माउंट आबू -यानी बेहद खूबसूरत

माउंट आबू राजस्थान में अरावली श्रेणी का सबसे ऊंचा पर्वत है, 5653 फीट ऊंचा । जलवायु भी हर मौसम में शानदार, तापमान सर्दी में 13 से 18 डिग्री तो गर्मी में 18 से 33 डिग्री के बीच। जहां तहां हरियाली भी मिलती है। धूल न के बराबर, न रेत के टीले, न बदन जलाती गर्मी। और क्या चाहिए पर्यटक को?
गऊमुख , वशिष्ठ आश्रम:
सबसे पहले पहुंचे ज्ञानसरोवर से महज तीन किलोमीटर दूर 750 सीढि़यां नीचे उतरकर वशिष्ठ आश्रम। अद्भुत नज़ारा, रास्ते के काले करोंदे थकान हर रहे थे। गरुड़ आकृति की चट्टान, गणेश से लगते पहाड़, वैताल की शक्ल की शिलाएं, आश्रम का इतिहास, कैसे हवन कंुड से परमार, चौहान, सोलंकी व परिहार वंश निकले, नंदिनी को लेकर वशिष्ठ व विश्वामित्रा की रस्साकशी, सरस्वती नदी को शाप मिलना व उससे मुक्ति, इंद्र की रक्षा आदि का उलझा इतिहास व मिथक भी जाना मगर सबसे मनभावन थी प्रकृति अपने लुभावने रूप में। थकान के बावजूद जब ऊपर गऊमुख लिखे बोर्ड आए तो मन ने कहा आना सार्थक हुआ यहां।
अब दूसरी दिशा पकड़ जाना था मन में बहुत पहले से बसे दिलवाड़ा के जैन मंदिरों को देखने।
नक्काशी का अद्भुत नमूना हैं दिलवाड़ा के जैन टैम्पल
दिलवाड़ा के जैन टैम्पल माउंट आबू नगर में पांच मंदिरों का एक समूह है। जैन धर्म के तीर्थंकरों को समर्पित ये वास्तुकला के शानदार मंदिर 1231 ई. में वास्तुपाल और तेजपाल नामक दो भाईयों ने बनवाये थे। इनमें ‘विमल वासाही मंदिर’ प्रथम तीर्थंकर को समर्पित सर्वाधिक प्राचीन है जो 1031 ई. में बना था जबकि ‘लुन वासाही मंदिर’ बाईसवें तीर्थंकर नेमीनाथ को समर्पित है। दिलवाड़ा जैन मंदिर परिसर में संगमरमर के बने पांच मंदिर हैं। प्रमुख मंदिर में 52 छोटे मंदिरों वाला गलियारा है जिनमें प्रत्येक में जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं स्थापित हैं।
कहा जाता है कि इस मंदिर को बनाने में 1500 कारीगरों ने 14 वर्ष तक काम किया था, तब जाकर यह खूबसूरत मंदिर तैयार हुआ। उस समय इसे बनाने में करीब 12 करोड़ 53 लाख रुपये खर्च हुए थे। मंदिरों के 48 स्तम्भों में नृत्यांगनाओं की आकृतियां बनी हुई हैं। दिलवाड़ा के मंदिर नक्काशी और मूर्ति व मंदिर निर्माण कला का अद्भुत नमूना हैं।
अचलगढ़ किला
दिलवाड़ा मंदिर से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित परमार राजाओं द्वारा बनवाए गए अचलगढ़ किले का राणा कुंभा ने पुनर्निर्माण करवाया बताया जाता है। यहां अचलेश्वर महादेव के नाम से भगवान शिव का मंदिर बना है। शिव के साथ ही यहां उनकी सवारी नंदी के दर्शन भी किए जा सकते हैं। कहा जाता है कि यहां पर भगवान शिव के पैरों के निशान हैं। मंदिर के पीछे मंदाकिनी कुंड है।
पीस पार्क यानी प्रकृति के पास
गुरु शिखर मार्ग पर ब्रह्मकुमारियों द्वारा बनाया गया पीस पार्क का सौंदर्य अनूठा है। बहुत ही व्यवस्थित पार्क में कई तरह के गुलाबों की किस्में, फूलों की क्यारियां, रॉक गार्डन, घास और बांसों से बनी झोंपडि़यां, झूले आदि लुभाते हैं। यहीं ब्रह्मकुमारी समुदाय का ईश्वरीय विश्वविद्यालय व शान्ति भवन भी है। यहां के विशाल हाल में तकरीबन 35000 लोगों के बैठने और ट्रान्सलेटर माइक्रोफोन द्वारा 100 भाषाओं में व्याख्यान सुने जाने की व्यवस्था हैं। बाबा की झोपड़ी व लेज़र शो तो मनोहारी थे ही।
नक्की झील व सनसेट पॉइंट
माउंट आबू में 3937 फुट की ऊंचाई पर स्थित नक्की झील लगभग ढाई किलोमीटर दायरे में है। हरी-भरी वादियों, खजूर के पेड़ों की कतारें, पहाडि़यों से घिरी झील और झील के बीच आइलैंड बहुत ही मनमोहक हैं। नक्खी या नक्की झील राजस्थान की सबसे ऊँची झील है। एक किवदंती है कि इसका निर्माण देवताओं ने अपने नाखूनों से खोद कर किया था, दूसरी यह कि रसिया बालम नामक एक रसिक संन्यासी ने ‘कंुवारी कन्या’ से विवाह करने हेतु उसकी मां व राज्य की रानी की शर्त पूरी करने के लिये इसे नाखूनों से खोदा था, इसीलिए इसका नाम नक्की झील पड़ा।
बेहद खूबसूरत यह झील सर्दियों में जम जाती है। पास ही ‘रसिया बालम मंदिर’ व 1.5 किलोमीटर की दूरी पर सनसेट पॉइंट है जहां से डूबते हुए सूरज का सुंदर नज़ारा देखा जा सकता है। सूर्यास्त के समय आकाश के बदलते रंगों की छटा देखना अपने आप में अद्भुत आनंद देता है। ‘बॉल’ की तरह लटका हुआ डूबता सूरज ऐसा लगता है मानो आसमान से नीचे गिर कर पाताल में जा रहा हो।
हनीमून पॉइंट:
सनसेट पॉइंट से दो किलोमीटर दूर नवविवाहित जोड़ों के लिए हनीमून पॉइंट है । ‘आंध्र पॉइंट’ के नाम से भी जाने जाने वाले इस स्थान पर शाम के वक्त नए जोड़ों का हुजूम यहाँ से हिलना भी पसंद नहीं करता । आप भी जाएंगे तो ऐसा ही करेंगे ।
टोड रॅाक व ननरॉक:
नक्की झील के पश्चिम में स्थित एक मेंढक के आकार की चट्टान है जिसे टोड रॉक के नाम से जाना जाता है। इस मेंढक के आकार से मिलती चट्टान को देखकर यूं प्रतीत होता है जैसे यह मेंढक अभी झील में कूद़ेगा। इसी के पास एक और चट्टान है जिसे ‘ननरॉक’ के नाम से जाना जाता है। यह चट्टान घूंघट निकाले हुई स्त्राी के समान दिखती है। ये दोनों चट्टानें दूर से पर्यटकों को आकर्षित करती हैं।
गुरु शिखर
माउंट आबू से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गुरु शिखर अरावली पर्वत माला की 1722 मीटर सबसे ऊंची चोटी है। यहां पहुंचकर लगता है जैसे बादलों के पास आ गए हों। यहां भगवान विष्णु के अवतार दत्तात्रोय के एक छोटे से मन्दिर के पास ही रामानंद के चरण चिन्ह बने हुए हैं। मन्दिर के पास ही एक पीतल का घंटा लगा हुआ है जो माउंट आबू को देख रहे संतरी का आभास कराता है पर हाय रे, यहां तक समय ने हमें जाने ही नहीं दिया।
अर्बुदा देवी मंदिर:
यहां के लोकप्रिय तीर्थ स्थलों में से एक अधर देवी, अर्बुदा देवी एवं अम्बिका देवी के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर ज्ञान सरोवर माउंट आबू से 3 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर एक प्राकृतिक गुफा में प्रतिष्ठित है। पास ही नव दुर्गा, गणेश जी और नीलकंठ महादेव मंदिर भी हैं। मंदिर तक जाने के लिए 365 सीढि़यां कब खत्म हो जाती हैं, पता ही नहीं चलता। यहां के सुंदर दृश्य और शान्ति मन की सारी थकान पल में दूर कर देती
है।
वैसे बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ छूटा बाकी अगली बार देखने के संकल्प के साथ लौटे। (उर्वशी)

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