स्वर्ण नगरी – जैसलमेर

मीरासी, मांगणियार, लंगा जाति के कलाकारों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान पाने वाला नगर जैसलमेर स्वर्ण नगरी के रूप में विख्यात है। न केवल लोक सांस्कृतिक दृष्टि से बल्कि स्थापत्य कला, वास्तु, शिल्प तथा नक्काशी कला की विशिष्टता के कारण जैसलमेर विश्वभर में अपनी साख रखता है।
पीले पत्थरों से बने विशाल भवन, भव्य राजप्रासाद, कलात्मक हवेलियां, प्राचीन दुर्ग बरबस ही लोकलोचनों को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं। जैसलमेर की स्थापना 1156 में हुई। यादव वंश के भाटी राजपूत रावल जैसल ने इसकी स्थापना की थी। थार रेगिस्तान के बीच में स्थित जैसलमेर शहर एक स्वर्णिम मरीचिका की तरह है।
ऐतिहासिक गाथा अपने अंक में समेटे हुए जैसलमेर पर्यटन स्थल के रूप में अंतर्राष्ट्रीय मानचित्रा पर तेजी से उभर रहा है। अक्तूबर से मार्च तक विदेशी पर्यटकों का यहंा भारी हुजूम देखा जा सकता है। तब जैसलमेर के घर-घर में पेइंग गेस्ट नजर आयेेंगे।
एक समय में पानी की विपुल कमी के कारण जाना, जाने वाला यह नगर आज ठंडे पेय, मिनरल वाटर, सुसज्जित होटल तथा विविध प्रकार के व्यंजनों को परोसे जाने के रूप में जाना जाता है। पर्यटन की दृष्टि से पहचान मिलने के पश्चात् जैसलमेर के स्थानीय लोगों को कुछ हद तक रोजगार के अवसर प्राप्त भी हो गए हैं। प्रति वर्ष विदेशी पर्यटकों के बड़ी संख्या में आने के बावजूद भी नगर में मध्यकालीन सभ्यता के दर्शन आज भी होते हैं।
सामरिक दृष्टि से जैसलमेर पाकिस्तान के नजदीक होने के कारण भी महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक वर्ष जनवरी-फरवरी माह में मरू उत्सव आयोजित किया जाता है जो एक प्रकार से अंतर्राष्ट्रीय मेला होता है। उस समय सुरीली धुनों व तालों के स्वर यहां गूंज उठते हैं। लोकनृत्य विविध प्रकार की प्रतिस्पर्धाएं, प्रतियोगिताएं यहां उस समय आयोजित की जाती हैं। रामगढ़ व सम के रेतीले धोरे जैसलमेर जिले की आभा को द्विगुणित करते हैं। इस क्षेत्रा में चारों तरफ रेत का समुद्र पसरा नजर आता है। सूर्यास्त व पूर्णमासी की रात्रि के समय यहां भव्य नजारे देखे जा सकते हैं।
जैसलेमर के दर्शनीय स्थलः
सोनार का किलाः-यह दुर्ग जैसलमेर का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। एक त्रिभुजाकार पहाड़ी पर 99 बुर्र्जांे वाले परकोटों से घिरा यह दुर्ग लगभग साढ़े आठ सौ वर्ष पुराना है 1500 फीट लंबे एवम् 750 फीट चौडे़ क्षेत्राफल में फैला सोनार का किला जमीन से 250 फीट ऊंचा है। दुर्ग के परकोटे में पूरा नगर समाया हुआ है। दुर्ग के भीतर मध्यकालीन सभ्यता के दर्शन होते हैं आखेपोल, सूरजपोल, गणेशपोल एवम् हवापोल को पार कर दुर्ग तक पहंुचा जा सकता है।
दुर्ग में रंगमहल, राजविलास, मोतीमहल, जैन मंदिर, सनातन मंदिर देखने योग्य हैं। दुर्ग में ही स्थित जैन मंदिर के तहखाने में जिनभद्र सूरी ज्ञान भंडार बना हुआ है जिसमें प्राचीन ग्रंथों का विपुल संग्रह है। विविध भाषाओं में लिखे यहां के ग्रंथों का संग्रह देखने योग्य है। ताड़ पत्रों का संग्रह भी यहां देखा जा सकता है। यहां पर हस्तलिखित सरस्वती स्रोत पांच फीट ऊंचे तथा चार फीट चौड़े कांच में मढ़ाकर रखा हुआ है।
कलात्मक हवेलियां-जैसलमेर कलात्मक हवेलियां से भी जाना जाता है। पीले पत्थरों से बनी ये हवेलियां अपनी बनावट, शिल्प, वास्तु, नक्काशी के कारण विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। केवल इनके पत्थरों पर तराशी गई कोरनी ही देखने योग्य नहीं है बल्कि लकड़ी पर सूक्ष्मता से तराशी गई कारीगरी भी बेजोड़ है। ये हवेलियां जैसलमेर की शान हैं। इनमें पटवों की हवेलियां, शालिम सिंह की हवेली तथा दीवान नथमल की हवेली प्रमुखता से गिनी जाती हैं।
पटवों की हवेलियांे के अंदर लकड़ी की छत, मिट्टी का आंगन, खुला चौक, तलभंवरा, हवादार रसोई स्थापत्य की दृष्टि से विशेषता लिये हुए है। दीवान नथमल की हवेली में दो भाइयों की हाथ की कारीगरी देखते ही बनती है। इस हवेली में दोनों भाइयों ने जमकर जौहर दिखाया।
झरोखों, खिड़कियों, तिबारियों की कला दर्शनीय है। हवेली की छतें पत्थरों के टुकड़ों को जोड़-तोड़ कर बनाई गई हैं। सालिम सिंह की हवेली 300 वर्षों से भी अधिक पुरानी है। इस हवेली में आकर्षक नील गुंबद वाली छत एवम् मोर के रूप में बेहतर ढंग से नक्काशीदार प्रकोष्ठ है। यह पीले पत्थर से बना है। इसकी नक्काशी देखते ही बनती है। इसमें सुंदर बालकनी है जो अलंकृत है।
गढ़ीसर तालाबः-यह सरोवर अपने कलात्मक प्रवेश द्वार जलाशय के मध्य स्थित सुंदर छतरियों व इसके किनारे बनी बगीचियों के कारण प्रसिद्ध है। यहां नौका विहार की भी व्यवस्था है। आस-आस कई मंदिर भी हैं जो दर्शनीय हैं। सरोवर में विभिन्न प्रजातियों के पक्षी जलक्रीड़ा करते देखे जा सकते हैं।
सम के टीलेः-जैसलमेर के पश्चिम में 42 किमी. दूर थार मरूस्थल में विशाल रेतीले टीलों का स्थान है जो समग्राम के निकट स्थित है। इन रेतीले टीलों पर ऊंट सवारी का आनंद लिया जा सकता है। इसी स्थान पर सूर्यास्त का दर्शन पर्यटकों का मनमोह लेता है। पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित मरू महोत्सव के दौरान सम के टीलों पर पर्यटकों का तांता लगा रहता है। इस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन समां बांधता है।
अमर सागरः-यहां तालाब है तथा उसके किनारे जैन मंदिर स्थित है। इस मंदिर में मूर्ति लगभग 1500 वर्ष पुरानी है स्थापत्य एवम् शिल्पकला की दृष्टि से मंदिर बेजोड़ है। एक तरफ बगीचा भी बना हुआ है जहां छतरियां दर्शनीय हैं। यह जैसलमेर से मात्रा 5 किमी. दूर है, लोग यहां पिकनिक मनाने आते हैं।
लोद्रवाः-जैसलमेर से 16 किमी. दूर लोद्रवा स्थित है जो एक समय में जैसलमेर राज्य की राजधानी थी। मध्य युग में यहां विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किये थे। आज यह स्थान जैन संप्रदाय का प्रमुख तीर्थस्थल है। यहां के भव्य जैन मंदिर का निर्माण थारूशाह भंसाली ने करवाया था। मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से बेजोड़ है। मंदिर का मुख्य तोरण द्वार प्राचीन भारतीय कला का अनूठा उदाहरण है। राजस्थानी काव्य में वर्णित प्रेमी युगल मूमल-महेन्द्रा का यह प्रणय स्थल है।(उर्वशी)

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