जब आपका बच्चा दुबला व कमजोर हो

प्रत्येक माता-पिता की चाहत होती है कि उनका बच्चा हृष्ट पुष्ट व स्वस्थ हो। उसकी हर मुस्कान तथा उसकी नादानी व बाल सुलभ क्रियाकलाप माता-पिता के दिल को गहराई तक गुदगुदा जाते हैं। सृष्टि की ऐसी सुन्दरतम् संरचना को देखकर मन बरबस ही आनन्दित हो जाता है।
साथ ही जो बच्चे दुबले व कमजोर हैं, माता-पिता को चिंता होती है कि उनका बच्चा दुबला व कमजोर क्यों है? उसे अच्छे से अच्छा खिलाते हैं परन्तु खाये पिये का कोई असर नहीं होता। अक्सर लोग कहते हैं, वह तो पनपता ही नहीं और खाया-पिया भी उसके अंग देह नहीं लगता। कई बार चिकित्सक को भी दिखाया उनका केवल एक ही जवाब था कि आगे चलकर अपने आप ठीक हो जाएगा।
आजकल बच्चों में दुबलेपन की समस्या बहुत व्यापक है। यूं तो इस समस्या के कई कारण हैं परन्तु प्रमुख कारण वर्तमान समाज में सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक परिस्थितियां हैं जिनके कारण भोजन की मात्रा, उसके पाचन और उसके शरीर में काम आने वाली प्रक्रिया पर भारी प्रभाव पडता है। हमारे यहां ६५ प्रतिशत परिवारों की आर्थिक दशा ही ऐसी है जहां प्राथमिकता पौष्टिकता को नहीं, भरपेट भोजन को दी जाती है। यूं तो कम पैसों में भी पौष्टिकता का ध्यान रखा जा सकता है लेकिन गरीबी के अलावा महिलाओं की अज्ञानता इसमें बाधक बनती है।
कई बार ऐसी समस्या आती है कि आप जानते भी हंै कि बच्चे को क्या खिलायें और कैसे खिलायें लेकिन आपका बच्चा खाता ही नहीं। यदि वह खायेगा नहीं तो बच्चे का समुचित विकास कैसे होगा? सुबह उठते ही बच्चे को जल्दी में तैयार किया, थोडा नाश्ता कर स्कूल रवाना कर दिया, बच्चा स्कूल टिफिन ले गया तो कभी मन में आया तो खा लिया तो कभी नहीं खाया। इसी के साथ बच्चे के लिए न मनोरंजन, न खेलने-कूदने का समय और आगे बढने की होड व चिंता घर कर जाती है। उस पर घर में ट्यूशन तो बेचारा बच्चा पनपे तो कैसे?
बच्चे को अच्छे स्वाद की अपेक्षा होती है। खाने की चीज में यदि स्वाद मनपसंद नहीं है तो बच्चे के लिए पौष्टिकता का कोई महत्व नहीं है। माता-पिता को पौष्टिकता के साथ-साथ बच्चे की इच्छा व अनिच्छा का भी ध्यान रखना चाहिए। नए तरीके अपनाकर भोजन की पौष्टिकता तथा रूचिकर स्वाद, दोनों का सामंजस्य
बनायें।
यदि आप उक्त दोनों समस्याओं का विधिवत् समाधान कर लेती हंै तथा फिर भी आपका बच्चा कमजोर है तो आगे सोचना होगा। बच्चे के दुबलेपन का एक कारण मानसिक अलगाव (इमोशनल डिप्रीवेशन) भी हो सकता है। माता-पिता के नौकरी करने के कारण बच्चे को समुचित प्यार, दुलार, स्नेह आदि नहीं मिल पाता जिस पर बच्चे का जन्मसिद्घ अधिकार होता है। समस्या उस समय और भी जटिल हो जाती है, जब बच्चे की उपेक्षा की जाने लगे या उसे शारीरिक प्रता$डना दी जाने लगे। मानसिक अलगाव के दुष्प्रभाव के कारण बच्चे के स्वास्थ्य को काफी नुकसान होता है।
इसके अलावा अनेक ऐसी बीमारियां भी हैं जो आपके बच्चे को दुबला व कमजोर बना देती हैं। पेट के कीडे, बार-बार होने वाले दस्त, भोजन का न पचना, जिगर का कमजोर होना, खून की कमी, मिट्टी खाने की आदत, उल्टी आदि ऐसी ही बीमारियां हैं।
टी. बी., मूत्रनली में इन्फेक्शन, क्रानिक मलेरिया, पुराना बुखार भी इसका कारण हो सकता है। श्वसन तंत्र व गुर्दे की बीमारियां भी बच्चे के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालकर उनका विकास रोक देती हैं। शरीर में हारमोन्स की कमी भी बच्चे को हृष्ट-पुष्ट बनाने में बाधा डालती है।
दुबलेपन की व्यापक समस्या के उपचार के लिए सर्वप्रथम कारण का पता लगाना परम आवश्यक है। बीमारी का उपचार तो चिकित्सक ही करेगा लेकिन मानसिक उपचार माता-पिता के हाथ में है।
बच्चे के पोषण का शुभारंभ मां के अमृत तुल्य एवं स्वास्थ्य रक्षक स्तनपान से होना चाहिए। चौथे माह से सप्लीमेंटरी फीडिंग प्रारंभ करा दें। बाल्यकाल से ही प्रोटीन तथा विटामिन युक्त आहार दूध, अंडा, दालें, हरी सब्जी, सूप, प्यार दुलार, स्नेह, ममता समुचित रूप से दें।बच्चों को खेलने भी दें तथा थोडी बहुत शैतानी भी करने दें। यदि आपके लाडले कमजोर बच्चे को बीमारी नहीं है तो चिंता छो$ड दें। धीरे-धीरे आपका बच्चा दुबलेपन व कमजोरी से उबरकर हृष्ट-पुष्ट अवश्य हो जाएगा।————– (उर्वशी)




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