एडजस्टमेंट कहां तक

शादी के बाद पति-पत्नी एक नये जीवन की शुरूआत करते हैं। लड़की के लिए ससुराल का वातावरण नया होता है। नया घर, नई जगह, नये लोग जिनकी आदतें, खान-पान, रहन-सहन उसके मायके वालों से भिन्न होते हैं। जिस तरह लड़की के दिल में विवाहित जीवन को लेकर कई अरमान होते हैं उसी तरह ससुराल वालों के मन में भी बहू को लेकर कई आशाएं होती हैं जिनके पूरा न होने पर उनमें असंतोष जागता है जो धीरे-धीरे बहू और उनके बीच कलह का कारण बन जाता है।
ये आशाएं अगर सामान्य नैतिक और संभावनापूर्ण हैं तो लड़की को चाहिए कि वह उन्हें अनुमानित कर समझकर उन्हें पूर्ण करने की कोशिश करे बशर्ते इससे उसकी स्वयं की अस्मिता पर कोई आंच न आती हो, उसका शोषण न होता हो। उसकी थोड़ी सी सहनशीलता और समझदारी तथा थोड़ा सा सद्व्यवहार माधुर्य और शिष्टता उसके ससुराल वालों का मन मोह लेगी।
विनम्र होना सीखें। घमण्डी और अहंकारी स्त्री को कोई पसंद नहीं करता। हर वक्त अपने मुंह से अपनी बढ़ाई करने की आदत कभी न डालें। इससे आप सिर्फ अपने को हंसी का ही पात्र बनायेंगी। अच्छे गुण स्वभाव प्रतिभा फूलों की खुशबू की तरह छुपे नहीं रहते। वे बगैर आपके ढिंढोरा पीटे ही अपना प्रचार स्वयं करेंगे।
घमण्डी और अहंकारी व्यक्ति का किसी के साथ भी तालमेल नहीं बैठता। खासकर कोई भी पति ऐसी पत्नी के साथ खुश नहीं रह सकता। हो सकता है अपनी दब्बू प्रकृति या सीधेपन के कारण बेचारी पत्नी को एडजस्ट कर ले और चुपचाप अपना अपमान सहन कर ले लेकिन ऐसा कुछ ही समय तक संभव होगा। कभी न कभी उसकी भीतर की भड़ास निकलेगी और तब तक शायद स्थिति संभालनी मुश्किल हो जाए या फिर वह किसी दूसरी स्त्री के चक्कर में पड़ जाए। इस तरह आप अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेंगी।
प्यार की मीठी नोक-झोंक, रार-तकरार का पति-पत्नी के बीच अपना मजा है। इससे जिंदगी में ऊब नहीं होती तथा एकरसता टूटती है किंतु यह हमेशा मर्यादा में हो, सीमा में रहे, वही अच्छा है। नोक-झोंक करते हुए पति को औरों के सामने नीचा कभी न दिखायें। यह कुदरती बात है कि लोक व्यवहार में स्त्री-पुरूष से ज्यादा चतुर होती है। इसको अपना बहुत बड़ा गुण समझकर पति को बेवकूफ या बुद्धू साबित करने की कोशिश न करें क्योंकि प्रकृति बैलेंस बराबर रखती है।
अगर वे भी अपने गुणों का डंका बजाकर आपको नीचा दिखाने की कोशिश करें तब।
पति की कमजोरियां अगर इतनी गंभीर नहीं कि जिससे आपका घर तबाह हो रहा हो तो उन्हें नजर अंदाज कर उनके गुणों पर ध्यान देना सीखें। कमजोरियों की तरफ प्यार से, टैक्ट से इंगित किया जा सकता है। उनका मजाक कभी न उड़ायें। हर घर की अपनी कुछ निजी बातें ऐसी होती हैं जिन्हें औरों को नहीं बताया जा सकता। उससे घर की इज्जत पर आंच आ सकती है। ऐसी बातों का जिक्र आप किसी ओर से तो क्या, मायके वालों तक से भी न करें, इसी में समझदारी है।
बढ़ती महंगाई के कारण घर खर्च चलाने के लिए आज स्त्री पुरूष दोनों का ही नौकरी करना आवश्यक सा हो गया है। ऐसे में हम भी कमाती हैं, फिर किसलिए हम स्वचालित सी घरवालों के आदेशों का पालन करें’ की भावना किसी भी नारी के घर की शांति के लिए खतरे की घंटी है। माना कि बाहर काम करके आने के पश्चात कोई भी नारी थकान महसूस करती है लेकिन यह भी सही है कि एक लाटसाहबी वाले रूख को नहीं अपनाया जाए। घर का काम तो सबको मिलजुल कर ही करना है। यह किसी एक की ही जिम्मेदारी नहीं।
यह एक शाश्वत सत्य है कि ताली सिर्फ एक हाथ से नहीं बजती। सिर्फ पत्नी ही अपने को औरों के अनुरूप ढालती रहे, यह संभव नहीं। अगर संयुक्त परिवार है तो घरवालों को भी उसके साथ एडजस्ट करने की आवश्यकता है। उसे ‘मेम साहब चल दी बन ठन के, हम ही रह गये घर की नौकरी बजाने कोÓ इस तरह की बात कहकर आहत न किया जाये। वह बेचारी कहीं मौज मजे के लिए तो जा नहीं रही। बाहर मुड़े-तुड़े कपड़ों में जैसे-तैसे तो निकला नहीं जाता। फिर बनने ठनने का ताना किस लिए।
अगर पुरूष को ऑफिस से आते ही गर्म-गर्म चाय, नाश्ता देकर, मुस्कुराकर उसका स्वागत किया जाता है तो बेचारी बहू को ठंडी-ठंडी खा जाने वाली व्यंग्य मिश्रित निगाहों से क्यों देखा जाता है। क्या दिन भर की थकान के बाद उसका मन नहीं होता कि स्नेह से कोई एक प्याला गर्म चाय-कॉफी पकड़ा दे। उसके बाद तो उसे गृहकार्यों में लगना ही है लेकिन थोड़े से आराम की भी क्या वो हकदार नहीं कि जिसके लिए उसे ताने दिये जायें।
हमारे परिवारों में परंपरा से यही धारणा चली आ रही है कि बहू नाम के जीव की अपनी कोई अहमियत कोई चाह नहीं। वह सिर्फ औरों की सुविधा के लिए है। आर्थिक परतंत्रता के दिनों में तो फिर भी वह बात समझ में आती थी लेकिन आज जब कि वह पुरूष के बराबर शिक्षित है और बराबर का कमा रही है तब भी पुरानी अवमानना को ढोती रहे, यह कहां का न्याय है।
अन्याय तो तब भी था लेकिन आज तो उसकी तीव्रता और बढ़ गई है। अगर ससुराल वाले आज भी इसी मानसिकता के गुलाम हैं तो ऐसी स्थिति में लड़की को दबने की आवश्यकता नहीं। उसे स्पष्टवादी होकर अपनी अहमियत जता देनी चाहिए।
एडजस्ट वहीं तक करें जहां तक ससुराल वाले सीमा में हैं। अगर वे सीमा का अतिक्रमण करने लगें और पति महोदय भी उन्हीं का साथ देने लगें तो तलाक से भी न हिचकिचाएं क्योंकि जिंदगी से बड़ी और कोई चीज नहीं।
हो सकता है सीमा का अतिक्रमण करने वाले आपको जलाकर मार दें या ऐसे हालात पैदा कर दें जिससे आत्महत्या के सिवाय आपके पास कोई ओर चारा न रहे। ऐसी परिस्थितियों में एडजस्टमेंट की बात लड़की के लिए बेमतलब साबित होगी।
———–उषा जैन ‘शीरीं




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