बच्चों को यौन शोषण से बचाएं

आजकल सभी मां बाप अपने बच्चों को लेकर चिंतित रहने लगे हैं। सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें चौबीसों घंटे आखिर नजर के सामने तो रखा नहीं जा सकता। वे बाहर खेलने भी जाएंगे। पढ़ने के लिए स्कूल भी जायेंगे।

बच्चे 3 से 5 वर्ष की उम्र में बेहद वल्नरेबल होते हैं यानी कोई भी उनको चॉकलेट टाफी के बहाने आसानी से बरगला सकता है। बच्चे दुनियां के छल प्रपंच से अनजान भोले होते हैं। उनसे जो प्यार से बात कर ले, वे उससे घुल मिल जाते हैं। कुछ बड़े हुए तो वे उन्हें भैय्या पुकारने लगते हैं। ज्यादा बड़े हैं तो वे अंकल बन जाते हैं।

यह आज के युग की त्रासदी है कि सुरक्षा को लेकर हमें बच्चों के मन में बचपन से ही नफरत के बीज बोने पड़ते हैं। आदमियों से उन्हें यूं सावधान करना पड़ता है मानो वे इंसान न होकर खून चूसने वाले डेªकूला हों।

यह एक नाजुक स्थिति है। डराने से बच्चे की साइकोलोजी पर गलत प्रभाव पड़ सकता है। उसमें वे ग्रंथियां बन सकती हैं जो उसकी नार्मल लाइफ पर बुरा असर डालेंगी।

उसे विश्वास में लेकर प्यार से कहानी के रूप में सच्ची घटना का उदाहरण देकर अगर अजनबियों से सावधानी बरतने के लिये कहा जाए तो इसका प्रभाव पाजिटिव होगा। जैसे प्रीति ने अपनी नौ साल की बेटी सिद्धि को बताया कि जब वह उसकी उम्र की थी स्कूल जाते हुए एक आदमी उन्हें यह कहकर अपने साथ ले गया कि उनके पापा को दिल का दौरा पड़ा है और उनकी मम्मी ने उसे इन्हें लेकर अस्पताल आने के लिए कहा है। जब वे उसके साथ जा रही थी, बाई चांस उन्हें पापा सामने से आते हुए दिखे। वे जैसे ही पापा चिल्लाई, वो आदमी उन्हें छोड़कर भाग गया। सिद्धि को बात समझ में आ गई थी कि किसी भी अनजान व्यक्ति की बात पर यूं एकदम भरोसा करना ठीक नहीं।

निशिता का पांच साल का बेटा अर्जुन बहुत नटखट और चंचल है। हर किसी से वो मिनटों में दोस्ती कर लेता है और उसे घर की सारी रिपोर्ट देने लगता है। निशिता और उसके पति अशोक उसे समझाते रहते हैंं कि अनजान व्यक्ति कभी-कभी कितने खतरनाक होते हैं। वे बच्चों को बहला फुसलाकर ले जाते हैं, उनके साथ गलत काम कर उन्हें मारकर फेंक देते हैं इसलिए न उनके करीब जाना चाहिए, न उन्हें अपने घरवालों के बारे में कुछ बताना चाहिए। उनसे कोई चीज तो कभी भी नहीं लेनी चाहिए। खाने में वो कुछ भी मिला सकते हैं, कुछ सूंघाकर बेहोश कर सकते हैं। उनके साथ कभी कहीं घूमने भी नहीं चल देना चाहिए। जहां वो ले जाएगा कोई बचाने वाला न होगा। जब अर्जुन के सामने बार-बार ये बातें दोहराई गईं तो अर्जुन को ये सब कुछ लेसन की तरह रट गया। अब वो दूसरे बच्चों को भी यही सब बताता है।

लेकिन सूर्यांश को मम्मी पापा के थप्पड़ों से डर लगता है, इसलिए वो उनसे हर बात छिपा जाता है । जब साठ वर्षीय उसके दादा की उम्र के उसकी मम्मी के मामाजी ने उसे डी.वी.डी. पर अश्लील फिल्म दिखाकर उसे वही सब कुछ करने के लिए उकसाया तो बेहद डर गया था। उनके जाने के बाद भी हर समय डरा सहमा रहने लगा था। रात को सोते में चौंककर नींद से उठ जाता। पसीने में नहा जाता, कांपने लगता। खाना पीना भी उसका न के बराबर हो गया।

आखिर उसे मनोचिकित्सक को दिखाने जाना पड़ा। मनोचिकित्सक ने प्यार से पूछकर बच्चे से सारी बात निकलवा ली, साथ ही उसे भरोसा दिलाया कि जो कुछ उसके साथ हुआ, उसमें उसका कोई कसूर नहीं। ट्रीटमेंट में समय जरूर लगा लेकिन माता पिता के सहयोग से डाक्टर की सलाह पर चलकर ही वे बेटे को नार्मल कर पाए।

समाज में घटिया लोगों की कमी नहीं। बस फर्क उनके अपराध के छोटे बड़े होने का है। बच्चों का यौन शोषण करना एक मानसिक बीमारी है जिसे ’पीडोफिलिया‘ कहते हैं। ऐसे लोगों को जिन्दा रहने का हक नहीं। कोई सजा उनके लिये काफी नहीं है।

समाज में व्याप्त इस भयानक मानसिक रोग को जड़ से मिटा पाना आसान नहीं, इसीलिए बच्चों को सुरक्षा की टेªनिंग देना आज अत्यावश्यक है। उसे यह समझाना जरूरी है कि किससे बात की जाए, किससे नहीं यानी सही गलत का फर्क कर पाना, मुसीबत पड़ने पर उससे निपट पाना। सेफ्टी मेज़र्स में गार्ड, पुलिस, फायर ब्रिगेड और लोगों की भीड़ तथा किसी अपने तक पहुंच हेतु जरूरी फोन नंबर पर संपर्क आदि सिखाएं। (उर्वशी)

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