क्या अंक प्रतिशत ही हो गया है अब शिक्षा का ध्येय

हर कृत्य की एक सीमा होती है। सीमा तक तो वह सुखदायी लगता है किन्तु जब सीमा को छू लेता है या उसे तोड़ कर आगे निकलने लगता है तो कभी वह संशय की ओर ले जाता है और कभी वह दुखदायी भी लगने लगता है। इस सन्दर्भ में हम किसी बालक की बुद्धिमत्ता या क्षमता पर संदेह नहीं कर रहे हैं। हम तो केवल इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ रहे हैं कि क्या आज बच्चों और माँ बाप के सामने केवल अंकों का प्रतिशत ही शिक्षा का एक मात्र लक्ष्य या उद्देश्य रह गया है ? अगर यह वास्तविकता है तो इसे उचित कहा जा सकता है क्या ? शायद नहीं।
कुछ तकनीकी और उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिले मात्र की होड़ ने जैसा स्वरूप ले लिया है, वह अकल्पनीय कहा जा सकता है। इस होड़ की भागमभाग में हर वर्ष नये प्रतिमान बन रहे हैं। विगत वर्षों से चली आ रही रिकार्डतोड़ परम्परा को जीवंत रखते हुए इस वर्ष भी केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद (सीबीएसई) की बारहवीं की परीक्षा में सर्वोच्च स्थान पाने वाली नोयडा की छात्र मेघना श्रीवास्तव ने 5०० में से 499 अंक पाने में सफलता पाकर पिछले सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं। इससे पूर्व यह सम्मान 498 अंक पाकर रक्षा गोपाल नामक छात्र को प्राप्त हुआ था।
इस सम्बन्ध में हम पुन: कहना चाहेंगे कि हमें उपरोक्त अंक पाने वाले परीक्षार्थियों की विश्वसनीयता पर कोई शंका नहीं है किन्तु इस समय विद्यमान परीक्षा प्रणाली में गणित या उससे सम्बन्धित कुछ उपविषयों को छोड़कर किसी भी विषय में पूर्णता तक पहुंचना क्या अपने आप में आश्चर्यजनक नहीं लगता। प्रश्न तो यह भी उठाया जा सकता है कि क्या इतने अधिक अंकों का मिलना इस बात का परिचायक है कि सीबीएसई की शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता में कुछ सुधार हुआ है या सीबीएसई की परीक्षा प्रणाली जो राज्य शिक्षा परिषदों के सापेक्ष उदार मानी जाती थी अब कुछ और अधिक उदार हो गयी है अथवा सीबीएसई के शिक्षकों ने अपने छात्रों के लिए परीक्षा में उत्तर लिखने का कोई सटीक कौशल ढूंढ लिया है ?। हमारे सामने एक यक्ष प्रश्न यह भी खड़ा हो गया है कि क्या विभिन्न राज्यों की माध्यमिक शिक्षा परिषदें ऐसा कोई अन्य कोर्स क्यों नहीं ढूँढ़ पा रही हैं जो परीक्षार्थी को अंक सम्पूर्णता के इतना निकट खड़ा कर दे।
विश्व के अधिकतर विकसित देशों में माध्यमिक शिक्षा पूरे देश में एक समान है और सरकारी स्तर पर उपलब्ध कराई जाती है। केवल उच्च शिक्षा ही निजी हाथों में है जबकि भारत में सरकारी शिक्षा के समानांतर निजी संस्थानों का एक बाजार खड़ा कर दिया गया है। आज सीबीएसई से मान्यताप्राप्त अनेक कुकुरमुत्ते निजी शिक्षण संस्थान छोटे-छोटे कस्बों यहाँ तक कि बड़े गाँवों में भी गली गली पाए जाने लगे हैं। हम यह नहीं कहते कि इनमें शिक्षा का स्तर सरकारी स्कूलों के स्तर से कम है। सच्चाई तो यह है कि इनमें पढऩे वाले बच्चों का बौद्धिक स्तर सरकारी स्कूल के बच्चों से कहीं अच्छा है किन्तु यह भी एक सच्चाई है एसी कमरों में बैठे नौकरशाहों ने सरकारी स्कूलों को शिक्षा की प्रयोगशाला बनाकर और बच्चों को शिक्षक से भयविहीन करके पुरानी परिपाटी पर चल रही परीक्षित प्रणाली को नेस्तनाबूद करके रख दिया है। विदेशों में वहां की परिस्थितियों के अनुकूल व्यवस्थाओं को बिना यह सोचे कि भारत के परिप्रेक्ष्य में वे व्यवस्थाएं अनुकूल नहीं है, जबरन लागू कर दिया गया। शिक्षकों को उन व्यवस्थाओं की सरसरी जानकारी दी गयी या हल्का फुल्का प्रशिक्षण देकर कर्तव्यों की इतिश्री कर ली गयी। परिणाम सामने हैं।
सरकारी स्कूल और शिक्षा का क्या हाल है, आज पूरा देश जानता है। सरकारी स्कूलों में छात्रों का अभाव है। हर तरह की सुविधा देकर भी सरकार बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं ला पा रही है। इसके विपरीत निजी माध्यमिक शिक्षण संस्थानों में फीस के अनुसार पंखे से लेकर एसी के साथ पढऩे की सुविधाओं का प्रचलन बढ़ता जा रहा है जिससे अच्छे संस्थानों में अपने बच्चों को पढ़ाने की अनिवार्यता के चलते मध्यमवर्गीय समाज पिसता चला जा रहा है। गरीब वर्ग मजबूरी में अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने को विवश है तो उच्चवर्ग अपने बच्चों के लिए और अधिक सुविधाओं और व्यवस्थाओं के स्कूल ढूँढ़ रहा है।
क्या इसे इस देश की विडम्बना नहीं कहा जाएगा कि हमारी सरकारें खुद इस दोहरी शिक्षा प्रणाली को प्रश्रय देकर देश में समानांतर चल रही उच्च और निम्नवर्ग की खाई को और चौड़ा करती चली जा रही हैं। यह कहां का न्याय है कि आप एक बच्चे को छ: लेन वाली सड़क पर कार दौड़ाने की सुविधा दे रहे हैं तो दूसरी ओर निम्नवर्ग के बच्चे को गड्ढों, धूल और कीचड़ से घुटनों घुटनों भरी पगडंडी पर दौड़ कर बराबरी करने की अपेक्षा कर रहे हैं। इस असंयमित शिक्षा नीति का दुष्परिणाम यह है कि हमारे शिक्षा क्षेत्र में स्तर (पैसे) के हिसाब से अनेक श्रेणियां बन गयी हैं और शिक्षा भी खुले बाजार में बिक रही है। शिक्षा बाजार कैसे बनी, देखिये अपने आपको देश का नियंता समझने वाले नौकरशाहों की एक चालाकी भरी चाल
से।
वास्तविकता यह है कि इस सरकारी शिक्षा के ध्वस्तीकरण के कुचक्र की शुरुआत सत्तर के दशक से ही कर दी गयी थी। शिक्षा क्षेत्र का मैदान खुला देख कर अनेक प्रभावशाली और औद्योगिक घरानों ने विभिन्न कारणों के चलते अपने सर्वसुविधासम्पन्न शिक्षण संस्थानों को उपलब्ध कराकर शिक्षा का बड़े स्तर पर व्यवसायीकरण प्रारम्भ कर दिया गया था। इस कुचक्र के दूसरे पहिये नौकरशाही वर्ग द्वारा बड़े सुनियोजित तरीके से शिक्षा में सुधार के नाम पर अंग्रेजों के जमाने से स्थापित एक सुदृढ़ शिक्षा प्रणाली को छेडऩा प्रारम्भ कर दिया गया। शिक्षा प्रणाली सुधारने के नाम पर विदेशों के दौरे किये गये। भारतीय परिपेक्ष्य में अव्यवहारिक प्रणालियों के जबरदस्ती प्रयोग किये गये और एक सुगठित और सुव्यवस्थित शिक्षा प्रणाली को नेस्तनाबूद करके रख दिया गया। कैसी विडम्बना है कि अस्सी के दशक तक देश को नब्बे प्रतिशत तक सरकारी और गैर सरकारी अधिकारी और टैक्नोक्रेट देने वाले सरकारी स्कूल तबाही के कगार पर खड़े हैं। सरकारी शिक्षकों से अन्य सरकारी काम लेकर उन्हें शिक्षण से दूर रखा जा रहा है और अच्छे परिणामों की अपेक्षा की जा रही है।
क्या अब समय नहीं आ गया है कि शिक्षा को केन्द्रीय कानूनों के अंतर्गत लाकर एक समान शिक्षा नीति और समान पाठ्यक्रम बना कर पूरे देश में समान मुफ्त शिक्षा व्यवस्था लागू की जाय। लग्जरी शिक्षण संस्थानों की नकेल कसी जाय। शिक्षा में सुविधाओं के मानक निर्धारित किये जाएँ और योग्यता के अधिकार को अधिमान देते हुए पूरे देश के लिए शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए अखिल भारतीय स्तर पर परीक्षाएं आयोजित कर योग्य बच्चों को सरकारी खर्च पर अच्छे शिक्षण संस्थानों में पढऩे के अवसर दिए जाएं। धीरे-धीरे शिक्षण संस्थाओं को समान सुविधायुक्त बनाया जाय और हर बच्चे को समान वातावरण में पढऩे का अधिकार बिना भेदभाव के दिया जाना सुनिश्चित किया जाय। तभी सही मायनों में भारतीय संविधान की आत्मा के आदेशों का परिपालन होगा। सरकार को यह सोचना चाहिए कि जब अन्य मौलिक अधिकारों के बारे में सरकार को किसी छेड़छाड़ की शक्ति नहीं है तो इसी विषय में जिससे देश का भविष्य जुडा है से छेड़छाड़ क्यों ?। क्या देश को अच्छे नागरिक देना केंद्र सरकार का कर्तव्य नहीं है ? इसे देश के वर्तमान नियंताओं को सोचना पड़ेगा अगर वे देशहित में सोचते हैं तो। —————————– (युवराज) 




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