दैनिक कार्यों की नीरसता से हताश न हों

मेज-कुर्सी पर बैठ कर ऑफिस का काम करने वालों की तुलना में होम मेकर महिला सदैव लाभ में रहती है। उसे अपनी व्यस्तताओं के दौरान बार-बार नीचे झुकने, तन कर खड़ा होने और शरीर को दाएं-बाएं मोड़ने की आवश्यकता पड़ती है। इन विविध हरकतों का शरीर और अंगों पर सुखद प्रभाव पड़ता है और स्वाभाविक लोच और निरोगता कायम रहती है। इसके प्रतिकूल दफ्तरों में बैठ कर काम करने वालों को अंग सिकोड़ने, सिमटने और फैलने का उपयुक्त अवसर नहीं मिल पाता, अतः उन पर आलस्य और शिथिलता-सी छायी रहती है। घरेलू महिला की थकावट और बोरियत के कारण सामान्यतः भिन्न होते है।
शरीर को ठीक और सही कोणों से आगे-पीछे मोड़ने या दाएं-बाएं हरकत देने से अंगों की स्वाभाविक लचक और शक्ति नष्ट नहीं होने पाती, अतः अपने चलने-फिरने और बैठने के ढंग का आलोचनात्मक निरीक्षण करें। किस-किस शारीरिक गति को सुखद और नये अंदाज से ढाला जा सकता है, उदाहरणार्थ, रस्सी पर कपड़े टांगने या बिस्तर बिछाने हों तो बांहों को हरकत देने से पहले गहरी सांस लेना भी न भूलिये। फेफड़ों में हवा भरने के बाद आप स्वयं को हल्का-फुल्का अनुभव करेंगी। अंग अनावश्यक दबाव और खिंचाव से सुरक्षित रहेंगे और बांहों को इधर-
उधर हरकत देना अपेक्षाकृत सरल हो जायेगा।
इसी प्रकार पानी से भरी हुई बाल्टी या कोई अन्य वजन उठाने से पूर्व भी गहरी सांस लेना लाभकारी होगा और आप कमर के दर्द आदि से सुरक्षित रहेंगी। सांस उस समय तक खारिज नहीं करनी चाहिए जब तक बाल्टी जमीन पर न रख दी जाये। अधिक दूर जाना हो तो बाल्टी नीचे रख कर उचित विरामों में बार-बार सांस लेकर फासला तय करें।
घर में झाड़ू देने, सफाई, बर्तन मांजने या वजन उठाने का कोई-सा काम हो, उसे सदा हल्के-फुल्के अंदाज में गहरी सांस के उतार-चढ़ाव के साथ सम्पन्न करने का प्रयत्न करें। आरंभ में शायद यह बात आपको अजीब-सी लगे लेकिन घबराइये नहीं। अपने चलने-फिरने और उठने-बैठने का अंदाज बदलने के संकल्प पर जमी रहें। एक बार यह बात मस्तिष्क में बैठ गयी तो शारीरिक गतिविधियां अपने आप उसके आधीन हो जायेंगी।
गृहिणी को दफ्तर से काम करने वालों की अपेक्षा यह सुविधा प्राप्त है कि वह अपनी ‘बॉस’ स्वयं ही होती है और अपनी सुविधा के अनुसार बड़ी सरलता से योजना बना सकती है।
काम की योजनाबंदी से अधिक महत्त्वपूर्ण, आवश्यक, अनावश्यक और कम महत्त्वपूर्ण कामों में अंतर और भेद करना है। कई महिलाएं एक दिन में घर के सारे बखेड़े निपटाने का प्रयत्न करती हैं। यह बात उचित नहंीं। अपनी सामर्थ्य से अधिक काम करने से थकान और उकताहट के सिवाय कुछ प्राप्त न होगा। प्रत्येक काम क्रमवार और सुघड़ता से सम्पन्न करना चाहिए।
दिन की समाप्ति पर थकान और बोरियत का शिकार हो जायें तो अपनी योजना का आलोचनात्मक निरीक्षण करें कि आपकी शक्ति किन-किन कामों में निरुद्देश्य व्यय हुई। कहीं ऐसा तो नहीं कि काम के शौक में आपने ऐसा कार्यक्रम बना डाला हो जिस पर अमल करना संभव न हो।
कार्यक्रम बनाते समय सबसे पहले दिन के आवश्यक कार्य व समय निश्चित करें। उदाहरणार्थ, दोपहर के खाने को लें। उसके बारे में आपको समय से पूर्व पता होता है कि किस समय खाया जायेगा और क्या कुछ पकना है। सब्जी खरीदने और पकने तक का समय अनुमानतः निश्चित कर लें। उस समय के अंदर-अंदर चूल्हे का सारा काम समाप्त हो जाना चाहिए।
प्रतिदिन खाने के लिए दाल-सब्जी का चुनाव भी खासी टेढ़ी समस्या होती है। बढि़या तरीका यह है कि सप्ताह भर का मेन्यू किसी समय बैठ कर निश्ंिचतता से बना लें। इस प्रकार प्रतिदिन के सिर-दर्द से छुटकारा मिलेगा और समय बचेगा तथा आप मानसिक चिंता और दिमागी तनाव से सुरक्षित रहेंगी। सप्ताह या महीने भर का राशन इकट्ठा खरीद लेने से और अधिक समय बचाया जा सकता है।
खाने के मीनू की तरह घर के अन्य काम भी व्यवस्थित ढंग से सम्पन्न करना आवश्यक है। पूरे दिन का कार्यक्रम इस प्रकार बनायें कि एकरसता का शिकार न होने पायें। उदाहरणार्थ, झाड़-पोंछ या कमरों की सफाई के दौरान आपको बार-बार झुकना पड़ता है। उचित यह है कि झाड़-पोंछ से निपट कर ऐसा काम शुरू करें जिसमें आपको बैठकर जरा सुस्ताने का अवसर मिल सके।
काम के दौरान मानसिक और शारीरिक शक्ति को शांति पहंुचने के लिए थोड़े-थोड़े विराम के लिए आराम करने की व्यवस्था करें। जब आप बर्तन आदि धो चुकें और झाड़-पोंछ से निपट लें तो पांच मिनट के लिए बिस्तर पर लेट जायें और मस्तिष्क से हर प्रकार के विचार और चिंताएं निकाल दें। काम जो अभी करने बाकी हैं, उनके बारे में चिंतातुर होने या कुढ़ने की जरूरत नहीं। आपका कार्यक्रम बना हुआ है। समय पर सब काम हो जायेगा। चिंता और परेशानी कैसी?
पांच मिनट का विराम अधिक नहीं लेकिन उसके प्रभाव बड़े दूरदर्शी होते हैं। उससे अंगों और शरीर को आराम और शांति मिलती है। सामान खरीदने या किसी सहेली के यहां जाने के लिए कपड़े बदलने से पहले भी पांच मिनट आराम करें। यह समय की बरबादी नहीं। अपने आपको शांतिपूर्ण, सचेत-सजग और तरोताजा रखने की सरल-सी मनोवैज्ञानिक विधि है। पांच मिनट आराम करने के बाद आप नया काम पूरी तन्मयता और लगन से कर सकेंगी।
दैनिक कार्यों की नीरसता से हताश न हों बल्कि बुद्धिमानी से उनकी कटुता किसी प्रकार कम अवश्य की जा सकती है। कार्यक्रम इस प्रकार बनायें कि प्रतिदिन एक ही अंदाज में काम का आरंभ न करना पड़े। अदल-बदल कर विभिन्न कामों को प्राथमिकता दें। अड़ोस-पड़ोस की स्त्रिायों से उनकी समस्याओं और काम की कार्यविधि पर बातचीत करें। संभव है इस प्रकार कोई नयी बात पता चल जाये जिससे काम की एकाग्रता की अनुभूति कम हो जाये।
——– (उर्वशी)
——-विभा प्रकाश श्रीवास्तव

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