लखनऊ की शान – हजरतगंज

किसी सभ्यता के उभरने में सदियां समाप्त होती हैं तो किसी संस्कृति के मिटने में भी युग लग जाते हैं। जिस तरह लक्ष्मणपुरी को लखनावती होने में बहुत समय लगा, उसी तरह लखनौती को लखनऊ बनने में भी मुद्दत खर्च हुई है। पौराणिक काल की लक्ष्मणपुरी को ब्राह्मणों ने लखनौती कहा था और शेखजादों ने उसी लखनावती को लखनऊ नाम दिया था।
लखनऊ जिस तरह तमाम विषयों में अपनी दिलचस्प दास्तानों के कारण साहित्य की सामग्री बनता रहा है, उसी प्रकार यहां के मुहल्लों और आबादियों की कहानियां भी कुछ कम मजेदार नहीं हैं। इस शहर में नवाबों के नाम से जो मुहल्ले आबाद हुए, उनमें हजरतगंज का नाम नहीं भुलाया जा सकता।
हजरतगंज आज के लखनऊ का सबसे आधुनिकतम और शानदार बाजार है जो अपने रूमानी वातावरण और रौनक के लिए दूर-दूर तक मशहूर है। शामे अवध का कुछ नजारा हजरतगंज की शाम में अब भी बाकी है और अब भी चहलकदमी के लिए हर शाम लोग सज संवरकर यहां आते हैं और इस खूबसूरत फिजां में अपना वक्त बिताते हैं।
इस बाजार को इस रूप तक पहुंचाने में सदियां खर्च हो गई। यह बात अक्सर लोग नहीं जानते होंगे कि इस बस्ती का नक्शा पहले क्या रहा होगा? एक तो उस वक्त के तमाम चिन्ह मिट चुके हैं। दूसरे जो कुछ यादगार ऐतिहासिक इमारतें बची भी हैं वे आधुनिकता की भीड़ में गुम हो चुकी हैं।
हजरतगंज की सीमाएं आज भी वही हैं जो पहले कभी थी। कोठी नूरबख्श से लेकर कोठी हयातबख्श तक की दूरी हजरतगंज कही जाती है। अंग्रेजों के वक्त में उनमें से एक में डिप्टी कमिश्नर तो दूसरे में कमिश्नर रहता था। हजरतगंज के सिलसिले में सबसे पुरानी कोेठी हयातबख्श है। इस निवास स्थान को सआदत अलीखां ने 1800 मेें कलाड मार्टिन से खरीदा था। अब इसमें उत्तर प्रदेश के राज्यपाल निवास करते हैं और इसे राजभवन कहते हैं।
आसफुदौला के प्रिय मित्रा एवं दरबारी फ्रांसीसी स्थापत्यकार जनरल कलाड मार्टिन ने कोठी हयातबख्श का निर्माण किया था। 19 वीं सदी के प्रारम्भिक दिनों में नवाब सआदत अली खां ने जब धार मंजिल से लेकर दिलकुशा तक इमारतों की कतार बिछा दी तो हजरतगंज वाले क्षेत्रा में कई कोठियां बन गई जिनमें नूरबख्श कोठी, कंकरवाली कोेठी, ऐनकबाज की कोठी और मकबरा साहिब ज्यादा प्रमुख हैं।
हजरतगंज के पश्चिमी सिरे पर कोठी नूरबख्श स्थित है जिसमें अब लखनऊ के जिलाधिकारी निवास करते हैं। यहीं सामने ही उत्तर प्रदेश की प्रथम राज्यपाल, श्रीमती सरोजिनी नायडू की समाधि है। कोठी नूरबख्श से लगी हुई कोठी जहांगीराबाद है जिसमें बेगम अख्तर रही हैं और जहां फिल्म ‘उमराव जान’ के महत्त्वपूर्ण अंशों की शूटिंग हुई है।
नूरबख्श कोठी के सामने सड़क के उस पार कुछ हटकर कभी ‘ऐनकबाज की कोठी’ हुआ करती थी जिसमें नवाब सआदत अलीखां का एक मशहूर मुसाहिब रहा करता था, इसलिए जनता में यह अजूबा इंसान ऐनकबाज कहा जाता था। ऐनकबाज की कोठी के स्थान पर ही आजकल हिन्दी संस्थान भवन तथा पोस्टमास्टर जनरल आफिस हैं।
कोठी ऐनकबाज के बाद ही कंकर वाली कोठी थी जिसे नवाब सआदत अलीखां ने बनवाया था। इस कोठी पर कंकरों से बेहतरीन सजावट की गई थी। कंकर कोठी के कुछ इलाके में तो आज हलवासिया मार्केट खड़ी है। हलवासिया मार्केट के ठीक सामने मकबरा अमजद अली शाह है।
चाइना बाजार गेट को भी हजरतगंज का एक सिरा कहा जा सकता है। यह ऐतिहासिक फाटक वाजिद अली शाह के कैसर बाग का एक दरवाजा है। इस दरवाजे पर भी दस्तूरे अवध के मुताबिक मछलियों का जोड़ा सूरज के साथ बना हुआ है। इसे नवाब वाजिद अली शाह की हुकूमत में चाइना बाजार कहा जाने लगा था जहां अब प्रेस क्लब है।
हजरतगंज का पुराना काफी हाउस नगर के साहित्यकारों का प्रसिद्ध मिलन स्थल रहा है। बड़े-बड़े लेखक व कवि यहां अपनी शामें बिताते हैं और लोगों से मिलते हैं। कभी भगवती बाबू, यशपाल जी, नागर जी सभी यहां आते थे। ये सभी काफी हाउस के प्रेमी थे। अमजद अली शाह ने बेगम कोठी और उसके साथ कई मकान व एक मस्जिद बनवायी और उसे अपनी एक अन्य बेगम मलका अहद को नजर कर दिया।
आज पुराने लखनऊ को ध्वस्त करके नया लखनऊ बनाया जा रहा है, नई-नई रियासती कोठियां तथा बड़े-बड़े भवन यहां बनाये जाने लगे और इस तरह पुराना हजरतगंज आज का हजरतगंज बनता चला जा रहा है जिसमें हमारी लखनवी तहजीब बिलकुल विलुप्त होती जा रही है और पश्चिमी सभ्यता ने लखनऊ शहर को पूरी तरह अपने शिकंजे में जकड़ लिया है। यह वास्तव में एक चिन्ता का विषय है। (उर्वशी)

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