फेसबुक पर कनफेशन

एक नया चलन आज की युवा पीढी में लोकप्रिय हो रहा है, यह है फेसबुक पर कनफेशन यानी कबूलनामा। १९ फरवरी को कनफेशन डे के रूप में पहले से मनाया जाता रहा है लेकिन फेसबुक पर तो एनी डे कनफेशन डे हो सकता है। खास बात यह है कि आप अपनी पहचान गुप्त रख सकते हैं। इसमें संदेह नहीं कि कनफेशन राहत पाने का एक सरल सुलभ आसान तरीका है।
इंटरनेट के एक्सपर्ट्स जो इसके हिमायती हैं उनका मानना है कि कई बार व्यक्ति के दिल मेंं अपराध बोध को लेकर घुटन होने लगती है जिसका उसके व्यक्तित्व पर, उसके मन और यहां तक कि साइकी पर भी बुरा असर पडता है और लंबे समय तक बने रहने पर मनोविकार का कारण बन सकता है। ऐसे में फेसबुक का कनफेशन मंच उनके लिए मददगार साबित होता है जहां वे निडर होकर अपना राज औरों से शेयर कर सकते हैं।
ये कनफेशन ज्यादातर प्यार, नफरत, उत्पीडन लीक से हटकर होने जैसी बातों से संबंधित होते हैं।
जैसे रेहाना ने लिखा – कुछ समय पहले तक मैं लिस्बियन थी। फिर अमन से मेरी शादी हो गई। अब मैं नार्मल हूं लेकिन मेरी पिछली जिंदगी मेरे लिए शर्मिंदगी का बायस है।
अविका जिसने पिछले सप्ताह ही अपना १६वांं बर्थडे मनाया है, अपने एक्स ब्यॉयफ्रेंड राहुल को डिच करके पछताते हुए कनफेस करती है – मैंने उत्सव को इसलिए लिफ्ट दी क्योंकि वह राहुल से ज्यादा अमीर था लेकिन उससे मेरी दोस्ती दो महीने भी नहीं चली, उसे मुझसे सुंदर ल$डकी जो मिल गई थी। उसने मुझे डिच कर दिया। राहुल मेरा सच्चा दोस्त था, बेहद ंिसंसियर और केयरिंग। मैं अपने को इस अपराध के लिए कभी माफ नहीं करूंगी, भले ही राहुल माफ कर दे।
ग्यारह वर्षीय वंश ने एक दिन दोपहर में सबसे छुपकर कार चलानी चाही। उसकी इस नादानी से जब उनका पेट डॉग ब्रूनो कुचलकर मर गया, तब वह बहुत रोया, उसे घरवालों की नाराजगी भी झेलनी प$डी। उस हादसे को वह शायद ही कभी भुला पाये। जब जब उसकी याद उसे आत्मग्लानि से भर देती है। उसने इसे फेसबुक के कबूलनामे पन्ने पर कबूल किया है।
हर व्यक्ति के जीवन में ऐसा कुछ न कुछ रहस्य जरूर छिपा होता है जो वह किसी को भी बताने से डरता है। कोई ऐसी बात होती है जो उसे घुन की तरह खाए जाती है वह प्रायश्चित करना चाहता है। क्रिश्चियन्स में चर्च में जाकर कनफेशन करने की सुविधा है। कनफेशन के बाद लोग मानसिक रूप से काफी रिलेक्स फील करते हैं।
संयुक्त परिवारों के विघटन तथा आज की लाइफ स्टाइल के कारण अकेलापन हर व्यक्ति की नियति बनती जा रही है। छोटे परिवारों में भी कम्युनिकेशन गैप रहने लगा है। ऐसे में भावनात्मक आउटलेट हर किसी की प्राब्लम बन गई है।
इसी सिलसिले में एक क$डी दिल्ली मेट्रो में सफर करने वाले पैसेंजर्स का कनफेशन पृष्ठ है। इसमें मेट्रो में होने वाली डे टूडे की दिलचस्प घटनाएं शेयर की जाती हैं। यहां पर मिलने वाले लोगों का साथ बस कुछ ही देर का होता है। केमिकल अट्रैक्शन, कुछ हल्की फुल्की छे$डछा$ड के कनफेशन से ये कनफेशन पेज भरे रहते हैं।
मेट्रो सिटीज में यह चलन तेजी से बढ रहा है। स्टूडेंट्स ने अपने स्कूल कॉलेज व पब्लिक प्लेसेज के नाम से कनफेशन पेज बनाए हुए हैं। यहां तक कि अब फोन के जरिये ईश्वर को सामने मानकर भी पश्चाताप किया जाने लगा है।
इस तरह के कनफेशन में कितना दम है। इस पर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। कई समाजशास्त्री, मनोवैज्ञानिक इसे व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत दमदार इलाज मानते हैं।
कई इससे जरा भी सहमत नहीं है। उनका कहना है इंटरनेट की वर्चुअल वल्र्ड का वास्तविक दुनियां में कोई महत्त्व नहीं है। फेसबुक पर आपकी पहचान आपका फेस नहीं है तो वह फेसबुक कैसी? यहां का सच सच नहीं होता। ये सब कमर्शियल बातें हैं। अपनी साइट को प्रमोट करने का उसकी साख बचाने के फंडे, टोटके हैं। इनका उद्देश्य मनोरंजन करना है। इनकी सच्चाई की कोई गारंटी नहीं होती।
बहरहाल वक्त ही इनकी इंपोर्टेंस बताएगा।
————–उषा जैन ‘शीरीं




Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *