पति पत्नी ही नहीं, एक दूजे के जिगरी दोस्त भी बनिए

दोस्त का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता है जो खून का न होते हुए भी भावनात्मक रूप से बहुत करीब का होता है। यहां पर दुराव-छिपाव नहीं होता। दिल खोल कर सुख-दुख की बातें होती हैं।
यही रिश्ता अगर पति-पत्नी अपने बीच भी कायम कर लें तो उनका दांपत्य सुखपूर्वक गुजरेगा लेकिन ऐसे दंपति बहुत कम मिलेंगे जो सच्चे दोस्तों की तरह रहते हों वर्ना शादी के कुछ साल बाद ही उनका रिश्ता इतना रूटीन और ऊबाऊ हो जाता है कि खुशी की तलाश में वे कभी-कभी विवाहेत्तर संबंधों के जाल में फंस जाते हैं।
मनोवैज्ञानिकों ने जब कुछ सुखी दांपत्य जीने वाले लोगों का साक्षात्कार लिया तो उनकी बातों से जाहिर हुआ कि इसका श्रेय वे पति-पत्नी में मित्रावत खुला व्यवहार, आपसी नजदीकियों और एक दूसरे को समझ पाने की क्षमता को देते हैं।
दरअसल देखा जाए तो पति पत्नी के झगड़े बहुत छोटी-छोटी सी मामूली बातों को लेकर होते हैं। यदि वे छोटी-मोटी बातों को सही परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने का ढंग सीख लें, अपनी सोच को विस्तृत कर देखें तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हो जाएगा।
अपने साथी में अगर हीन भावना है तो उसका उत्तरदायी जीवन साथी को ही माना जाएगा। दोनों को चाहिए कि वे एक दूसरे का मनोबल बढ़ायें, उनके गुणों की समय-समय पर चर्चा कर के केवल नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए हर समय एक दूसरे की आलोचना ही न करते रहें। जैसे दोस्त की आलोचना करते रहने से दोस्ती में दरार आ जाती है वैसे ही पति-पत्नी के संबंधों में भी होता है। मित्रा से होने वाली अनबन समय का अंतराल भुला देता है लेकिन ऐसा पति के साथ नहीं होता क्योंकि उनके साथ तो एक ही छत के नीचे सदा रहना होता है। इसलिए समझदारी इसी में है कि छोटी-मोटी तकरार को अनावश्यक रूप से तूल न दें।
एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि वैवाहिक जीवन में एक ऐसा मुकाम आता है जब पति-पत्नी के घुलमिल जाने की इंतिहा होती है। कितनी सुखद स्थिति होती है यह।
दरअसल दांपत्य जीवन मंे प्यार का अर्थ बहुत व्यापक हो जाता है। सारे रिश्ते जैसे प्रिय के व्यक्तित्व में समाहित होते हैं। उनमें हजार नेमतों के बराबर रिश्ता होता है जिगरी दोस्त का जिसमें कमिटमेंट्स को मुद्दा बनाने की गलती कभी नहीं करनी चाहिए। इस दोस्ती की नींव होनी चाहिए ‘आदर- सम्मान-इज्जत। ‘सम्मान’ एक दूसरे के व्यक्तित्व का, एक दूसरे की अस्मिता का।
हर व्यक्ति की निजता, उसके सपने, आकाक्षाएं, कमजोरी और क्षमताएं होती हैं। जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार करने का दर्शन जीवन को कलहपूर्ण होने से बचाता है। इस उम्र में जीवन साथी को अपने अनुसार ढाल पाना संभव नहीं और जब एक दूसरे को अपनी इच्छानुसार चलाने की जिद ठान लेते हैं तभी उनका दांपत्य बदरंग होने लगता है। विविधता से ही जीवन रंग-बिरंगा है, हम सभी अक्सर यह भूल जाते हैं।
कई पत्नियां इतनी उथली व भीतर से डरपोक होती हैं कि पति अगर उनसे दफ्तर की कोई समस्या, कोई निजी परेशानी का जिक्र करते हैं तो ढाढस देने के बजाए स्वयं आतंकित हो उन्हें और ज्यादा परेशान कर बैठती हैं।
ऐसी बातें करने वाली स्त्राी से भविष्य में पति अपनी समस्याएं छुपाने लगेंगे और स्वयं अकेले घुटते रहकर हो सकता है पत्नी पर बेवजह झल्लाने भी लगे। इसलिए हर पत्नी को चाहिए कि पति की समस्या सहानुभूतिपूर्वक सुनें। फिर उसे विश्वास दिलायें कि आपको उनकी क्षमताओं पर विश्वास है और हर परिस्थति में आप उनका साथ देगी। उनका सहारा बनेगी। कोई भी समस्या जीवन से बड़ी नहीं है। उसका हल सोचा जा सकता है।
ऐसा मित्रावत व्यवहार पति को कितनी ऊर्जा देता है, इसका शायद आपको अंदाज भी न हो। एक अनपढ़ गांव की औरत में भी ये गुण हो सकते हैं और एक इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, कई विषयों में एम.ए. पी.एच.डी. करने वाली औरत में नहीं। कुछ गुण, कुछ संस्कारों से इन बातों का ताल्लुक रहता है।
सच्ची दोस्ती में अहम् कभी आड़े नहीं आता। यह एक खुशनुमा रिश्ता है। दोस्ती की डगर सब रिश्तों में सबसे ज्यादा समतल है और मंजिल तक सीधे पहुंचाने वाली है। हर इंसान की मंजिल क्या है, इससे तो आप वाकिफ ही होंगे। राह वह कोई भी पकड़े, सुख, शांति, प्यार, यही तो वह चाहता है। यह उसे सिर्फ जिगरी दोस्त ही अहसास करा सकता है। (उर्वशी)

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