संभल कर रहें इमोशनल ब्लैकमेलिंग से

प्यार, मानव को सृष्टि की ओर से मिला एक तोहफा है जो रिश्तों के बीच सेतु बनकर रिश्तों को मजबूत बनाता है। दुनियां में कदम रखने के साथ ही मानव इस स्नेहिल प्यार को महसूस करने लगता है और जीवन भर प्यार के नए-नए रिश्तों को बनाने का प्रयत्न करता है।

प्यार के कई रूप होते हैं-मां का वात्सल्यमयी प्यार, पिता का अनुशासित प्यार, भाई-बहनों का नपा तुला प्यार, दोस्ती का सुखदायक प्यार, पत्नी का हरा भरा श्रृंगारमय प्यार। प्यार के कारण ही मानव का मन एक आकार लेता है। विकास की सीढ़ी-दर-सीढ़ी पार करते हुए प्रौढ़ावस्था में स्थिर बुद्धि, विचारों व भावनाओं में बंध जाता है उसका मन। जिसे यह प्यार दुर्भाग्यवश नहीं मिलता, वह जीवन में भटक जाता है और अपनी मंजिल तक पहुंचने की उसकी राह धुंधली हो जाती है।

यह प्यार ही कभी व्यक्ति की कमजोरी बन जाता है तो वही उसकी तबाही का कारण भी बन जाता है। प्यार का संबंध भावनाओं पर ही टिका होता है और जब कहीं प्यार भावनाओं की लक्ष्मण रेखा को पार करके शारीरिक संबंध बनाना चाहता है तो हलाहल हो जाता है। प्यार में डूबने वाला व्यक्ति जब अपनी वैचारिक व निर्णायक क्षमता को खोने लगता है तो उसे ‘इमोशनल ब्लैकमेलर‘ कहा जाने लगता है।

ब्लैकमेलिंग सिर्फ आर्थिक स्वरूप में ही नहीं बल्कि भावनात्मक रूप में भी होती है। आज के समाज में भावनात्मक ब्लैकमेलिंग करने वालों का प्रतिशत कुछ अधिक ही दिखाई देने लगा है। व्यक्ति की भावनाओं को दबा देना, उसे कुंठाओं में ग्रस्त होकर जीने के लिए विवश करना, हर समय तनावग्रस्तता का वातावरण बनाए रखना इसी ब्लैकमेलिंग का परिणाम होता है।

उदाहरण स्वरूप माता-पिता की दुलारी बेटी जब पढ़-लिखकर शादी करने योग्य हो जाती है और खुद निर्णय लेने योग्य हो जाती है, उस समय भी उसे जीवन-साथी स्वयं चुनने का अधिकार नहीं होता। हमने पढ़ाया लिखाया है, अच्छी शिक्षा दिलाई है, हमारे ही कारण आज तूं शिक्षित कहलाती है, आदि बातों के प्रभावों के माध्यम से मां-बाप बेटी की चाहत को, तमन्नाओं को या उसके प्यार को दबा कर अपना कब्जा जमाना चाहते हैं। बेटी की यह मजबूरी होती है कि वह मां-बाप की बातों को सुनकर अपनी आकांक्षाओं की आहुति दे डालती है। मां-बाप के विभिन्न प्रकार के व्यवहारों को देखकर उसके अंदर का आत्मविश्वास खोने लग जाता है। जीवन भर उसकी कमजोरी का अनुचित फायदा हर कोई उठाने लगता है।

पति-पत्नी का दांपत्य जीवन विवाह के कुछ वर्षों तक बहुत ही स्नेहिल रहता है। दोनों एक-दूसरे को बेहद चाहते हैं। जब कभी पत्नी को यह लगता है कि पति मेरे बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता तो उसे यदा-कदा सैक्स से वंचित रखकर उसे तड़पाने लगती है। लाचार पति सैक्स की चाहत में पत्नी की हर बात को मानने लगता है। पत्नी अपनी ‘सेक्स लाइफ‘ का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करने लगती है और मौका पाकर पति से इस हथियार की बदौलत कुछ भी पाती रहती है।

मानव मन दो तरह का होता है। एक वह, जो दूसरे के प्यार में पूरी तरह डूब जाना चाहता है और उस पर निर्भर रहने में ही अपनी भलाई समझता है जबकि दूसरा मन सामने वाले को अपने वश में रखना चाहता है, उस पर हमेशा अपना दबाव कायम रखता है। इन दो तरह के मन वालों में पहले किस्म के व्यक्ति जीवन में अधिक आहत होते हैं, टूटन-घुटन के शिकार होते हैं। निरंतर कुंठाग्रस्त रहते हैं। दूसरे प्रकार के व्यक्ति तब तक मस्ती में रहते हैं जब तक कोई विरोध करने वाला उन्हें नहीं मिल जाता।

युवावर्ग में ‘इमोशनल ब्लैकमेलिंग‘ की प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है। यह वय कुछ कर गुजरने की तमन्नाओं से युक्त होती है। इसमें चंचलता, भावुकता, आकर्षण, पराक्रम आदि सभी भावनाओं का मेल होता है। युवावस्था अत्यंत उच्छृंखल, ऊंची उड़ान भरने वाली, लहरों की भांति चंचल होती है। इस उम्र में वैचारिक व निर्णायक शक्ति अत्यंत अपरिपक्व होती है।

आजकल युवक-युवतियों के बीच अफेयर के परिणामस्वरूप मिली असफलता या सैक्स स्कैंडल आदि भी तो इसी इमोशनल ब्लैकमेलिंग के ही प्रत्यक्ष उदाहरण होते हैं। मानव मन का अविकसित व नाजुक दौर में ‘प्यार‘ नामक एक अस्पष्ट व अव्यक्त रिश्ते में बंध जाना, अपनी भावनाओं पर नियंत्राण न रखना, स्थिर विचार का अभाव व अनुचित निर्णय आदि, सब कुछ मिला-जुला परिणाम ही असफलता का कारण होता है। क्या इन युवाओं ने ‘प्यार‘ का कभी सही अर्थ जाना है?

युवाओं के अनुसार प्यार वही होता है जो एक-दूसरे के प्रति आकर्षण पैदा करता है। प्यार की अंतिम परिणति ‘सेक्स‘ को ही मानने वाले युवा वर्ग न सिर्फ ‘प्यार‘ जैसे पवित्रा शब्द को कलंकित करते हैं बल्कि अपने आचरण का भी गला घोंट लेते हैं। युवाओं की निर्णय शक्ति भी अपरिपक्व होती है अतः वैचारिक शक्ति भी पुष्ट नहीं हो पाती।

उम्र की उन्मत्तता में गलत कदम उठाने वाले युवक पर चरित्राहीनता का कीचड़ उतना नहीं उछलता जितना कि युवतियों पर। ‘सैक्स स्कैंडल‘ को ही प्यार मानकर चलने वाली युवतियों का जीवन सुलगती गीली लकड़ी की तरह धुआंयुक्त हो जाता है। इस अवस्था में ‘प्यार पराजिता’ बनकर वे विषैली नागिन के समान हो जाती हैं और प्रतिशोध की भावना से युक्त होकर अपने पति तक से विश्वासघात करने लगती हैं।

‘प्यार या प्रेम‘ एक ऐसा सुहागा है जो चरित्रा को सोने की तरह चमक प्रदान करता है। प्यार में जब तक त्याग की भावना नहीं आती, तब तक वह प्यार, प्यार नहीं कहला सकता। उम्र के जिस किसी भी मोड़ या पड़ाव से जज्बातों की आत्मनिर्भरता का रास्ता शुरू होगा, वहीं से अपनी मंजिल दिखाई देनी शुरू हो जाती है। यह सच है कि प्यार में इमोशनली ब्लैकमेल करना जायज नहीं तो इमोशनली ब्लैकमेल होना भी नाजायज है। (उर्वशी)

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