व्यक्ति के व्यक्तित्व का परिचय देती है दाढ़ी-मूंछ

प्राचीन काल से ही मानव के अंगों का अध्ययन होता आया है ताकि उनके लक्षणों के आधार पर उसका भविष्य जाना जा सके। इस अध्ययन को ‘सामुद्रिक शास्त्र के नाम से जाना जाता है। इस शास्त्र का उद्देश्य मानव के अंगों और उनके लक्षणों को अध्ययन कर उनकी अच्छी-बुरी संभावनाओं का पता लगाना है ताकि उसके आधार पर मानव अपनी जीवन यात्रा तय करते हुए सफलता प्राप्त कर सके। इस शास्त्र के तीन अंग होते हैं:- मुखाकृति विज्ञान, हस्तरेखा विज्ञान तथा पदलक्षण विज्ञान।
यद्यपि प्राचीन काल से ही लोग दाढ़ी-मूंछ रखते आये हैं और आज भी रख रहे हैं लेकिन सब के दाढ़ी-मूंछ रखने के ढंग एक समान नहीं हैं। कोई लंबी दाढ़ी रखना पसंद करता है तो कोई छोटी। किसी की दाढ़ी करीने से कतरी हुई होती है तो किसी की बिल्कुल बेतरतीब। इसी प्रकार किसी की मूंछें सजी संवरी रहती हैं तो किसी की अनवरत बिखरी हुई। कोई अपनी मूंछ लंबी नुकीली रखता है तो कोई केवल नाक के नीचे बिलकुल थोड़ी-सी। साधारणत: अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग तरीके की दाढ़ी मूंछें रखते हैं।
आमतौर पर सोलह-सत्रह वर्ष की उम्र होते-होते पुरूषों के गाल, दाढ़ी तथा होठों के ऊपर-नीचे रोएं जमने आरंभ हो जाते हैं जो बीस-बाईस वर्ष तक आते-आते पूर्ण रूप से दाढ़ी एवं मूंछ का स्वरूप ले लेते हैं। एक पूर्ण युवक के चेहरे पर लगभग 3०,००० बाल होते हैं। औरतों के ये बाल नहीं होते परन्तु वैज्ञानिकों का कहना है कि जिन हारमोनों के कारण पुरूषों के चेहरे पर ये बाल उगते हैं, यदि स्त्रियों में भी वही हारमोन बढ़ा दिए जाएं तो उनके चेहरे पर भी दाढ़ी-मूंछें निकल सकती हैं।
साधारणत: हम समझते हैं कि लोग अपने शौक और नए फैशन के मुताबिक अपनी दाढ़ी-मूंछ रखते हैं लेकिन सच्चाई इतनी ही नहीं है। सच्चाई तो यह है कि इस शौक और फैशन के पीछे मनुष्य का व्यक्तित्व छुपा होता है। जिसका जैसा व्यक्तित्व होता है, उसी के अनुरूप वह अपनी दाढ़ी-मूंछ रखने की शैली भी पसंद करता है।
कुछ लोग लम्बी दाढ़ी रखना पसंद करते हैं। उनकी दाढ़ी उनके चेहरे पर पूरी सघनता से जमी होती है और नीचे प्राय: छाती तक लंबी होती है। साथ-साथ यह नुकीली भी होती है। ऐसे लोग प्राय: गंभीर, संयमी और चिंतन-मनन की प्रवृत्ति वाले होते हैं। उनमें दृढ़ विश्वास, सहनशीलता, और प्रतिकूल परिस्थितियों को भी झेल पाने की क्षमता होती है। लंबी दाढ़ी आध्यात्मिक रूझान का भी प्रतीक है इसलिए साधु-संन्यासी अक्सर लम्बी दाढ़ी रखते हैं।
कुछ लोग लंबी दाढ़ी तो रखते हैं, परन्तु यह लंबी दाढ़ी नुकीली नहीं होती है बल्कि नीचे से दो भागों में बंटी हुई प्रतीत होती है। ऐसे व्यक्तियों का व्यक्तित्व भी दो भागों में बंटा होता है। कभी तो वे शांत, स्थिर, और गंभीर होते हैं परन्तु विषम परिस्थितियों में ऐसे लोग कभी-कभी चंचल, अस्थिर और उत्तेजित भी हो जाते हैं। वास्तव में ऐसी दाढ़ी व्यक्ति के भीतर चलनेवाली दो विचारधाराओं का प्रतीक होती है। ऐसी दाढ़ी रखनेवाले लोग आध्यात्मवाद और भौतिकवाद के द्वंद्व में भी उलझे होते हैं।
 कई लोगों के चेहरे पर दाढ़ी समान रूप से न उगकर यत्र-तत्र थोड़ी बहुत उगी होती है। ऐसे लोग उद्दण्ड, उच्छंृखल, धूर्त और अविश्वासी होते हैं लेकिन ऐसी दाढ़ी से भिन्न कई लोगों की केवल ठोड़ी पर ही दाढ़ी होती है। ऐसे लोग गुप्त विद्याओं के प्रति रूचि रखनेवाले होते हैं और जादू-टोना, तंत्र-मंत्र भूत-प्रेत आदि रहस्यात्मक शास्त्रों के ज्ञाता होते हैं।
आजकल कतरी हुई फ्रेंच, रूसी तथा अरेबियन शैली की दाढ़ी रखने का फैशन चल पड़ा है। ऐसी दाढ़ी ऊपर-नीचे तथा अगल-बगल से कहीं क्लीन और कहीं कैंची से कतरी हुई होती हैं। ऐसी दाढ़ी रखने वाले लोग बौद्धिक होते हैं, इसलिए ज्यादातर कवि, लेखक, चित्रकार या पत्रकार ऐसी दाढ़ी रखना पसंद करते हैं। ऐसी दाढ़ी रखने वाले लोगों की भी एक खास विशेषता यह होती है कि यद्यपि वे नवीनता और प्रगतिशीलता के प्रेमी होते हैं परन्तु अपनी परम्परा और संस्कृति की अवहेलना नहीं करते।
दाढ़ी की तरह मूंछ रखने के भी कई ढंग होते हैं। कुछ लोग लंबी, सीधी और नोंकदार मूंछें रखना पसंद करते हैं। ऐसे लोग निडर, साहसी, आत्मविश्वासी और अपनी धुन के पक्के होते हैं परन्तु कुछ लोग कभी-कभी दुस्साहसी, उद्दंड, आक्रामक और उत्तेजित भी हो जाते हैं।
कुछ लोग अपनी मूंछें दोनों ओर किनारों पर झुकी हुई रखते हैं। ऐसे लोगों में सहनशीलता, अवसरवादिता तथा भीरूता के गुण पाए जाते हैं। ये समझौतावादी भी होते हैं तथा समयानुसार अपना कार्य करने में सक्षम होते हैं।
आजकल जिस प्रकार की मूंछें रखने का ज्यादा फैशन है, उनमें तलवार कट मूंछें सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। ऐसी मूंछें राजपूत काल की शैली का प्रतीक हैं। ऐसी मूंछें रखने वाले लोग बाह्य दिखावे के पीछे पागल होते हैं। आर्थिक रूप से खोखले होने के बावजूद वे सदा बाहर से सम्पन्न दिखने का प्रयास करते रहते हैं। इसलिए अपनी औकात से ज्यादा खर्च करना तथा अपनी हद से बाहर जाकर बोलना इनका स्वभाव होता है।
कुछ लोग केवल नाक के नीचे ही मूंछों का गुच्छा रखते हैं और अगल-बगल दोनों ओर का भाग साफ कर लिया करते हैं। ऐसे लोगों में पर्याप्त वृद्धि, वाक पटुता, सम्पन्नता और सूझबूझ होती है। भौतिक सुख-वर्ग के लोग इस प्रकार की मूंछें ज्यादातर रखते हैं। ऐसे लोग भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए लालायित होते हैं, इसलिए इनमें कभी-कभी चापलूसी और चाटुकारिता की प्रवृत्ति देखने को मिल जाया करती है।
कुछ लोग अपनी मूंछ को लगभग आधा इंच काटकर रखते हैं जो उनके ऊपरी होंठ को ढककर रखती है। ऐसे लोग आदर्श, त्याग, सिद्धांत और उदारता के प्रेमी होते हैं। —————– (उर्वशी)




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