बागों का शहर ‘बेंगलुरू’

बेंगलुरू का प्राकृतिक सौंदर्य और आधुनिक जीवन शैली हमेशा से ही पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। देश के इस 5वें महानगर में सड़कों के दोनों ओर लगे हरे भरे वृक्ष, बड़ी- बड़ी इमारतें और सजे धजे बाजार पयर्टकों का मन मोह लेते हैं। बागों का शहर और भारत की सिलिकॉन वैली कहे जाने वाले बेंगलुरू ने अपने बढ़ते औद्योगिक विकास के बावजूद अपनी पुरानी खूबसूरती को नहीं खोया है। यहाँ की बढ़ती औद्योगिक और घरेलू ज़रूरतों के लिये जल आपूर्ति एक समस्या है। यहाँ 910 मिमी वार्षिक वर्षा होती है।
विजय नगर का सेनापति कैंपगोड पहला व्यक्ति था जिस ने 1537 में इस शहर की नींव डाली और शहर के चारों कोनों पर 4 निगरानी टावर बना कर इस शहर की सीमा तय कर दी। आज का बेंगलुरू उससे कहीं ज्यादा विस्तृत हो चुका है परंतु प्राचीन किले और मंदिर आज भी इस शहर की वैभवशाली स्थापत्य कला की निशानी के तौर पर सुरक्षित हैं।
लगभग 240 एकड़ में फैला लालबाग भारत के सबसे खूबसूरत बोटेनिकल बागों में से एक माना जाता है। इस बाग का निर्माण हैदर अली ने 1760 में करवाया था। इस बाग की खूबसूरती देखते ही बनती है। सुबह हजारों लोग सैर और व्यायाम के लिए वहाँ उपस्थित होते हैं। देश भर से अलग तरह का वातावरण उस बाग में देखने को मिला। इतनी सुबह जहाँ आधुनिक पीढ़ी के युवा- युवतियां चहल कदमी कर रहे थे, वहीं बड़ी आयु के मुस्लिम जोड़ों की बहुतायत भी वहाँ देखने को मिली जो इस बात का प्रमाण था कि कर्नाटक की राजधानी में रहने वाला यह समुदाय अपेक्षाकृत शिक्षित, संपन्न होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के प्रति सजग भी है।
लालबाग में विशाल वृक्ष, झील के अतिरिक्त बाग के बीचों बीच शीशा निर्मित एक बड़ा ग्लास-हाउस है जहां वर्ष में दो बार, जनवरी और अगस्त में पुष्प प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। इस के निकट लगे बोर्ड के अनुसार ब्रिटेन के राजकुमार के आगमन पर यहाँ पुष्प प्रदर्शनी लगाई गई थी। बाद में इसे स्थायी बना दिया गया। बाग में एक डीयर- एंक्लेव है तो अनेक प्रकार के पक्षी भी देखने को मिले। बिलकुल काले कौए बाग में बहुतायत में देखे गये। लगभग हर मोड़ पर बंदर-भालू की आकृति वाले कलात्मक कूड़ेदान, साफ- सुथरी सड़कें। एक स्थान पर ‘ठंडी सड़क’ लिखा देख हम वहाँ से गुजरे तो चहुं ओर घने पेड़ उस स्थान को अतिरिक्त शांति और शीतलता प्रदान करते दिखाई दिए। विशाल बाग के एक ओर पर पहाड़ी है जहाँ प्राणायाम की मुद्रा में कुछ लोग बैठे थे। इस खूबसूरत बाग के सुंदर दृश्यों को हम अनेक फिल्मों में भी देख चुके हैं।
दो घंटे से अधिक लालबाग में बिताने के बाद वापस लौटे तो नाश्ते के लिए डा. देवगिरी हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे – स्वादिष्ट रवा इडली, चटनी, सांबर संग पूरियां और उसके बाद गर्मागर्म काफी। हम अपने साथ ‘गुजरात के लडडू’ लेकर गए थे जो सूखे मेवों और शुद्ध घी से बने थे। डा. देवगिरी और हम सबने गुजरात के लडडुओं का आनंद भी लिया।
पुराने बेंगलुरू के महत्त्वपूर्ण शेषाद्रि रोड की ओर जाते हुए हमने यातायात में अनुशासन के अभाव को हमने महसूस किया जिसकी पुष्टि हमारे मित्रों ने भी की। अन्य दिनों में भी हमें वही अनुभव बार-बार हुआ। ट्रैफिक नियमों के प्रति गंभीरता की बजाय लोग जबरदस्ती घुसने की कोशिश करते देखे गए।
यहां का विधानसभा भवन भारत का सबसे सुंदर विधानसभा भवन है जो नवद्रविड़ शैली में ग्रेनाइट पत्थरों से बना है। यह पंच-मंजिला भवन लगभग 46 मीटर ऊंचा है जो दूर से देखने पर किसी मंदिर की तरह दिखाई देता है। 106 मीटर चौड़ी और 213 मीटर लंबी इस इमारत में कई गुंबद, श्वेत स्तंभों और मेहराबों ने इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा दिए हैं।
1864 में बना कब्बन पार्क 300 एकड़ में फैला है। इस पार्क का नाम उस समय के वायसराय लार्ड कब्बन के नाम पर पड़ा। आज भी यह पार्क आधुनिक बेंगलुरू के हृदय में हरियाली के निराले उद्यान के रूप में पहचाना जाता है। इस पार्क के पास बनी लाल गौथिक शैली की इमारतें, स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी व दो मंजिला हाईकोर्ट इस की खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं।
कब्बन पार्क से थोड़ी दूरी पर बाल भवन है जहाँ बच्चे टॉय ट्रेन, नाव, घुड़सवारी और थिएटर का आनंद ले सकते हैं। पास ही हीरे के आकार का एक्वेरियम है जहाँ बच्चे समुद्री जीवों और उनके संसार के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
कस्तूरबा रोड पर कब्बन पार्क से आगे की ओर स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय देश का सब से पुराना संग्रहालय है। यहां पर्यटक प्राचीन सिक्कों, शिलालेखों और पुराने चित्रों के संग्रह देखने के साथ-साथ बेंगलुरू शहर की झलक भी देख सकते हैं।
विश्वेश्वरैया औद्योगिक तथा प्रौद्योगिकीय संग्रहालय आधुनिक कर्नाटक और भारत के प्रसिद्ध वास्तुकार सर.एम.विश्वेश्वरैया को समर्पित किया गया है। इस इमारत को ध्यान से देखें तो विज्ञान और तकनीक की विविधता की झलक देखने को मिलती है।
उलसूर झील लगभग डेढ़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्रा में फैली है। यहां पर्यटक नौकायन, तैराकी और फोटोग्राफी का मजा ले सकते हैं। झील पर बने छोटे-छोटे टापू आराम व पिकनिक मनाने के लिहाज से बेहतर माने जाते हैं।
अन्य दर्शनीय स्थलों में वेंकटप्पा आर्ट गैलरी, शेषाद्रि अय्यर मेमोरियल हाल जिसमें सार्वजनिक पुस्तकालय भी है, उच्च न्यायालय, बच्चों के मनोरंजन और अभिरुचि का केंद्र जवाहरलाल नेहरू भवन, ं साफ्टवेयर टेक्नोलाजी पार्क (एस.टी.पी.) नंदी हिल, आग के देवता अग्नि की दुर्लभ प्रतिमा वाला गुफ़ा मंदिर, मेकेदातु, वानरघट्टा नेशनल पार्क, कण्व जलाशय, उलसूर झील और हेसरघट्टा झील भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त बंगलौर पैलेस है जिसे वाडियार राजाओं ने इंगलैंड के विंडसर कैसल से प्रभावित हो कर ट्यूडर शैली में बनवाया था। यह ऐतिहासिक महल 45 हजार वर्गफुट क्षेत्रा में फैला है।
हमारे पास समय का अभाव था, इसलिए अनेक स्थानों को देखने से वंचित रहे जिनमें प्रमुख हैं मेकेटाट जो बेंगलुरू से 98 किलोमीटर की दूरी पर कनकपुरा रोड पर है। 45 किमी दूर पर्ल वैली एक खूबसूरत जल प्रपात है जो 90 मीटर की ऊंचाई से गिरता है। इतनी ऊंचाई से गिरने पर इसके पानी की बंूदें मोतियों का आभास देती हैं। इसी वजह से इसे पर्ल वैली कहा जाता है। बनेरघट्टा राष्ट्र पार्क जहां अनेक प्रकार के वन्य जीव घने जंगल वाले इस पहाड़ी इलाके में खुलेआम घूमते हैं। वन्य जीव प्रेमियों के लिए यह एक बेहतर पिकनिक स्थल है।
अंतिम दिन ड्राइवर समय पर न पहुंचने के कारण बेचैनी शुरू हो गई, तब हमने राजेन्द्र भाई से सम्पर्क किया। डाक्टरों द्वारा ड्राइविंग मना होने के बावजूद राजेन्द्र भाई एक अन्ना को साथ लेकर हमारे पास पहुंचे। दरअसल हेरेहल्ली स्थित उनके निवास पर हमारे रात्रि भोजन का कार्यक्रम था। समय अभाव के कारण हमने केवल जलपान किया और भोजन पैक करवा लिया। भीड़ भाड़ वाली सड़कों से होते हुए हम विश्व प्रसि़द्ध ‘इस्कान’ मंदिर पहुंचे। समय बचाने के लिए हमने अपने जूते भी गाड़ी में छोड़ दिए। अति शीघ्रता से सैंकड़ों सीढि़यों वाले उस भव्य मंदिर के दर्शन के बाद हम बेंगलुरू स्टेशन पर पहुंचे। कुछ ही देर बाद राजधानी एक्सप्रेस पर सवार हो हम वापसी की राह पर थे। राजधानी में भोजन व्यवस्था होते हुए भी हमने पुष्पा बहन के हाथ से बनी भिंडी संग भोजन का आनंद लिया। सचमुच अविस्मरणीय रहा बागों की नगरी बेंगलुरू का यह सफर। (उर्वशी)

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