उत्तर पूर्व दिशा में बना शयनकक्ष दांपत्य जीवन में देता है परेशानी

** पं. श्रीनिवास शर्मा
वास्तु शास्त्र के अनुसार उत्तर पूर्व (ईशान) दिशा को पूजा के लिए उत्तम माना जाता है क्योंकि कहा जाता है कि भगवान शिव का एक नाम ईशान है तथा वास्तु में इसका स्थान उत्तर पूर्व के मध्य माना गया है, इसलिए वास्तु शास्त्रियों का ऐसा मानना है कि जिस बीथीओ की ईशान दिशा बड़ी हो, वह अति उत्तम होती है। जिन बीथीओ में ईशान दिशा कटी होती है वह मकान अशांति का कारण तथा अनेक प्रकार की आपत्तियों का केन्द्र होता है इसलिए इस दिशा में शौचालय आदि का बनाना भी अनेक प्रकार की आपत्तियां देने वाला बन जाता है।
वास्तुशास्त्रियों का ऐसा मत है कि ईशान दिशा में कभी भी दंपतियों को अपना शयनकक्ष नहीं बनाना चाहिए क्योंकि इस दिशा में शयन करने से दांपत्य जीवन में अनेक प्रकार की परेशानियां आने लगती है तथा पितर भी रूष्ट रहते हैं। वहां पूजा स्थल होने के कारण शयन करने से देव की अप्रसन्नता साथ-साथ बनी रहती है, इसलिए वहां भूलकर भी शयन नहीं करना चाहिए।
दूसरी ओर इस दिशा में विद्यार्थियों के लिए अध्ययन कक्ष, पूजा स्थल आदि बनाना अति उत्तम माना जाता है। इस दिशा में पानी के स्रोत आदि को अच्छा माना जाता है। कहा जाता है कि किसी भी भवन से अगर ईशान दिशा से पानी निकलता है तो उस घर में साक्षात लक्ष्मी का वास होता है। इसके साथ साथ उत्तर पूर्व व ईशान दिशा में भूलकर भी भारी सामान नहीं रखना चाहिए क्योंकि इस दिशा के भारी हो जाने से परिवार के लोगों में श्रद्धा और प्रेम की कमी हो जाती है तथा वे अपनी मनमानी करने लगते हैं।
अनेक वास्तुशास्त्रियों का ऐसा मानना है कि ईशान दिशा के भारी हो जाने से रोगों की वृद्धि हो जाती है इसके साथ-साथ परिवार से अनेक वस्तुओं के खो जाने पर परिवार में चोरी होने की पूर्ण सम्भावना बनी रहती है। ————– (उर्वशी)




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