प्यार का बदलता स्वरूप

प्यार शब्द को परिभाषित करना आसान नहीं। यह एक ऐसा मधुर अहसास है जिससे शायद ही कोई हृदय अछूता रहा हो। हर इंसान के जीवन में यह जरूरत चाहे अनचाहे आती ही है। स्त्री का पुरुष एवं पुरुष का स्त्री की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक बात है। यदि यह आकर्षण नहीं होता तो शायद इस संसार की रचना ही नहीं होती। न लैला-मजनूं की कहानी बनती, न सोहनी-महिवाल की दास्ताने मुहब्बत होती, न ही अमर प्रेम का प्रतीक ताजमहल होता।
यकीनन प्यार की अहमियत यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही होने लगती है जहाँ से युवक युवतियों के बीच महत्त्वपूर्ण शारीरिक परिवर्तनों का सिलसिला शुरू होता है। इस दौर में उनकी बुद्धि का प्रखर होना अथवा भावनाओं में झंझावात का वेग भर जाना, चित में चंचलता और आँखों में अनगिनत सपनों का समाना जैसे मानसिक परिवर्तन भी इसी दौरान में होते हैं अतः किशोरावस्था में पदार्पण करते ही समूचा व्यक्तित्व बदल जाता है। यहीं से विपरीत सेक्स के प्रति अजीब सा खिंचाव होने लगता है।
कालांतर में यही आकर्षण प्यार का रूप धारण करता है और दो दिलों के बीच मुहब्बत रजनीगंधा के फूलों की तरह खिलती है। प्रेमियों का आपस में मिलना कोई अपराध नहीं। मिलन का सुख ही संबंधों को पूर्णतया मजबूत बनाता है।
’तमाम उम्र सपनों में ही गुजर जाये तो यह मुहब्बत हुई ही क्यों जिसमें हकीकत थी ही नहीं। यदि प्यार सच्चे मन से किया जाता है तो निःस्संदेह उसकी मंजिल शादी ही होनी चाहिए। अगर प्यार किसी से करें और शादी किसी और से करें तो समझ लीजिए किसी के जज्बात को मात्रा शौकिया तौर पर ही लिया गया था।
आज के युग में प्यार की परिभाषा बदलाव की ओर है। प्रेम दो पवित्रा दिलों का मिलन नहीं बल्कि जिस्मानी रिश्ता बनकर रह गया है। बदलते वक्त के साथ-साथ लड़के-लड़कियों का मिलना फैशन के तौर पर अपनाया जा रहा है। जब तक शारीरिक प्यास दिग्भ्रमित नहीं हो जाती, तब तक मुहब्बत सीमित दायरे में ही चलती है तथा जब किशोरों का अपने आप पर नियंत्राण कठिन हो जाता है तो वे आग से खेलने लगते हैं।
तत्पश्चात् यदि प्रेमिका प्रेमी के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दे तो वही सात जन्मों तक साथ निभाने वाला सपनों का राजकुमार बात टाल जाता है। अतः प्रेम करने के लिए जैसी भी मिली ठीक है किन्तु जीवन संगिनी के रूप में एक अद्वितीय नारी की कल्पना होती है जो दहेज लाने वाली, पढ़ी लिखी, नौकरी पेशा, सुंदरता में मिस वर्ल्ड नहीं तो मिस इंडिया के आस पास हो अर्थात युवक जैसा भी हो लेकिन पत्नी गुणों की खान होनी चाहिए। आखिर ऐसा क्यों?
मुहब्बत दैहिक संबंधों को नजर में रखते हुए की जाए तो उसे प्यार नहीं, वासना कहा जाएगा जिसकी कोई मंजिल नहीं होती। वस्तुतः विवाह पूर्व यौन संबंध हमारे समाज में अनैतिक समझे जाते थे लेकिन आजकल नैतिकता के इस बदलते मापदण्ड को आधुनिकता का प्रतीक माना जाता है। यही नहीं बल्कि जो जितने ज्यादा व्यक्तियों के साथ जिस्मानी रिश्ता रखता है, वह उतना ही अत्याधुनिक समझा जा रहा है। इन संबंधों के चलते शादी विवाह की जरूरत महसूस नहीं की जाती।
आखिर इन रिश्तों का अर्थ क्या है ? यौन तृप्ति या फैशन ? आज हमारे संपूर्ण समाज का ढांचा बदल चुका है। टेलीविजन और फिल्मों के अश्लील दृश्यों की देखा देखी करके जहाँ युवा वर्ग पाश्चात्य सभ्यता में लीन हो गया है, वहीं मासूम बच्चों पर भी इसका सीधा बुरा असर पड़ रहा है।
निःस्संदेह नाबालिग बच्चों तथा युवाओं को उचित संस्कारों की जरूरत है। हमारा समाज, आस-पास का वातावरण, पारिवारिक माहौल और स्कूल या कॉलेजों में दी जाने वाली शिक्षा इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। माना कि जीवन में प्यार की अनिवार्यता एवं अहमियत को नकारा नहीं जा सकता किन्तु इसका भी एक शिष्टाचार होता है। मुहब्बत दो पवित्रा आत्माओं का मिलन है तो इसमें पवित्राता ही है और अगर वासना पूर्ति के लिए है तो इसकी कोई मंजिल नहीं होती। (उर्वशी)

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