रोटी तेरे रूप अनेक

रोटी तेरे रूप अनेकरोटी शब्द से भला कौन परिचित नहीं होगा। हमारे जीवन की तीन मूलभूत आवश्यकताओं में प्रथम रोटी ही है। रोटियां तो हमारे भोजन का अभिन्न अंग हैं। रोटी के बिना भोजन अधूरा ही रहता है चाहे फिर भोजन में ५६ भोग ही क्यों न हों। रोटी के बिना हमारा पेट तो भरता है परन्तु तृप्ति नहीं होती, संतुष्टि नहीं मिलती।
सच कहिये यदि आपके भोजन में सिर्फ २ या ३ दिन रोटी न हो तो क्या भोजन आपको वही संतुष्टि व तृप्ति दे सकता है? शायद नहीं। सच तो यह है कि रोटी ही हमारे भोजन को पूर्णता प्रदान करती है चाहे फिर रोटी गेहूं की या, ज्वार की, बाजरे की या फिर मक्का की। घी लगी हुई गरम-गरम रोटी की मीठी-मीठी महक ही मुंह में पानी ला देती है।
देश के विभिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न प्रकार की रोटी बनाई जाती है। देश के अधिकांश भागों में गेहूं की रोटी ही बनाई व खाई जाती है। यह अलग बात है कि कहीं रोटी छोटी व मोटी बनाई जाती है तो कहीं पतली व ब$डी-ब$डी। कहीं उन्हें रोटी कहा जाता है तो कहीं फुलका। कुछ लोग इन्हें चपाती भी कहकर पुकारते हैं। गेहूं की रोटी कभी तंदूरी रोटी के रूप में तंदूर में बनाई जाती है तो कहीं नान के रूप में। चाहे किसी भी रूप में हो, खाने वाले से ये सिर्फ वाहवाही ही बटोरती है।
मक्का की रोटी व सरसों का साग पंजाब के लोगों का मुख्य भोजन है तथा सारे देश में प्रसिद्घ है। आजकल तो शादी-ब्याह तथा अन्य उत्सवों-अवसरों पर भोजन में मक्का की रोटी व सरसों का साग बनवाने का प्रचलन चल प$डा है तथा आने वाले मेहमान भी चाहे वे फिर किसी भी प्रांत के हों, खूब शौक ले चटखारे लेकर उसे खाते हैं।
सस्ता होने के कारण आदिवासी व गरीब लोगों का मुख्य भोजन भी मक्का की रोटी ही है चाहे फिर वे उसे प्याज व नमक के साथ खायें या फिर स्वादिष्ट क$ढी के साथ।
मक्की की रोटी का ही एक ओर रूप हैं ‘पानिये’। मक्का की रोटी को हाथ से बनाकर, त्वाखरे के पत्तों के बीच दबाकर, उपलों में उस रोटी को सेका जाता है और हो जाते हैं स्वादिष्ट पानिये तैयार। इस पर घी लगाकर खायें तो खाने वाला बस खाता ही रह जाये। मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले के आदिवासियों का प्रिय भोजन हैं ये पानिये। स्वादिष्ट होने के कारण आजकल सम्पन्न घरों में भी विशिष्ट मौकों पर पानिये खूब शौक से बनाये व खाये जाते हैं।
ज्वार की रोटी स्वाद में कुछ मिठास लिये होती है, साथ ही यह बहुत हल्की तथा सुपाच्य होती है। पेट की परेशानियों जैसे कब्ज, गैस आदि से ग्रस्त लोगों के लिए बहुत ही गुणकारी होती हैं ये ज्वार की रोटियां।
बाजरे की रोटी का तो कहना ही क्या। बाजरे की रोटी को गु$ड के साथ खाकर तो हर कोई वाह-वाह कर उठता है।
शादी-ब्याह तथा अन्य पार्टियों में आजकल बेसन की रोटी का भी खूब प्रचलन में है। बेसन की बनी होने के कारण ये बेसनी कहलाती हैं। अन्य सभी पकवानों का डटकर सामना करती हुई उससे होड सी लेती प्रतीत होती हैं। मेहमानों का दिल जीतने में भी यह किसी से पीछे नहीं।
मध्य-प्रदेश के मालवा क्षेत्र में गेहूं आटे से बनी उंगली के समान मोटी रोटी बहुत प्रसिद्घ है। मोटी होने के कारण उन्हें ‘मोटी-रोटी’ या -‘मोअन की रोटी’ कहते हैं। बेलते समय इनमें परांठों की भांति ढेर सारा घी भरा जाता है व खूब मोटी-मोटी बेली जाती हैं धीमी-धीमी आंच पर सिककर तैयार होती है यह बेहद स्वादिष्ट मोटी रोटी। इन्हें यदि उपलों पर सेंका जाय तो सोने पे सुहागा। सिंकने के बाद चम्मच से गोदकर उनमें ढेर सारा घी भरा जाता है। प्याज, लहसुन के तडके वाली उडद की दाल इन रोटियों का साथ बखूबी निभाती है। प्रसव के पश्चात् स्त्रियों को विशेषतौर से खिलाई जाती है यह मोटी रोटी।
और अन्त में आती है रूमाली रोटी। मैदे की बनी ये रोटियां भी बहुत स्वादिष्ट होती हैं। रूमाल जैसी पतली होने के कारण उन्हें रूमाली रोटी भी कहते हैं। रूमाली रोटी का म$जा कवाब और मांसाहार के साथ अधिक आता है।
प्रसंगवश यहां उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि अपने वन प्रवास के दिनों में महाराणा प्रताप ने घासफूस की रोटी खाकर ही अपनी क्षुधा शान्त की थी। —————- (उर्वशी)




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