसोईघर में मेरा अधिक महत्त्व है। तुम जैसे तीन-चार कटोरों का सामान अकेले मैं रखने के काम आ सकती हूं तथा लोग मुझ में पूरा खाना परोस कर खाते हैं। तुम क्या हो? छोटे से कटोरे, ज्यादा से ज्यादा तुम में सब्जी या चटनी रखकर खायी जा सकती है। थाली को अपनी महत्ता पर बहुत घमंड था।
कटोरे ने जवाब दिया, ‘ठीक है, यदि आप मुझ से श्रेष्ठ हैं तो ईश्वर ने हमको भी हमारी कार्यक्षमता प्रदान की है। मैं भी मनुष्य के उपयोग में आता हूं।Ó
थाली ने कहा, ‘मैं तुमसे अधिक श्रेष्ठ हूं तथा तुम मुझसे बहुत छोटे हो।
बेचारा कटोरा मन मसोसकर रह जाता। वह सोचता कि मेरे उपयोग के बाद मेरा क्या होगा? हमारा अस्तित्व इस संसार में रहेगा या मिट जाएगा या कि मैं गलवाकर पुन: नए कटोरे या अन्य बर्तन में ढाल दिया जाऊंगा। यही सोचकर उसके मन में ऊहापोह मची थी।
जब हमारा मन बहुत व्यथित होता है तब हमें आखिरी अवलम्ब ईश्वर होता है, अत: कटोरे ने भी अपना भाग्य ईश्वर पर छोड़ दिया। कटोरे ने सुना था कि ईश्वर से सच्ची श्रद्धा एवं विश्वास रखने से मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाती है। अब भला कटोरा बेचारा किस रूप में ईश्वर की भक्ति करता? फिर भी उसने अपने मन में संतोष, ईश्वर के प्रति श्रद्धा एवं विश्वास बनाए रखा।
रसोईघर में दोनों थाली एवं कटोरे के दिन बीतते गए। कुछ दिनों के बाद कटोरा रसोईघर से निकाल दिया गया परंतु थाली रसोईघर के काम आती रही। कटोरे को कबाडख़ाने में डाल दिया गया परंतु उसने ईश-श्रद्धा नहीं त्यागी।
एक दिन किसान का बेटा खेलने के लिए उस कटोरे को उठा ले गया। खेलते-खेलते वह उसे अपने खेत में फेंक आया। कटोरा विपरीत परिस्थितियों में वहीं खेत में पड़ा रहा। ऋतु बदली, समय बीता। बरसात का मौसम आया। बरसात के बाद किसान को अपने खेत को जोतकर फसल बोनी थी। किसान खेत जोतने गया। उसे खेत जोतते समय वही कटोरा मिल गया, उसने उठाया और पुन: अपने घर ले आया।
थोड़े दिनों के बाद उस किसान के गांव में एक मूर्तिकार आया जो धातुओं को गलाकर मूर्तियां एवं अन्य पात्र बनाता था। किसान ने सोचा कि यह कटोरा तो बेकार है, इसका कोई उपयोग नहीं है। इसे गलवाकर कोई मूर्ति बनवा लूं। यही सोचकर किसान उसे लेकर मूर्तिकार के पास गया और उससे कोई मूर्ति बनाने के लिए कहा। मूर्तिकार ने उस कटोरे को लेकर भट्टी पर गलाया तथा शिवजी की मूर्ति के रूप में ढाल दिया।
अब कटोरा शिव प्रतिमा का रूप धारण कर चुका था। अब उसे भाग्य पर संतोष था। शिवजी ने उसे श्रद्धा एवं संतोष का फल प्रदान किया था। किसान प्रतिदिन उस कटोरे, जो शिव रूप में परिवर्तित हो चुका था की, पूजा करता था। थाली में फूल, सुगंध, नैवेद्य तथा अन्य पूजन सामग्री रखी जाती थी। ईश्वर ने अब दोनों पात्रों की पात्रता यथोचित निर्धारित कर दी थी।
थाली अब शिव रूप में कटोरे की पूजा करवाने में साथ देती थी। अब उसकी समझ में आ गया था कि ईश्वर अपनी कृतियों को यथोचित रूप प्रदान करते हैं तथा ईश्वर की सभी कृतियों की इस जगत में अलग-अलग महत्ता है। इसलिए किसी तुच्छ प्राणी की उपेक्षा एवं स्वयं पर घमंड नहीं करना चाहिए। ————  (उर्वशी)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *