कहानी एक पत्ते की

एक था पत्ता। वह एक पेड़ पर रहता था। पेड़ का तना बहुत मोटा था। पत्ते का घर पेड़ की एक डाल पर था। उस पेड़ पर और भी बहुत से पत्ते रहते थे। सभी के घर डालों पर थे। कुछ पत्ते बूढ़े थे। कुछ अभी नन्हे बच्चे थे। तेज हवा चलती तो बूढ़े पत्ते नीचे गिर जाते परंतु नन्हे पत्ते हमेशा डाल से चिपके रहते थे।
पत्तों के घर दिन-पर-दिन बड़े होते जाते थे। पेड़ों की डालें बढ़ रही थीं। पत्तियां भी उन्हीं डालों पर रहती थीं। पत्ते-पत्तियां अपने-अपने घरों में बैठे एक दूसरे से बातें करते थे। वे कभी इशारों से बातें करते, कभी खुसुर-पुसुर करते। रोज बहुत सारे लोग उस पेड़ के पास से गुजरते। पत्तों की आवाज उनके कानों में पड़ती परंतु उनकी भाषा मनुष्यों की समझ में नहीं आती थी। जब तेज हवा चलती तो पत्तों को झूम-झूमकर बातें करने में और भी आनंद आता।
एक दिन पत्ते ने सोचा, ‘आज मैं दूसरे पत्ते के घर जाऊंगा।‘ वह दूसरे पत्ते के घर जाने की तैयारी करने लगा। दूसरे पत्ते का घर सामने वाली डाल पर था। पत्ता उसके घर जाना चाहता था परंतु डाल उसे छोड़ नहीं रही थी। उसने बहुत जोर लगाया पर बात नहीं बनी।
सूरज डूब गया था। आज वह पत्ता बहुत थक गया था। उसकी नसों में दर्द हो रहा था। बहुत नींद आ रही थी। शीघ्र ही उसकी आंखें अपने आप बंद हो गईं और वह नींद में डूब गया।
दूसरे दिन फिर पत्तों की खुसुर-पुसुर और इशारेबाजी शुरू हो गई। वह पत्ता भी उनमें शामिल था। दूसरे पत्ते ने उसे बुलाया। पत्ता उसकी बात समझ गया परंतु अपना घर कैसे छोड़ता। डाल उसे जाने नहीं देती थी। पत्ते ने जोर लगाया। डाल ने उसे नहीं छोड़ा। आज फिर पत्ता थककर चूर हो गया था।
तीसरे दिन उसने फिर दूसरे पत्ते के पास जाने की कोशिश की। वह कमजोर हो गया था। थोड़ा मुरझा भी गया था। आगे से सूखने भी लगा था। ताकत तो बहुत कम रह गई थी। मामूली-सा जोर लगाया। अचानक डाल से अलग हो गया। अब वह दूसरे पत्ते के घर जा सकता था, सामने वाली डाल पर पर अब तो वह कुछ कर ही नहीं पा रहा था। अपने आप ही निचली डाल पर आ गिरा। वहां दो पत्तों ने उसे संभाल लिया इसलिए चोट नहीं लगी, लेकिन अब वह पत्ता न इशारे कर सकता था, न कुछ बोल ही सकता था। वह अपनी भाषा भूल गया था।
चौथे दिन वह पत्ता बिलकुल मुरझा गया था। उसका हरा रंग उड़ गया था। पीला पड़ते-पड़ते वह सूखता जा रहा था। अब तो उससे कुछ सोचा भी नहीं जाता था।
पांचवें दिन पत्ता लगभग सूख चुका था। उसका घर तो ऊपर की डाल पर था। दूसरे पत्ते का घर ऊपर सामने वाली डाल पर था। अब तो यह पत्ता सब कुछ भूल गया था। दूसरे पत्ते ने नई दोस्ती कर ली थी। गिरे हुए पत्ते को अब उन दो पत्तों के लिए संभालना मुश्किल हो रहा था। वह उनके हाथों से छूटने लगा था। उन दो पत्तों ने भी इस पत्ते को नीचे गिरने से बचाने की कोशिश नहीं की। हवा तेज हुई। पत्तों की खुसुर-पुसुर भी बढ़ गई। इतने में वह पत्ता जमीन पर आ गिरा।
सब सूखे पत्ते जमीन पर पड़े थे। वहां किसी का घर नहीं था। बेघर, इधर- उधर बिखरे पड़े थे। न कोई बात करता था, न इशारे। उन्हें भूख-प्यास भी नहीं लगती थी। न दिन-रात का पता था। लोग भी उन्हें कुचल देते थे। वह पत्ता अभी तक कुचला नहीं गया था। एकदम जैसे सूख गया था।
छठे दिन सवेरे-सवेरे माली आया। वह रोज नीचे से सूखे पत्ते साफ करता था। पेड़ों से उसकी गहरी मित्राता थी। वह डाल के पत्तों की बातें भी समझता था। पत्तों को कितनी भूख लगी है, कितनी प्यास लगी है सब समझता था। वही तो उन्हें खिलाता-पिलाता था। उनके घरों की देखभाल करता था परंतु सूखे पत्ते तो बोलना भूल गए थे इसलिए माली उनसे कैसे बातें करता?
वह रोज सूखे पत्तों को झाड़ू से जमा करके एक जगह रख देता। फिर अंदर से टोकरी लाता। उसमें सारे सूखे पत्ते भरकर फेंकने को आता। झाडू लगाते और टोकरी में भरते समय पत्ते कुचल और मसल जाते। बहुत सूखे पत्ते तो वहीं टूट भी जाते थे।
आज भी माली ने रोज की तरह झाडू लगाया। कल शाम तेज हवा चली थी और रात को आंधी भी आई थी। इसलिए बहुत सारे पत्ते नीचे गिर गए थे। उनमें बूढ़े पत्ते बहुत अधिक थे। कुछ हरे पत्ते भी हरी डालियों के साथ नीचे आ गिरे थे परंतु उनमें से कोई भी न बोल सकता था, न इशारे कर सकता था। माली ने सभी को टोकरी में सूखे पत्तों के साथ जमा किया और फेंकने चल दिया।
ऊपर की सामने वाली डाल का वह दूसरा पत्ता भी इसी टोकरी में था। रात की आंधी में वह भी गिर गया था, परंतु वे दोनों पत्ते चुप पड़े थे।
——— (उर्वशी)
——- नरेन्द्र देवांगन

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