जब कमाने की जिम्मेदारी पत्नी की हो

घर को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना पुरूष सिर्फ अपना ही अधिकार समझता है। पत्नी की आय को अतिरिक्त ही समझा जाता है। जब पुरूष का यह एकाधिकार टूटता है तो वह अपराध बोध एवं हीन भावना से ग्रसित हो जाता है। उसे लगता है कि अब वह सर्वोच्च स्थान पर नहीं रहा बल्कि अब उस सर्वोच्च स्थान पर उसकी पत्नी बैठी है।
हमारा सामाजिक दृष्टिकोण ही ऐसा है। वही पुरूष की इस सोच का उत्तरदायी है। समाज में कमाने वालों को अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। घर की जिम्मेदारियों को निभाने वाले को मामूली माना जाता है। घर के काम-काजों एवं बच्चों की परवरिश को मामूली काम माना जाता है। उन्हें निभाने वाले की समाज में महत्ता गौण मानी जाती है। नौकरी करने वाले को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
यदि पुरूष नौकरी नहीं करता तो उसे समाज में उपहास की दृष्टि से देखा जाता है। कई बार उसे इन तानों का सामना भी करना पड़ता है कि घर में बैठकर बीवी की कमाई खाता है वगैरह-वगैरह। इससे उसके आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान को बेहद ठेस पहुंचती है जिस कारण वह तनाव एवं हीनभावना से घिर जाता है। वह चिड़चिड़ा हो जाता है। हर समय खीझकर बातें करता है। अपनी पत्नी पर हर समय रौब जमाता है।
दूसरी तरफ जब पत्नी कमाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाती है और उसका पति बेरोजगार होता है तो वह घर और बाहर की दुगुनी जिम्मेदारी उठाना नहीं चाहती। वह चाहती है कि घर वह चला रही है, इसलिए उसे अहमियत दी जानी चाहिए। वह सोचती है कि जिस तरह जब एक पति नौकरी करता है तो उसकी पत्नी घर की सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाती है तो अब वह कमा रही है तो उसके पति को भी घर की जिम्मेदारियां बखूबी निभानी चाहिएं।
कभी कभी वह इन अधिकारों को बयान कर देती है तो घर में खूब झगड़ा होता है क्योंकि आदमी कभी घरेलू बनने के लिए तैयार नहीं होता जबकि कभी-कभी वह समाज के डर से अपनी इस तरह की भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाती और अंदर ही अंदर घुटती रहती है। वह समझती है कि उस पर अत्याचार हो रहे हैं। उसे प्रताडि़त किया जा रहा है।
ऐसे में भी झगड़ा ही बनता है क्योंकि दोनों में से कोई भी झुकने को तैयार नहीं होता। समस्या तब और बदतर हो जाती है जब पुरूष अपने खाली समय का कहीं उपयोग नहीं करता एवं अपना समय शराब पीने एवं जुआ खेलने या अन्य असामाजिक कार्य करने में लगाता है। महिलाएं अक्सर शिकायत करती हैं कि उनका पति स्वयं तो कुछ करता है ही नहीं बल्कि उनकी कमाई भी शराब और जुए में उड़ाता है। ऐसे में बच्चों का भविष्य खराब हो जाता है।
दरअसल यह समस्या मनोवैज्ञानिक होने के बजाय सामाजिक है क्योंकि यह सामाजिक दृष्टिकोण ही है जो पुरूष को सर्वोच्च सोचने पर मजबूर करता है। हमें घर में काम करने वालों एवं बाहर काम करने वालों को एक ही दृष्टि से देखना होगा। तभी घर में काम करने वालों के मन में हीन भावना उत्पन्न नहीं होगी। अपनी पत्नी के बाहर काम करने वाले बेरोजगार पति को फिर घर में काम करने में कोई शर्म महसूस नहीं होगी। पति को चाहिए कि वह पत्नी की नौकरी को घर में लड़ाई का मुद्दा न बनाये बल्कि अपनी नौकरी ढूंढे एवं तब तक घर की जिम्मेदारियों में अपना भी कुछ सहयोग दे। यह मौका हमेशा नहीं मिलता।
पत्नी को भी चाहिए कि वह पति को अपने खाली समय का सदुपयोग रचनात्मक कार्यों को करने में कहे। इससे वह उन कार्यों को कर पाएगा जिसे वह नौकरी करते-करते नहीं कर सकता। दूसरे उसका ध्यान फिजूल की बातों से भी हटेगा। ————(उर्वशी)




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