चिडि़यां भूल गई

तब की बात है, जब चिडि़यां पेड़ों पर नहीं रहती थीं। उनके अपने मोहल्ले होते थे। वहां वे सब इकट्ठी रहकर नाचती-गाती थीं। उनके पास आग भी थी, जिससे खाना पकाती थीं।
एक दिन की बात, नाचती-गाती सारी चिडि़यां सो गईं। बाहर आग जलती रही। उसे अंदर रखना भूल गईं। रात में तेज बारिश हुई। आग बुझ गई। सुबह चिडि़यों को आग बुझने का पता चला, तो वे बेहद दुखी हुईं। अब खाना कैसे पकेगा? सर्दी से कैसे बचेंगे? जंगली जानवरों को कैसे दूर रखेंगे, वे सोचने लगीं।
तभी एक चिडि़या ने खबर दी, ‘पहाड़ों से दूर, झोंपड़ी में एक आदमी रहता है। उसके घर में आग है। मगर उसे लेने कौन जाए?‘
मुर्गा उनकी बात सुनकर बोला, ‘मैं जाऊंगा।‘
‘मगर इतनी दूर से तुम आग कैसे ला पाओगे,‘ दूसरी चिडि़यों ने पूछा।
‘मैं ले आऊंगा,‘ कहता हुआ मुर्गा उड़ चला। तब मुर्गा काफी तेजी से उड़ता था। बड़े-बड़े पंख थे उसके। उड़ते-उड़ते उसे दूर एक झोंपड़ी दिखाई दी। वहां चिमनी से धुआं निकल रहा था। मुर्गा समझ गया, आग इसी घर में होगी। वह दीवार पार कर, आंगन में पहुंच गया। देखा, चूल्हे में आग जल रही है। उसने एक जलती लकड़ी को मुंह में दबाया और उड़ चला। उसी समय तेज आंधी आ गई। हवा से आग उसके पंखों में लग गई। मुर्गे ने लकड़ी छोड़ दी। वह धरती पर गिर पड़ा। मुर्गा घास के ढेर पर गिरा। पंखों की आग तो बुझ गई, पर वे बुरी तरह झुलस गए थे। मुर्गे ने उड़ना चाहा पर ज्यादा दूर न उड़ सका। वह दर्द से कराहने लगा।
झोंपड़ी से एक लड़की बाहर निकली। उसने मुर्गे को उठाया। उसके पंखों पर दवा लगाई। लड़की ने इससे पहले कभी मुर्गा नहीं देखा था। उससे पूछा, ‘तुम कहां से आए हो?‘
मुर्गे ने अपना परिचय दिया। फिर दुखी स्वर में बोला, ‘अब मैं घर कैसे जाऊंगा? मैं तो उड़ भी नहीं सकता।‘
लड़की ने कहा, ‘कोई बात नहीं। तुम हमारे पास रहो। यहां तुम जैसा कोई नहीं है। सब तुम्हें अपना राजा मान लेंगे।‘
राजा बनने की बात मुर्गे को अच्छी लगी। वह थोड़ी देर को भूल गया कि चिडि़यों ने उसे आग लाने के लिए भेजा था। चिडि़यां सचमुच परेशान थीं। वे यही सोचती रहती थीं कि मुर्गे को क्या हुआ?
मुर्गा वहीं झोंपड़ी में रहने लगा। लेकिन उसका मन परेशान रहता था। वह रात को सो न पाता। सोता, तो सुबह सबके जागने से पहले उसकी आंखें खुल जातीं। वह बोल-बोलकर सबको जगा देता। बस, फिर तो उसका यही काम हो गया। अब वह संतुष्ट था। उधर चिडि़यां धीरे-धीरे आग को भूल गईं।
——— (उर्वशी)
——- नरेंद्र देवांगन

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