जम्मू-कश्मीर: बीजेपी-पीडीपी गठबंधन टूटने के सियासी उद्देश्य

लीजिए, बीजेपी-पीडीपी के बेमेल गठबंधन का निराशाजनक अंत हो गया। वाकई ऐसा होना ही था, क्योंकि अलगाववादियों की चहेती पार्टी पीडीपी की नेत्री और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती अपनी सहयोगी राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी की सियासी मजबूरियों को समझने के लिए बिलकुल तैयार नहीं थीं। लिहाजा, बीजेपी नेतृत्व ने अपने सियासी स्वभाव के अनुरूप सख्त फैसला लिया जिसकी उम्मीद शायद महबूबा को भी नहीं रही होगी। दरअसल, बीजेपी द्वारा लिए गए इस अहम निर्णय के कुछ गहरे सियासी निहितार्थ हैं जिसे समझने की जरूरत है।
पहला, बीजेपी ने राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और कश्मीर की शांति में अपनी भूमिका सुनिश्चित करने के लिए यह गठबंधन किया था। महबूबा ने भी कहा कि एक बड़े विजन के तहत उन्होंने बीजेपी से गठबंधन किया था लेकिन अतीत साक्षी है कि समय बीतने के साथ-साथ दोनों दलों के बीच राजनैतिक कटुता बढ़ती गई। आलम यह था कि पारस्परिक बातचीत में हुए महत्त्वपूर्ण निर्णयों को भी लागू करने में महबूबा निरन्तर आनाकानी कर रही थीं, जिससे सरकार में शामिल होते हुए भी बीजेपी खुद को असहाय पा रही थी।
इसके बावजूद भी बीजेपी ने उनके साथ सियासी रिश्ते निभाने की पूरी ईमानदार कोशिश की और कई बार वह महबूबा की जिद्द के सामने रणनीतिक रूप से झुकी भी लेकिन जब उसे लगा कि इससे बीजेपी के बारे में शेष देश में गलत संदेश गया है जिससे पार्टी की अलोकप्रियता भी बढ़ रही है तो उसने एक ही  झटके में महबूबा सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इससे सड़क की नेत्री महबूबा एक बार फिर सियासी सड़क पर पहुंच गई।
देखा जाए तो बीजेपी के इस अहम फैसले की समालोचना कम, आलोचना अधिक हो रही है जो कि अनुचित है, क्योंकि बीजेपी के द्वारा लिया गया यह निर्णय कोई सामान्य फैसला नहीं है बल्कि गम्भीर सियासी चाल है जो मिशन 2०19 की प्रभावी रणनीति के तहत चली गई है ताकि महागठबंधन से सियासी पंगा लिया जा सके।
दूसरा, राज्य विशेष से जुड़ी भारत की भावनाओं को समझने और उसके अनुरूप ढलने के साथ-साथ माकूल प्रशासनिक पहल करने में भी महबूबा सरकार पूरी तरह से नाकाम रही, जिससे आतंकियों, दहशतगर्दों और पत्थरबाजों समेत पाकिस्तान के भी हौसले बढ़े। यदि इस सरकार के कार्यकाल में कई महत्त्वपूर्ण सैन्य ठिकानों समेत अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले की बात को भुला भी दिया जाए तो भी रमजान में सीजफायर के बावजूद राइजिंग कश्मीर के सम्पादक शुजात बुखारी समेत अलग-अलग मामलों में कुछेक सैन्यकर्मियों की जितनी निर्ममतापूर्वक हत्या की गई, वह पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक गिनाई जा सकती है।
ऐसा इसलिए सम्भव हुआ, क्योंकि इस सरकार ने अलगाववादियों और पत्थरबाजों से जो हमदर्दी दिखाई, उनकी चरणबद्ध रिहाई की उससे सैन्यबलों का मनोबल टूटा और आतंकियों के हौंसले बढ़े।
तीसरा, अंतरराष्ट्रीय फितरतों का शिकार हो रहे इस राज्य में शांति बहाली और विकास कार्यों के लिए जिस सख्त प्रशासनिक फैसलों की जरूरत थी, उसे समझकर लेने की बजाय जानबूझकर उसे नजरअंदाज करने की जो भूलें महबूबा ने की, अंततोगत्वा वह उन पर ही भारी पड़ गई। उनके कार्यकाल में जिस तरह से सैन्यकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और सेना के साथ खिलवाड़ करने वाले पत्थरबाजों से निपटने में जम्मू-कश्मीर पुलिस नाकामयाब साबित हुई, उससे महबूबा सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी थी। ऐसा इसलिए कि सेना की व्यावहारिक जरूरतों को समझने और उसके अनुरूप अपने प्रशासन को ढालने को वह तैयार ही नहीं थी जिससे वहां की विधि व्यवस्था लगातार बिगड़ती गई। हालांकि उनकी इस लापरवाही का ठीकरा राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के सिर फूटा क्योंकि वह सहयोगी पार्टी थी। यही वजह है कि बीजेपी आत्मरक्षार्थ गठबंधन से बाहर हो गई और महबूबा सरकार का पतन हो गया।
चौथा, स्वाभाविक है कि जम्मू-कश्मीर एक बार फिर राजनैतिक अस्थिरता का शिकार हो गया है। वहां पर राज्यपाल शासन भी लागू  हो गया है, क्योंकि कोई भी दल वैकल्पिक सरकार गठित करने की स्थिति में नहीं है। 87 सदस्यीय राज्य विधान सभा में पीडीपी सबसे बड़ी पार्टी है जिसके 28 विधायक हैं। बीजेपी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है जिसके 25 विधायक हैं। तीसरे स्थान पर नेशनल कांफ्रेंस है जिसके 15 विधायक हैं। चौथे स्थान पर कांग्रेस है जिसके 12 विधायक हैं। 7 अन्य विधायक भी वहां हैं।
सच कहा जाए तो राज्य में जनादेश नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबन्धन सरकार के खिलाफ आया था इसलिए पीडीपी-बीजेपी के बेमेल गठबंधन सरकार के गठन से सबको अचम्भा तो हुआ लेकिन विकल्पहीनता की स्थिति में ऐसा किया जाना जरूरी था।
आमतौर पर पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस एक दूसरे की विरोधी पार्टी समझी जाती हैं, इसलिए कांग्रेस भी पीडीपी को नापसंद करती है क्योंकि वह नेशनल कांफ्रेंस की पुरानी सहयोगी पार्टी है। यदि इस मतभेद को भूलकर महागठबंधन की आड़ में कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी एक साथ आ जाएं तो राज्य में राज्यपाल शासन की नौबत नहीं आएगी। दूसरी तरफ, एनडीए की पूर्व सहयोगी नेशनल कांफ्रेंस यदि बीजेपी के साथ आ जाए और कांग्रेस तथा पीडीपी में तोडफ़ोड़ करा दे तो दूसरी सरकार सम्भव है लेकिन मिशन 2०19 के मद्देनजर बीजेपी अब कोई रिस्क नहीं लेगी, क्योंकि राज्यपाल शासन में भी राज्य सत्ता परोक्ष रूप से उसके ही हाथ में रहेगी जिससे वह विकास कार्यों के साथ-साथ दहशतगर्दों का सफाया भी आसानी से करेगी लेकिन सूबाई पार्टियां इसे स्वीकार करेंगी या नहीं, बहुत कुछ उनके सियासी रुख पर भी निर्भर करेगा।
स्पष्ट है कि अचानक दिए जाने वाले तीन तलाक की धुर विरोधी रही बीजेपी ने पीडीपी को जब उसी अंदाज में सियासी तलाक दे दिया तो जरूर कोई गम्भीर बात रही होगी क्योंकि उसके इस अप्रत्याशित निर्णय से पृथ्वी का जन्नत समझे जाने वाले जम्मू-कश्मीर की सियासत में भूचाल आ गया है। यह कड़वा सच है कि राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और कश्मीर में शांति के लिए ही बीजेपी ने यह अनैतिक गठबंधन किया गया था लेकिन जब मुराद ही पूरी नहीं हुई तो बीजेपी ने अपना पल्ला झाड़ लिया।बहरहाल, यह उसका जबरदस्त सियासी दांव समझा जा रहा है क्योंकि बीजेपी के इस कदम से उनलोगों के मुंह बंद हो जाएंगे जो जम्मू-कश्मीर में गठबंधन को मौकापरस्ती बताकर बीजेपी पर अक्सर सवाल उठाते थे। यही नहीं, अपनी भूल सुधार कर बीजेपी ने यह संदेश भी दे दिया है कि अब वह अपनी ‘लाइनÓ से कोई भी समझौता नहीं करेगी।
इस बात से सभी वाकिफ हैं कि सीजफायर सहित कई मुद्दों पर दोनों ही पार्टियों में काफी दिनों से टकराव चल रहा था जिसके चलते बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने महबूबा सरकार में शामिल अपने सभी मंत्रियों और सूबे  के सभी बड़े नेताओं को दिल्ली में आपात बैठक के लिये बुलाया, जिस दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने भी उनसे मुलाकात की। इसके बाद बीजेपी ने अपना समर्थन वापस लेने का औपचारिक ऐलान कर दिया और महबूबा ने भी राज्यपाल को अपना इस्तीफा अविलम्ब सौंप दिया। जाहिर है कि सबकी सहमति से गठबंधन तोडऩे का फैसला हुआ है।
सच कहा जाए तो दोनों दल खंडित जनादेश में साथ सत्ता में आए थे। लेकिन मौजूदा समय में इस सरकार को चलाना बीजेपी के लिए मुश्किल हो गया था क्योंकि उसने एक एजेंडे के तहत सरकार बनवाई थी जिसे केंद्र सरकार हर संभव मदद भी कर रही थी। केंद्रीय गृहमंत्री भी समय-समय पर राज्य का दौरा करते रहे और सीमा पार से पाकिस्तान की सभी गतिविधियों को रोकने के लिये केंद्र सरकार और सेना लगातार कार्य करती रही। लेकिन हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या से राज्य में बोलने की आजादी पर खतरा हो गया। फिर भी राज्य सरकार की किसी भी मदद के लिये केंद्र सरकार सदैव तत्पर रही है, लेकिन राज्य सरकार अपने मकसद में पूरी तरह से असफल रही। जम्मू और लद्दाख में विकास का काम भी नहीं हुआ। कई विभागों ने भी काम की दृष्टि से अच्छा काम नहीं किया। दरअसल, बीजेपी के लिये जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है लेकिन आज जो स्थिति है उस पर नियंत्रण करने के लिये उसने सरकार से हटने का फैसला किया है ताकि शासन को राज्यपाल शासन के तहत लाएं और फौरी निर्णायक कार्रवाई करें। —————– (युवराज)




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