नैनीताल: खूबसूरत झीलों का जनपद

लघु हिमालय के धुर दक्षिण में 1938 मीटर की ऊंचाई पर स्थित विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल नैनीताल भारत का एक ऐसा जनपद है जहां पर सबसे अधिक झीलें हैं। हरे भरे वृक्षों से आच्छादित विशाल पहाडि़यों की तलहटी पर स्थित प्राकृतिक सौन्दर्य के इस अनुपम उपहार को देखने प्रतिवर्ष सैंकड़ों की संख्या में देश विदेश से सैलानी यहां आते हैं।
नैनीताल नगर मूल रूप से चारों ओर से सात पहाडि़यों क्रमशः अयारपाटा, देवपाटा, हांडी बांडी, चीन पीक, अल्मां, लडियाकाटा और शेर का डांडा से घिरा है। नैनीताल की खोज अंग्रेज शिकारी पीटर बैरन ने 1841 में की थी। नैनीताल का उल्लेख तीन ऋषियों के सरोवर के रूप में स्कंध पुराण के मानस खंड में भी मिलता है। बैरन ने तत्कालीन थोकदार नरसिंह से नैनीताल खरीदा और इसे अंग्रेजों की ग्रीष्म राजधानी के रूप में विकसित किया।
नैनीताल का मुख्य आकर्षण नैनी झील है। लगभग 1466 मीटर लंबी और 466 मीटर चौड़ी इस झील का क्षेत्राफल 48.75 हेक्टेयर है। झील की अधिकतम गहराई 24.5 मीटर तथा औसत गहराई 18.55 मीटर है। झील चारों ओर से नैना देवी मंदिर, पाषण देवी मंदिर, गोलज्यू मंदिर आदि धार्मिक स्थलों से घिरी है। पर्यटकों के लिए झील में नौका विहार, तैराकी तथा पाल नौकायन की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
झील में जल विहार करती बत्तखें पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं। पंक्तिबद्ध रूप से जल क्रीड़ा करती इन बतखों को देखना भी अपने आप मेें एक अनूठा अनुभव है। नैनी झील में विभिन्न प्रजातियों की मछलियां भी पाई जाती हैं। इनमें ’टोर-टोर‘, ’चमक‘, ’लेबिओ-रोहिता‘ आदि मुख्य हैं। इन मछलियों का शिकार करना गैर कानूनी है। पर्यटकों को चाहिए कि वे बतखों तथा मछलियों से दोस्ती कायम करें तथा झील में ऐसी कोई भी वस्तु न डालें जिससे प्रदूषण होता हो।
नैनीताल का सबसे लोकप्रिय पर्यटक स्थल चाइना पीक है। 2611 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस शिखर से हिम आच्छादित नंदादेवी, कामेट, त्रिशूल और पंचाचूली की चोटियां तथा अल्मोड़ा व रानीखेत दिखायी देते हैं। लडियाकांटा से पूर्व दिशा में पिकनिक स्थल ’स्नोव्यू‘ है। यहां स्थित दूरबीन से बर्फीली पहाडि़यों का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। स्नोव्यूू तक कार अथवा ’रोपवे‘ से जाया जा सकता है।
’टिफिन टाप‘ तक एक सर्पाकार सड़क से होकर पहुंचा जाता है। ऊंचे-ऊंचे वृक्ष, पक्षियों का कलरव, स्वच्छ हवा और प्रकृति का नैसर्गिक सौंदर्य मन को मोह लेता है। कोलाहल से दूर शांति प्रेमी पर्यटक अपना रैनबसेरा किलबरी में बना सकते हैं। यहां ठहरने के लिए वन विभाग का विश्राम गृह उपलब्ध है। धार्मिक स्थलों में नैना देवी, पाषाण देवी तथा नैनीताल से एक किमी पहले हनुमानगढ़ी है। हनुमानगढ़ी से सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य देखा जा सकता है। अन्य दर्शनीय स्थानों में वेधशाला, गवर्नर हाउस, पोलो ग्राउंड व महादेव मंदिर मुख्य हैं।
नैनीताल से 22 किमी दूर पूर्व दिशा में अपने टापू के लिए प्रसिद्ध भीमताल झील है। समुद्र सतह से 1356 मीटर ऊंची, 46.26 हेक्टेयर क्षेत्रा में फैली यह झील चारों ओर से पहाडि़यों से घिरी है। इस झील को महाभारत के पांडवों से जोड़ा जाता है। पांडवों में सबसे बलशाली भीम के नाम पर झील से लगा भीमेश्वर का मंदिर है। मंदिर से थोड़ी ही दूर उत्तर में ’कर्कोटक‘ शिखर है जहां कर्कोटक नामक नाग की बांबी है। यहां से करीब 12 मील दूर ’छोटा कैलाश‘ नाम का पर्वत है। कहा जाता है इसी शिखर पर भगवान शंकर ने पार्वती को योग प्रणालियां सुनाई थी।
महाशिवरात्रि को यहां भारी मेला लगता है। भीमताल से 4 किमी दूर नौ कोनों के लिए प्रसिद्ध नौकुचियाताल झील है। जनपद की इस सबसे बड़ी झील में देश-विदेश से पक्षी आते हैं। झील में नौकायन, तैराकी और मछली पकड़ना सम्भव है। 40 मीटर गहरी इस झील में हर वक्त खिले ’कमल‘ इसके सौंदर्य में चार चांद लगाते हैं। इस झील में नौका विहार करने के लिए पर्यटकों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है।
भवाली मार्ग पर मेहरागांव से पांच किमी दूर पश्चिम दिशा में सात झीलों का एक विस्तृत समूह ’सातताल‘ नाम से प्रसिद्ध है। चीड़ व बाज के सघन वनों से घिरा यह स्थान निस्संदेह एक महत्त्वपूर्ण पर्यटक स्थल है। सात झीलों क्रमशः रामताल, सीता ताल, लक्ष्मण ताल, हनुमानताल, शत्राुध्न ताल, गरूड़ ताल, नलदमयंती ताल में से हनुमानताल और शत्राुध्न ताल सूख चुके हैं। पर्यटकों के ठहरने के लिए यहां पर कुमाऊं के आवासगृह के अलावा कई रिसाट भी हैं।
नैनीताल से दस किमी दूर रामनगर-नैनीताल मार्ग पर खुर्पाताल नाम से एक छोटी झील है। इस झील का आकार गाय के खुर जैसा है। सम्भवतः इसीलिए इस झील को खुर्पाताल नाम दिया गया। अप्रदूषित, स्वच्छ, पारदर्शी जल के कारण यह झील मछली पकड़ने वालों और तैराकों में बेहद लोकप्रिय है। इन झीलों के अतिरिक्त नैनीताल नगर में एक सुखाताल झील भी है जो सिर्फ बरसात के मौसम में ही जल मग्न रहती है।
ये सभी झीलें राष्ट्र की संपत्ति हैं। इनके संरक्षण और रख रखाव की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं बल्कि हम सभी की है। आइए हम प्रण करें कि हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे इन खूबसूरत झीलों को नुकसान पहुंचाता हो।
—— (उर्वशी)
——- दीपक नौगांई ‘अकेला’

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