मुंगेर का चण्डी स्थान जहाँ कर्ण रोज खौलते तेल के कड़ाह में कूदा करते थे

मुंगेर (बिहार) के चण्डी स्थान को सिद्धपीठों में गिना जाता है। स्कंदपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, शिवपुराण तथा देवीभागवत में वर्णित तथ्य इसका खुलासा करते हैं कि वर्तमान मुंगेर जिसका प्राचीन नाम मुद्गलपुर अथवा अंगक्षेत्रा शिव-लीला का प्रमुख क्षेत्रा रहा है। देवाधिदेव भगवान् शंकर के निवास का दूसरा शोभा शिखर मंदार पर्वत ही था। यह पर्वत मुंगेर से मात्रा सौ किलोमीटर की दूरी पर है।
शिवपुराण में वर्णित है कि शिव ने समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल का पान इसी मंदार के शिखर पर किया था और नीलकंठ कहलाये। शिव निवास के लिए विश्वकर्मा ने भी इसी शिखर पर शिवालय बनाया था। आदि शिव और सती भी इसी शिखर पर निवास करते थे। जब सती के पिता दक्ष प्रजापति ने उन्हें अपमानित करने के लिए यज्ञ किया था तो उस यज्ञ में सती इसी मंदराचल से शिव अनुचर वीरभद्र के साथ गयी थी और वहीं यज्ञ कुण्ड में स्वयं और पति के अपमानवश सती ने अपने आपको यज्ञ कुंड में झोंककर भस्म कर लिया था।
इस घटना की सूचना पाते ही शिव ने विकराल रूप धारण कर लिया और सती के शव को कुण्ड से निकालकर तांडव प्रारंभ कर दिया। इसी क्रम में सती की बायीं आंख मुद्गलपुर के श्मशान स्थल पर गिरी जो बाद में ’चण्डिका स्थान‘ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मंुगेर के उत्तर-पूर्व में कोने में गंगा के किनारे स्थित मंदिर में सती की आंखें आज भी प्रतीक रूप में स्थित हैं।
मुंगेर शहर से दो किलोमीटर उत्तर-पूर्व में गंगा तट पर स्थित ’चण्डी स्थान‘ विन्ध्य पर्वत की एक श्रृंखला है जो पीर पहाड़ी तक आयी है। उसी पर्वत श्रृंखला के एक भाग को काटकर गुहा मंदिर का निर्माण किया गया है, जिसमें सती की बायीं आंख की पूजा-अर्चना होती है। मंदिर में अब सोने की आंख लगा दी गयी है। अभी जहां मन्दिर स्थित है, वहां श्मशान घाट था। आज भी अनेक तांत्रिक व श्मशान साधक नवरात्रा पूजा के अवसर पर देश के अनेक हिस्सों से आकर यहां तंत्रा-मंत्रा की साधना करते हैं।
शक्तिपीठ की महिमा इस सदी में भी विद्यमान है। आश्विन एवं चैत्रा की दुर्गापूजा के समय नौ दिनों तक पूजा-अर्चना करने वालों का यहां तांता लगा रहता है। महाभारत के प्रमुख पात्रा कुन्तीपुत्रा कर्ण की कर्णभूमि भी यही क्षेत्रा था। कर्ण इसी क्षेत्रा से असम के महेन्द्रगिरि पर आचार्य परशुराम से अस्त्रा विद्या सीखने गये थे। अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध कर्ण भगवती चण्डिका की पूजा के लिए रोज ब्रह्ममुहूर्त्त में गंगा स्नान करके चण्डिका स्थान पहुंचकर विधिवत् महारानी चंडी की पूजा किया करते थे। पूजा के बाद वे खौलते हुए तेल के कड़ाह में कूदकर अपनी बलि देते थे। देवी प्रसन्न होकर कर्ण को नित्य पुनर्जीवन तथा सवा मन सोना पुरस्कार में देती थी। उस सोने को कर्ण एक टीले पर बैठकर याचकों, भिक्षुओं, और ब्राह्मणों को दान कर देते थे। यह टीला किले के अंदर है जो कर्णचौरा के नाम से प्रसिद्ध है।
उसी काल में मालवा का पदेन राजा विक्रमादित्य पूरे आर्यावर्त में सभी राजाओं की दानशीलता से अपने को श्रेष्ठतम मानने लगा था और राजसभा में अपनी मान्यता की घोषणा कर डाली। उनकी घोषणा पर सिंहासन की बत्तीसों पुतलियां उठकर हंस पड़ी। अट्टहास के उपरान्त सभी पुतलियों का नेतृत्व करती दलनेत्राी बोली-’महाराज अंगराज, दानवीर कर्ण के समान आप दानवीर नहीं हैं क्योंकि कर्ण प्रतिदिन सवा मन सोना दान करते हैं। इतना दान तो हस्तिनापुर नरेश कुच्छराज भी नहीं करते, इसलिए आप ऐसी घोषणा न करें।‘
इस बात को सुनकर विक्रमादित्य छद्मवेष धारण करके कर्ण के पास पहुंच गये और कर्ण का अंगरक्षक बनकर उनके साथ रहकर स्वर्ण प्राप्ति के रहस्य को जान लिया। एक दिन विक्रमादित्य कर्ण से पहले ही चंडी स्थान जा पहुंचे और भगवती की पूजा-अर्चना करके खौलते हुए तेल के कड़ाह में अपनी बलि दे दी। भगवती ने उन्हें भी पुनर्जीवित करके सवा मन सोना दिया। लोभवश विक्रमादित्य ने दूसरी-तीसरी बार भी अपनी बलि दे डाली। देवी ने अतिशय प्रसन्न होते हुए एक अक्षय स्वर्ण वस्त्रा संचिका प्रदान किया। विक्रमादित्य ने स्वर्ण वस्त्रा संचिका लेकर कड़ाह को उलट दिया और देवी को प्रणाम कर अपने राज्य की ओर चल दिया।
जब कर्ण अपने निश्चित समय पर वहां पहुंचे तो उन्होंने कड़ाह को उलटा हुआ देखा। उसे यकीन हो गया कि अंगरक्षक ने ही ऐसा किया है। कर्णचौरा पर देवी को प्रसन्न करने के लिए वह आमरण अनशन पर बैठ गया। देवी के आदेश पर विक्रमादित्य को वह झोली लेकर कर्ण के पास आना पड़ा। देवी की एक आंख आज भी उसी कड़ाह के अन्दर है।
लोगों का विश्वास है कि चण्डी स्थान पहुंचकर पूजा-अर्चना करने वालों की सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं। इस देवी का जाग्रत स्वरूप हजारों भक्तों ने देखा है। नवरात्रा के समय यहां का माहौल पूरा भक्तिमय हो जाता है। आप भी इस तीर्थ का भ्रमण कर लाभ उठा सकते हैं।
—— (उर्वशी)
——- आनन्द कुमार अनन्त

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