तीन लोक से न्यारी मथुरा

सनातन मत में सप्तपुरियों के प्रति अगाध आस्था है। हर हिन्दू अपने जीवनकाल में एक बार अवश्य ही सनातन मतावलम्बी सप्तपुरियों की यात्रा करना चाहेगा। अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवन्तिका पुरी, द्वारकानि, चैव सप्ततै मोक्ष दायिका। ये सप्तपुरियां हिन्दू देवी-देवताओं के जीवन-दर्शन एवम् प्रसंगों से जुड़ी हुई हैं। इन सप्तपुरियों में से मथुरा को तीन लोक से न्यारा माना जाता है। इस कारण से यह कहा जाता है, ‘तीन लोक से मथुरा न्यारी, यामे जन्मे कृष्ण मुरारी’।
मथुरा हिन्दुस्तान के केंद्रीय तीर्थो में से एक है जो भगवान श्रीकृष्ण के जीवन प्रसंगों की पौराणिक थाती है। मनुस्मृति, वृहद्संहिता, महाभारत, ब्रह्मवैवर्त पुराण, वाराह पुराण, अग्नि पुराण, हरिवंश पुराण, बाल्मीकि रामायण आदि धार्मिक ग्रन्थों में इसका मधुरा, मधुपुरी, महुरा, मधुपुर, मथुला आदि नामों से उल्लेख देखने को मिलता है। यह प्राचीन काल से भारतीय सभ्यता व संस्कृति का प्रमुख केन्द्र रहा है। इसे आर्य सभ्यता का केन्द्र भी कहा जाये तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी।
मथुरा को मधुपुरी इसलिए भी कहा जाता है कि मधु नामक दैत्य ने इस नगरी को बसाया था, ऐसी मान्यता है। एक समय यह शूरसैन राज्य की राजधानी बनी और इसी वंशानुक्रम में उग्रसेन यहां के राजा हुए। उग्रसेन का पुत्रा कंस हुआ जो अपने पिता उग्रसेन को जेल में डाल कर निरकुंश शासक बना और इसी क्रम में अपनी शक्ति को बढ़ाते हुए उसने आक्रामक मगध नरेश जरासंध की अस्थि व वस्थि नामक कन्याओं से भी विवाह भी रचाया।
क्रूर कंस ने अपनी चचेरी बहन देवकी तथा उसके पति वसुदेव को, आकाश से वाणी सुनने के पश्चात् जेल में डाल दिया था ताकि वह देवकी की एक-एक करके सभी सन्तानों को मौत के घाट उतार सके।
कंस तथा उसके क्रूर शासन को समाप्त करने के उद्देश्य से भगवान विष्णु ने स्वयं देवकी के गर्भ से कृष्ण के रूप में जन्म लिया तथा अपनी अद्भुत लीलाओं के क्रम का विकास करते हुए मामा कंस का वध कर मथुरा में पुनः सुशासन की स्थापना की। कंस वध के पश्चात् भी मथुरा पर मगध नरेश जरासंध की ओर से बार-बार आक्रमण किये जाते रहे। भगवान श्रीकृष्ण ने कूटनीति का सहारा लेते हुए जरासंध को भीम के हाथों मृत्यु दिलवाई।
कालान्तर में मथुरा में समय काल के हिसाब से शासक बदलते रहे हैं। दिल्ली के निकट होने के कारण मथुरा को हमेशा युद्धों से संघर्ष करना पड़ा हैं। सन् 1803 में दौलतराव सिंधिया को परास्त करने के पश्चात् ईस्ट इण्डिया कंपनी ने मथुरा पर कब्जा करते हुए उसे अपनी फौजी छावनी बनाया।
मथुरा आगरा से 58 किलोमीटर तथा दिल्ली से 145 किलोमीटर दूर स्थित है जो देश से रेल मार्ग एवम् सड़क मार्ग दोनों से सीधा जुड़ा हुआ है, सप्ताह भर की यात्रा में इसके आस-पास के अन्य दर्शनीय स्थलों की भी यात्रा की जा सकती है, वृन्दावन, गोकुल, महावन, दाऊजी, गोर्वधन पर्वत, नन्द गांव आदि मथुरा के आस-पास ही हैं जिनकी सहजता से यात्रा की जा सकती है। मथुरा में ठहरने के लिए अनेक धर्मशालाएं, होटल, लॉज, अतिथिगृह हैं जहां पर रहने की पर्याप्त सुविधाएं रहती है। इसके अलावा खाने-पीने का मथुरा में उचित बंदोबस्त मिल जायेगा।
मथुरा में साल-भर ही पर्वों-त्यौहारों का आयोजन होता रहता है। यमुना शष्ठी, दुर्गाष्टमी, रामनवमी, नृसिंह चतुर्दशी, दशहरा, व्यास पूर्णिमा, हरियाली तीज, रक्षा बंधन, जन्माष्टमी, अनंत चतुर्दशी, दीपावली, यम द्वितीया, बसंत पंचमी, देवोत्थान एकादशी, होलिका आदि पर्व सोत्साह मनाये जाते हैं। इसके अलावा ग्रहणकाल, पूर्णिमा, अमावस्या, अक्षय नवमी, अन्नकूट, गौचारण आदि पर्वोत्साह भी मनाये जाते हैं। हर माह की एकादशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा तिथि को भक्तगण मथुरा की परिक्रमा भी करते हैं। अधिक मास में यह परिक्रमा प्रतिदिन की जाती है।
मथुरा के दर्शनीय स्थल:
विश्राम घाट – यह शहर के मध्य में स्थित है। इस घाट के उत्तर में बारह तथा दक्षिण में भी बारह घाट हैं। यहां यमुना जी का मन्दिर है तथा आस-पास अन्य मन्दिर भी अवस्थित हैं। मथुरा स्थित यमुना नदी के समस्त घाटों की तुलना में धार्मिक दृष्टि से विश्राम घाट को अधिक महत्त्व दिया जाता है। संध्या के समय यहां पर यमुना जी की आरती का विहंगम दृश्य उपस्थित होता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार कंस वध के पश्चात् भगवान श्री कृष्ण व बलराम ने यहां विश्राम किया था। चैत्रा शुक्ला शष्ठी को यमुना जी का जन्मोत्सव यहां मनाया जाता है। भाई दूज के दिन लाखों सनातन मतावलंबी भाई-बहन यहां एक साथ स्नान करते है। मान्यता है कि भाई दूज के दिन यहां स्नान करने वाले भाई-बहन असमय यमलोक गमन नहीं करते।
श्री द्वारकाधीश मन्दिर: इसका निर्माण गुजराती वैश्य गोकुलदास पारीख ने करवाया था। असकुण्डा घाट के निकट स्थित बाजार में यह मन्दिर अवस्थित है। इसका निर्माण सन् 1814-15 के आस-पास हुआ था, ऐसी मान्यता है। कांकरोली के पुष्टिमार्गीय गोसाइयों द्वारा इस मन्दिर की सेवा-पूजा की जाती है।
यह मन्दिर 180 फुट लम्बी तथा 120 फुट चौड़ी कुर्सी पर अवस्थित है। इस मन्दिर की सुचारू व्यवस्था हेतु करोड़ों रूपयों की अचल सम्पत्ति संलग्न है ताकि उसके किराये से मन्दिर की व्यवस्था चलती रहे। स्थापत्य कला की दृष्टि से यह मन्दिर बेजोड़ है। इसके सुदृढ़ एवं कलात्मक स्तम्भों के मध्य में विशाल मण्डप है जिसमें नानाविध कलाकृतियां एवं शीशे का कार्य देखते ही बनता है।
श्री द्वारकानाथ को समर्पित यह मन्दिर सभी दृष्टियों से चित्ताकर्षक है। मन्दिर में चतुर्भजी श्याम मूर्ति है जिनकी चार भुजाओं में गदादि आयुध विद्यमान है। भगवान श्याम के निकट बायीं ओर श्वेत स्फटिक की रूकमणी जी की सुन्दर मूर्ति है। यहां सावन के दिनों में झूलों का तथा भादवे में घटाओं सहित जन्माष्टमी महोत्सव धूमधाम से मनाये जाते हैं।
कटरा केशवदेव मन्दिर:- श्री कृष्ण जन्मभूमि के नाम से यह स्थान प्रसिद्ध है। ऐसी प्रबुद्ध मान्यता है जो ठोस धरातल पर आधारित है कि कटरा केशवदेव ही राजा कंस का भवन रहा था और यहीं पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। इस स्थान को ध्वंस की पीड़ा झेलनी पड़ी थी। औरंगजेब के समय में भी यह स्थान विध्वंस की पीड़ा से बच न सका।
इस कैम्पस को ब्रिटिशकाल में बनारस के राजा पटनीमल ने खरीद लिया था जिनका उद्देश्य इस स्थान को श्रीकृष्ण के जन्मस्थान के रूप में विकसित करना था मगर उनकी यह इच्छा पूर्ण नहीं हुई हालांकि इस परिसर पर पश्चात्वर्ती समय में उनके परिवारजनों का ही कब्जा रहा।
महामना मदनमोहन मालवीय एवम् सेठ जुगल किशोर बिड़ला के सद् प्रयत्नों से यह स्थान विकास की डगर पर चल पड़ा। फलस्वरूप श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना हुई। तब से लेकर वर्तमान समय तक यह लम्बा-चौड़ा कैम्पस संस्कृति के अनूठे केन्द्र के रूप में विकसित होता जा रहा है।
कृष्ण जन्म स्थान के आकर्षणों में भागवत् भवन, लीलाओं की यंत्राचालित झांकियां, पार्क, फव्वारे, आयुर्वेद भवन आदि दर्शनीय स्थल हैं। उक्त दर्शनीय स्थलों के अलावा दशमुखी गणेश मन्दिर, श्रीनाथ जी का मन्दिर, वाराह, गंताश्रम, नारायण, विजयगोविन्द लक्ष्मीनारायण, कन्हैयालाल, गोवर्धननाथ, दाऊजी, मदनमोहनजी, गोकुलनाथजी, श्रीराम, श्रीजी बाबा, स्वामी नारायण, बिड़ला मन्दिर सहित शिवताल, पोतरा कुण्ड एवम् पुरातत्व संग्रहालय मथुरा के अन्य दर्शनीय स्थल हैं। (उर्वशी)

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