मन को भा गया गुलाबी शहर जयपुर

यूं तो पूरा राजस्थान ही धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों से भरा पड़ा है मगर गुलाबी शहर जयपुर की बात ही जुदा है।जयपुर के जर्रे-जर्रे में छिपी हैं शौर्य गाथाएं।इस शहर की स्थापना 1728 में आमेर के महाराजा जय सिंह द्वितीय ने की थी।यह शहर समृद्ध भवन निर्माण-परंपरा ,सरस संस्कृति और ऐतिहासिक महत्त्व के लिए प्रसिद्ध है।राजा जय सिंह द्वितीय के नाम पर ही इस शहर का नाम जयपुर पड़ा।
जयपुर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को देखते हुए ही मैंने इस गुलाबी शहर का रुख किया। जितना कुछ मैंने इस शानदार शहर के बारे में सुन रखा था,मुझे उससे कहीं ज्यादा मिला।लगभग एक हफ्ते के प्रवास के दौरान मैंने जयपुर को करीब से देखा।आप भी अगर कभी जयपुर जाएं तो यहां की ऐतिहासिक धरोहरों का दीदार जरूर करें और उनके महत्त्व को करीब से जानने का प्रयास करें।यहां सुन्दर नगरों,हवेलियों और किलों की भरमार है। दरअसल मुगलों ने यहां जो भवन बनवाए, उनमें लाल पत्थरों का इस्तेमाल किया गया।इसके बाद महाराजा जय सिंह ने सभी भवनों को लाल रंग से पुतवा दिया।यही वजह है कि जयपुर को गुलाबी शहर कहा जाता है।
यहां आने के बाद ऐसा लगता है ,मानो आप किसी रजवाड़े में आ गए हों।शाही साफा बांधे जयपुर के पुरुष और लहंगा-चुन्नी से सजी महिलाएं सहज ही आकर्षित करते हैं।राजस्थानी भाषा का जवाब नहीं।‘पधारो म्हारे देश’ सुनकर मन को असीम शान्ति मिलती है।
जयपुर के जिन महत्त्वपूर्ण स्थानों का मैंने भ्रमण किया ,उनका ब्यौरा दे रहा हूं।
हवा महल
कह सकते हैं कि हवा महल ,जयपुर की पहचान है। दूर से ही हवा महल आपको रोमांच से भर देगा। इसे सन 1798 में महाराजा सवाई सिंह ने बनवाया था।इस महल को वास्तुकला का नायाब नमूना कहा जा सकता है।यह बाहर से मधुमक्खी के छत्ते की तरह दिखता है और इसमें 953 जालीदार खिड़कियां हैं जो देखने में काफी आकर्षक हैं।इन तमाम खिड़कियों से हर समय ठंडी-ठंडी हवाएं आती रहती हैं।पर्दा-प्रथा का पालन करने वाली महिलाओं को ध्यान में रखते हुए इन जालीदार खिड़कियों का निर्माण कराया गया था। हवा महल,महाराजा जय सिंह के विश्राम का पसंदीदा स्थान था।जालीदार खिड़कियों से हर पल ठंडी हवाएं आने की वजह से उन्हें काफी सुकून मिलता था।हवा महल में प्रवेश के लिए सीधे सामने से कोई जगह नहीं है।महल के दाईं और बाईं ओर के रास्तों से इस महल में प्रवेश किया जा सकता है।महल की दीवारें वास्तु कला की कहानी कहती हैं।जयपुर शहर दक्षिणी हिस्से में बड़ी चौपड़ पर स्थित इस महल को देखना और यहां घूमना एक सुखद अनुभूति की तरह है।
सिटी पैलेस
मुगल शैली में बना यह शाही महल जयपुर की शान है।पुराने जयपुर में स्थित इस शाही महल की छटा ही निराली है।भूरे संगमरमर के स्तम्भों पर टिके इस महल को देखकर ही एक अजीब से रोमांच का अनुभव होने लगता है।नक्काशीदार मेहराब और रंगीन पत्थरों ने इस शाही निवास की खूबसूरती बढ़ा दी है।इस महल के प्रवेश द्वार पर ही दो नक्काशीदार हाथियों को देखकर ऐसा लगा मानों ये इस शाही निवास के प्रहरी हैं। मंत्रामुग्ध होकर मैं अपनी टीम के साथ आगे बढ़ने लगा।मेरी निगाह एक संग्रहालय के मुख्य द्वार पर पड़ी।मैं खुद को रोक न सका। अंदर प्रवेश करते ही राजस्थानी पोशाकों और मुगलों -राजपूतों के हथियारों का नायाब संग्रह देखने को मिला।इसके अलावा विभिन्न आकारों की तलवारें भी यहां मौजूद हैं। मैं लगातार इन्हें निहारता रहा।थोड़ा आगे जाने पर एक कला -दीर्घा भी मिला,जिसमें लघु-चित्रों, कालीनों, शाही साजो-सामानों और खगोल विज्ञानं की दुर्लभ रचनाओं को रखा गया है।
आमेर दुर्ग
आमेर दुर्ग का नाम मैंने बहुत सुन रखा था। आखिरकार यहां तक आने का अवसर मिल ही गया। आमेर दुर्ग को आमेर के किले के रूप में भी जाना जाता है।जयपुर के आमेर क्षेत्रा में यह एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। दरअसल यह एक पर्वतीय दुर्ग है। इसे जयपुर का मुख्य पर्यटक -स्थल भी कहा जाता है।कहा जाता है कि आमेर के कसबे को स्थानीय मीणाओं ने बसाया था। बाद में यहां राजपूत मान सिंह प्रथम ने राज किया।पत्थर के बने रास्तों से भरा यह दुर्ग सहज ही मन को मोहता है।
जंतर मंतर
जयपुर का जंतर-मंतर दरअसल एक खगोलीय वेधशाला है,जिसे सवाई जय सिंह 1724 से 17 34 के बीच बनवाया था। इस वेधशाला में 14 मुख्य यंत्रा हैं जो समय मापने, ग्रहण की भविष्यवाणी करने,किसी तारे की स्थिति जानने तथा सौरमंडल के ग्रहों की स्थिति जानने में सहायक हैं। इन यंत्रों को देखकर ऐसा लगता है कि उस जमाने में भी भारत के लोगों को गणित तथा खगोल की बहुत अच्छी जानकारी थी,तभी तो उन्होंने इस ‘शैक्षणिक वेधशाला’ को मूर्त रूप दिया।आपको बता दूं कि सवाई जय सिंह एक खगोल वैज्ञानिक भी थे। यही वजह है कि जय सिंह के योगदान और व्यक्तित्व की चर्चा भारत के पूर्व प्रधानमंत्राी पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ में की है। सवाई जय सिंह द्वारा बनाई गई वेधशालाओं में अब जयपुर और दिल्ली के जंतर मंतर ही शेष बचे हैं।
जयगढ़ दुर्ग
जयगढ़ दुर्ग को राजस्थान के लोग जयगढ़ किला भी कहते हैं।अरावली पर्वतमाला पर स्थित इस दुर्ग को जय सिंह द्वितीय ने सन् 1726 में बनवाया था।आमेर दुर्ग एवं महल परिसर की सुरक्षा के लिए इसे बनवाया गया था।
जल महल
जयपुर आने पर जल महल जरूर जाएं। यह एक मनोरम और दर्शनीय पर्यटक स्थल है। मान सागर झील के बीच स्थित जल महल को ‘आई बाल’ भी कहा जाता है क्योंकि यह महल झील के बीचांेबीच स्थित है। यहां की नर्सरी में एक लाख से भी अधिक वृक्ष लगे हैं। आपको बता दूं कि यहां सबसे ऊंचे वृक्ष भी पाए जाते हैं।इस जल महल की खूबसूरती देखने लायक है।
नाहरगढ़ दुर्ग
अरावली पर्वतमाला के ऊपर बना नाहरगढ़ दुर्ग की अपनी एक अलग अहमियत है। आमेर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस किले का निर्माण सवाई राजा जय सिंह द्वितीय ने 1734 में करवाया था। इस किले को लेकर एक किंवदन्ती ये है कि उस दौर में नाहर सिंह नामक एक राजपूत की प्रेतात्मा यहां भटका करती थी,लिहाजा इसका नाम नाहरगढ़ दुर्ग रखा गया।
अल्बर्ट हाल संग्रहालय
जयपुर प्रवास के दौरान हमने अल्बर्ट हाल संग्रहालय के बारे में भी सुना, लिहाजा खुद को यहां तक लाने रोक न सका।यह बहुत ही पुराना संग्रहालय है जो भारत -अरबी शैली में बनाया गया है। आम लोगों के लिए यह संग्रहालय 1887 खुला था। इस संग्रहालय में आपको कई पुराने चित्रा, कीमती पत्थर,हाथी दांत,मूर्तियां आदि देक्ल्हने को मिलेंगे। इन्हंे देखते ही इतिहास के पन्ने ताजा हो उठते हैं। अगर पुराने और ऐतिहासिक चीजों को देखने में आपकी रूचि है तो आप घंटों यहां अपना समय व्यतीत कर सकते हैं।
इन ऐतिहासिक स्थलों के अलावा जयपुर में और भी कई स्थल हैं जहां जाकर आप इस गुलाबी नगर को और करीब से जान सकते हैं। मसलन-रामनिवास बाग,गुडि़या घर,बिड़ला तारामंडल,गलता जी,जैन मंदिर,मोती डूंगरी और लक्ष्मी नारायण मंदिर,स्टैच्यू सर्किल ,राम गढ़ झील,विराट नगर ,सामोद,जय सिंह पुरा खोर,माधो गढ़ आदि। कुल मिलाकर पिंक सिटी जयपुर ने मन को प्रभावित किया।यहां की संस्कृति, कला और वास्तु शिल्प का जवाब नहीं। आप भी जयपुर जरूर जाएं और पिंक सिटी को करीब से देखें। सड़क मार्ग और वायु मार्ग,दोनों माध्यम से यहां तक पहुंचा जा सकता है। (उर्वशी)

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