अब जमाना औरतों का है

समय बदला। बातें बदल गईं। पहले पुरूषों का राज था, आज औरतों का
जमाना है। ग्लैमर की दुनिया हो या घरेलू फ्रन्ट, आज औरतों की ही ज्यादा
चल रही है। कानून ने भी काफी सहारा दिया है। मियां बीबी में जरा सी
खटपट हुई कि बीवी फौरन प्रताडऩा का केस करने की धमकी दे डालेगी।
इसके लिये न सबूत चाहिए, न गवाह।
आज की औरत के कई रूप हैं। उसकी पहचान अब पुरूष से नहीं रह गई।
उसकी अपनी अस्मिता है, पहचान है। प्रतिभा पाटिल, किरन बेदी, लेट
कल्पना चावला, किरन मजूमदार ऐसे नाम हैं जो अपने आप में एक
इंस्टीट्यूशन हैं।
महत्वाकांक्षा कुछ हद तक ही ठीक है। बहुत जल्दी बहुत कुछ पा लेने की धुन
में बेस्ट बनते-बनते जो ‘वस्र्टÓ होने का टे्रंड चल पड़ा है, उससे समाज
विकृति की ओर उन्मुख हो रहा है।
पढ़ लिखकर जब लड़कियां घर से दूर नौकरी करते हुए अकेले रहने लगती
हैं, उन्हें स्वच्छंद रहने की आदत हो जाती है। इसी चक्कर में वे शादी भी नहीं
करता चाहती। कोई न कोई ब्वॉयफ्रैंड पति की कमी पूरी करने के लिए ढूंढ
लेती हैं। मां बाप शाबाशी देते हैं, हमारी बेटी बड़ी हिम्मती है।
यही आज का टें्रड है। इस तेज बहाव को रोक पाना अब किसी के वश में नहीं
है। स्त्री सशक्तिकरण जैसा मंत्र अपने साथ तबाही भी कम नहीं लाया है।
आज समाज में जो कुछ हो रहा है, उससे असुरक्षा का माहौल बन गया है।
अपराध बेहिसाब बढ़ गए हैं। इसमें स्त्री सशक्तिकरण जैसी बातों की
जिम्मेदारी भी कम नहीं है।
समाज में एक बढिय़ा सिस्टम चला आ रहा था। कुछ बुराइयां थी, उनका
उन्मूलन भी हुआ। कुरीतियों को तो खैर मिटना ही चाहिए। आज का समाज
एक जागरूक समाज है लेकिन उसके बावजूद दिशाभ्रमित है। इसके लिए
महिलाएं ज्यादा जिम्मेदार हैं। महत्वाकांक्षाओं ने उनका सिर घुमा दिया है।
औरत करियर, नाम और पैसे की चकाचौंध के पीछे भागती रहेगी तो घर तो
तबाह होंगे ही। बच्चे बिगड़ेंगे। बड़े होकर अपराधी, अत्याचारी, कातिल,
रेपिस्ट बनते हैं तो उसके लिये जिम्मेदार कौन है? अगर उन्हें शुरू से घर में
अच्छा वातावरण अच्छे संस्कार शिक्षा दीक्षा मिले तो वे अपराध की ओर
उन्मुख नहीं होंगे।
सहजीवन को कानूनी मान्यता देकर क्या हम एक गलत जीवनशैली को
बढ़ावा नहीं दे रहे? आज लोकप्रिय होने के लिये आधुनिकता का दम भरते
लोग औरतों की आजादी को लेकर गलत बातों की पैरवी करने लगे हैं
लेकिन इससे समाज का भला नहीं होने वाला।
औरतों के पक्ष में लड़े जाने वाले ज्यादातर मामलों में गलती सिर्फ एक पार्टी
की नहीं होती। दहेज लोभी लोगों का पहले ही पता चल जाता है। बावजूद
इसके उनके पैसों के लोभ में लड़की वाले यह सोचकर कि लड़की पैसों में
खेलेगी, वहीं रिश्ता करते हैं।
लालच एक तरफ ही नहीं, दोनों तरफ देखने में आता है। लड़की वाले अपने
पैसों के घमंड में लड़के खरीदते हैं। क्या यह गलत नहीं? इसमें ‘द बेस्टÓ
यानी कि लड़की की भी रजामंदी होती है। उसे ऐशपूर्ण जिन्दगी चाहिए।
औरतों ने भले ही सफलता के झंडे गाड़े हों लेकिन उनका नैतिक पतन
नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *