गुरू नानक हरिद्वार में

विश्वप्रसिद्ध भारतीय संस्कृति की यह विशेषता ही है कि इसमें पनपे घोर पाखण्ड, रूढि़वाद और विकृतियों में सुधार के लिए तब – तब प्रभु घर विविध शरीरा, हरीह, कृपानिधि, सज्जन पीरा के क्रम में दिव्य पुरूष गुरू नानक देव अवतरित हुए जिन्होंने रूढिय़ों को परिवर्तित कर सहज बनाया। गुरूनानक देव अति कुशाग्र, निर्भीक, परोपकारी, तेजस्वी, घुमक्कड़ और आत्मज्ञानी थे जो बड़ी से बड़ी शंका का सहज भाव से समाधान कर देते थे।
सांसारिक वैभव तनिक भी गुरूदेव को आकर्षित नहीं कर सका अपितु ‘जीओ और जीने दोÓ और सर्वधर्म सम्भाव का पाठ पढ़ाया। आपका उपदेश था – ‘पाप से घृणा करो, पापी से नहींÓ और आवश्यकता से अधिक संग्रह दुखों का कारण बनता है। गुरू नानक ने विकृत रूढिय़ों का विरोध कर धर्म को जनहितकारी और सर्वसुलभ रूप प्रतिपादित किया।
अपने भ्रमण के दौरान गुरू नानक देव एक ऐसे पवित्र तीर्थ स्थल जा पहुंचे जहां उन्होंने देखा कि कुछ लोग सूर्य की तरफ मुंह कर लोटे से पानी निकाल कर बाहर डाले जा रहे थे। गुरूनानक के पूछने पर जवाब मिला कि यह पानी सूर्य द्वारा हमारे पितरों को परलोक में मिल जायेगा और इस तर्पण से वे परलोक मेें तृप्त हो जावेंगे। अब क्या था, प्रत्युत्तर में गुरू नानक देव ने भी उधर पीठ कर अब दूसरी दिशा में उसी प्रकार पानी बाहर जमीन पर डालना प्रारंभ कर दिया।
लोगों ने हैरानी से पूछा आप नदी का जल निकाल – निकाल कर बाहर क्यों डाल रहे हैं। गुरूदेव ने उत्तर दिया – ‘करतारपुर में मेरी खेती पानी के अभाव में सूखती जा रही है, उसको पानी पहुंचा रहा हूं। लोगों ने आश्चर्य से कहा कि यहां से सैंकड़ों मील दूर आपकी खेती को केवल मात्र यहां की जमीन पर जल डालने से जल वहां कैसे पहुंच जायेगा, यह तो सरासर गलत है।Ó
यह सुनकर गुरूनानक ने स्वाभाविक ही उत्तर दिया कि जहां पर डाला पानी लाखों मील दूर सूर्य पर पहुंचकर परलोक में आपके पितरों को मिल सकता है तो फिर वहां पानी क्यों नहीं पहुंच सकता और खेती सूखने से क्यों नहीं बच सकती।
यह सुनकर सभी निरूत्तर हो गये तथा अपने किये पर पछतावा करने लगे। इस प्रकार गुरूनानक देव के सैद्धान्तिक विचार की रोशनी में पुरानी रूढिय़ों और आडम्बरों के औचित्य पर पुनर्विचार होने लग गया। इस प्रकार गुरूदेव का उपदेश सर्वकालिक सर्वदेशीय और आज भी उसकी आवश्यकता ज्यों की त्यों है। —————-(उर्वशी)

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