तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ है बदरीनाथ धाम

तीर्थ भारतीय जातीयता और भारतीय व्यापक अखंडता के दिव्य प्रतीक हैं। ये तीर्थ वस्तुत: भारतीय जातीयता सांस्कृतिक अखंडता और तीर्थयात्रियों की स्वर्णिम समन्वय माला के मनके हैं।
हमारे पूर्वजों ने इस देश में महत्त्वपूर्ण तीर्थो की स्थापना एक ही जगह न करके देश के चारों कोनों पर की है ताकि एक प्रान्त के लोग अपने ही प्रान्त तक सीमित न रहें। वे दूसरे क्षेत्र की बोली, भाषा, वहां की प्राकृतिक छटा और संस्कृति से भी परिचित हों। अनेकता में एकता की भावना भी इससे पुष्ट होती है।
भारत के इन्हीं तीर्थों में सबसे अधिक आदरणीय, पूजनीय और महत्त्वपूर्ण तीर्थों में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखने वाला बदरीनाथ चार धामों में सर्वश्रेष्ठ तथा गंधमादन पर्वत श्रृंखलाओं में नर और नारायण पर्वतों के मध्य पावन तीर्थ ‘बदरीनाथÓ देश-विदेश में बसे करोड़ों हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक है।
3133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर का निर्माण 8वीं सदी में गुरू शंकराचार्य द्वारा किया गया था जिसको वर्तमान स्वरूप विक्रमी 15वीं शताब्दी में गढ़वाल नरेश ने दिया था। इस क्षेत्र में आने वाले बर्फीले तूफानों के कारण यह मंदिर कई बार क्षतिग्रस्त हुआ और कई बार इसका निर्माण हुआ।
असीम आनन्द और दिव्य लोक की अनुभूति प्रदान करने वाली भगवान बदरीनाथ की पावन भूमि को कई नामों से जाना जाता है। विशाल नामक राजा का तपक्षेत्र होने के कारण ‘बदरी विशालÓ, भगवान विष्णु का वास और प्राचीन काल में बदरी (जंगली बेर) की झाडिय़ों युक्त क्षेत्र होने के कारण इस क्षेत्र का नाम ‘बदरी वनÓ पड़ा जो कालान्तर में ‘बदरीनाथÓ हो गया। स्कन्दपुराण में बदरीनाथ धाम के चार युगों में अलग-अलग नामों का उल्लेख मिलता है। उसके अनुसार सतुयग में मुक्तिप्रदा, त्रेता में योग-सिद्धा, द्वापर में विशाला और कलयुग में बदरिकाश्रम है। ऐसे ही अनेक धर्मशास्त्रों से यह ज्ञात होता है कि हिन्दुओं का यह पावन तीर्थ युगों युगों से चला आ रहा है।
धर्मशास्त्रों के अनुसार यह देवभूमि, द्वापर और त्रेता में योग सिद्धि प्रदान करती थी किन्तु कलियुग में मुक्ति देती है। ऐसी मान्यता है कि भगवान बदरीनाथ के दर्शन मात्र से ही मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होता है। तीर्थो से सर्वश्रेष्ठ बदरीनाथ धाम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान कर प्रत्येक श्रद्धालु और भक्त की हर मनोकामना पूरी करता है।
ऐसी मान्यता है कि भगवान बदरीनाथ की जिस मूर्ति को नारद पूजते थे, वह मूर्ति आज भी यहीं स्थापित है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यह मूर्ति बौद्धों से संबंधित है जबकि हिन्दू इसे साक्षात ‘नारायणÓ के रूप में पूजते हैं। यह मूर्ति मंदिर के गर्भ गृह में अधिष्ठापित है जहां जन सामान्य का प्रवेश वर्जित है। सिर्फ मंदिर के पुजारी रावल और उनके सहयोगी ही वहां प्रवेश कर मूर्ति का स्पर्श कर सकते हैं।
बदरीनाथ धाम स्थित 15 मीटर ऊंचे भगवान विष्णु के मंदिर में पहुंच कर श्रद्धालुओं को अलौकिक आनन्द और सुकून मिलता है। मंदिर के परिसर में 15 मूर्तियां हैं। इन दर्शनीय प्रतिमाओं के अतिरिक्त तीन भागों में विभाजित मंदिर के गर्भगृह, दर्शन मंडप और सभा मंडप भी अत्यन्त आकर्षक हैं। विशाल बदरीनाथ मंदिर में श्री बदरी विशाल श्यामल स्वरूप में बहुमूल्य वस्त्र आभूषण एवं मुकुट धारण किये हुए सुशोभित हैं। उनके ललाट में हीरा लगा हुआ है। दाहिनी ओर कुबेर और गणेश तथा बायीं ओर लक्ष्मी व नारायण हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार के समीप ही गरूड़ की काले पाषाण की मूर्ति है।
इस क्षेत्र में पेड़-पौधे भी ऐसे दिखते हैं मानो ‘शिवोऽहं शिवोऽहंÓ भावना रखते हों। भागीरथी में स्नान करके तट पर बैठकर एकांत में भजन करने की जितनी सुविधा इस पुण्य क्षेत्र में है, वह यहां से नीचे गंगा तट के दूसरे मंदिरों में नहीं है। श्रद्धापूर्वक गंगा में स्नान करना, गंगाजल का पान करना, गंगाजी की पूजा करना, गंगाजी का भजन करना, ‘हे मातु गंगे, हे भागीरथी! हे जगजननी, हे जटा शंकरी!ÓÓ आदि शब्दों से गश्वद् स्वर में गंगा का नाम संकीर्तन करना अर्थात् जिस भागीरथी की निष्काम उपासना से चित्त शुद्धि होती है, इस क्षेत्र का सबसे बड़ा पुण्य लाभ है।
बदरीनाथ क्षेत्र अत्यन्त रमणीय स्थान है। सौन्दर्यानुभूति का आनन्द ही नहीं बल्कि बहुमुखी ईश्वरीय लीलाओं के प्रत्यक्ष वीक्षण का एक असाधारण सुख भी यहां भरा रहता है।
यहां की प्रकृति की शोभा का वर्णन ‘दिव्य-दिव्यÓ इन शब्दों से दिया जा सकता है। दिव्य प्रकृति है ब्रह्म है। प्रकृति की शोभा ही ब्रह्म की शोभा है। शुद्ध हो या अशुद्ध, जो व्यक्ति सम्पूर्ण प्रकृति को ब्रह्म रूप में जानता है, वही सच्चा दार्शनिक है। वह सदा ब्रह्म के दर्शन करता है। फिर उसे योगियों की समाधि से कोई लाभ नहीं होता, वह स्वयं समाधि स्वरूप बन जाता है।
बदरीनाथ धाम के समीप कई अन्य पवित्र स्थल भी हैं इन्हीं में से एक ‘तप्त कुंडÓ भी है जिसके संबंध में धर्म शास्त्रों में यह उल्लेख मिलता है कि आदिकाल में ऋषि मुनियों की एक सभा में जब अग्निदेव ने सर्व भक्ष्य पाप से मुक्ति का उपाय पूछा तो ऋषियों की आज्ञा पाकर व्यास जी ने उन्हें बदरीनाथ की यात्र करने को कहा। बदरीनाथ पहुंच कर अग्निदेव ने नारायण की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया और अभयदान का वरदान मांगा। तब भगवान ने अग्निदेव से कहा कि इस पवित्र क्षेत्र के दर्शनमात्र से ही प्राणियों के सब पाप दूर हो जाते हैं अत: तुम भी आज से पाप मुक्त और पवित्र हो। तभी से अग्नि देव बदरीनाथ में तप्त जल के रूप में स्थित हैं।
इस तप्त कुंड में स्नान करने से महा पापियों के भी पाप नाश हो जाते हैं। औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध गर्म जल के इस कुंड में स्नान के उपरान्त ही श्रद्धालु बदरीनाथ मंदिर के दर्शन करते हैं।————— (उर्वशी)

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