सुख स्मृद्धि का प्रतीक मां लक्ष्मी

‘‘लक्ष्मी को ही सुख, समृद्घि व संपन्नता की देवी कहा जाता है। यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि इस दिन लक्ष्मी जी स्वर्ग से इस लोक में अपना आगमन करती हैं और वह एक द्वार से दूसरे द्वार पर जाती हैं।’’
दीपावली का पर्व वैसे तो सुख, समृद्घि व सम्पन्नता का प्रतीक होता है। यह पर्व मानव में परस्पर स्नेह व एकता की दीप मालिका की तरह सदैव अपना जीवन प्रकाशित रखने का संदेश देता है। फिर भी प्रत्येक पर्व का अपना एक विशेष स्थान, विशेष पहचान व विशेष संस्कृति होती है।
दीपावली का यह पर्व विभिन्न देशों में अपनी-अपनी संस्कृति के अनुसार मनाया जाता है लेकिन हर देश में दीपावली को किसी न किसी रूप मेंं धनलक्ष्मी के रूप में अवश्य स्वीकारा है। हमारे देश में यह पर्व विजयादशमी के बीसवें दिन हर्षोल्लास से मनाया जाता है।
इस दिन महालक्ष्मी की भी आराधना की जाती है क्योंकि लक्ष्मी को ही सुख, समृद्घि व संपन्नता की देवी कहा जाता है। यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि इस दिन लक्ष्मी जी स्वर्ग से इस लोक में अपना आगमन करती हैं और वह एक द्वार से दूसरे द्वार पर जाती हैं। जिस द्वार पर उन्हें रात्रि भर जागरण, उनकी आराधना, घर में स्वच्छता तथा सारा घर आलोकित दिखाई देता है वहीं वह प्रवेश कर अपना कुबेर धन उड$ेल जाती हैं।
दीपावली का यह पर्व अपनी संस्कृति के आधार पर सारे संसार के कुछ देशों में भिन्न-भिन्न तरह मनाया जाता है। अपने भारत देश में जब कुषाण शासकों ने उत्तर भारत पर अधिकार किया तो उन्होंने भारतीय सिक्कों पर भारतीय देवताओं शिव समूह व लक्ष्मी की प्रतिमा को खुदवाया जिसकी लोग पूजा करने लगे। ठीक इसी तरह गुप्त साम्राज्य में समुद्रगुप्त के सिक्कों पर लक्ष्मी अपने कमलासन पर विराजमान थी और लक्ष्मी की विराजमान स्थिति व ख$डी स्थिति में उनकी पूजा की जाती है।
सूडान देश में लक्ष्मी पूजा का रूप प्रकृति से मानते हैं। इस देश में धान का पौधा धन को पैदा करने वाला माना गया है। इसलिये यहां के लोग लक्ष्मी को धान पैदा करने वाली देवी मानते हैं और वे उसकी उसी रूप में पूजा करते हैं।
जावा देश में वहां की स्त्रियां अपनी सुंदरता को ब$ढाने के लिये आभूषण पहनती थी। उन प्राचीन आभूषणों पर ‘श्री’ नाम का निशान बना होता है जो लक्ष्मी का रूप माना जाता है। इसी लिये शायद जावा के निवासी लक्ष्मी को ‘सोने की देवी’ के नाम से पूजा करते है।
कहा जाता है कि बाली द्वीप में यहां के राजाओं की लक्ष्मी रानी के रूप में रहती थी लेकिन जब उनको विष्णु से प्यार हो गया तो वह मृत्यु को सिधार गयी। विभिन्न जाति के पौधे उनकी समाधि पर उगे पाये गये लेकिन उनकी नाभि पर धान का पौधा उगा पाया गया। उसे ही वह धनलक्ष्मी का पौधा मानकर पूजा करते हैं।
ग्रीस देश में सम्पन्नता की देवी को ‘री’ के रूप में और ‘राई’ को धन माना जाता है। रोम देश के ‘लम्पकस’ से प्राप्त एक रजत की थाली पर लक्ष्मी का ‘भारत लक्ष्मी’ स्वरूप दिखाई दिया है।
कम्बोडिया में शेषशाई विष्णु की एक प्रतिमा मिली है। इसमें लक्ष्मी जी को विष्णु के पांव दबाते बतलाया गया है, यह कांसे की बनी है। जापान देश में १६ वीं सदी में बने एक लक्ष्मी मंदिर का पता चला है। इसमें लक्ष्मी को एक जापानी महिला के रूप में दिखाया गया है।
श्रीलंका में पोलोम रूवां नामक स्थान पर शिव दंडल में खुदाई हुई जिसमें भारतीय देवी-देवताओं के साथ कमल पर विराजमान लक्ष्मी की प्रतिमा मिली है। तक्षशिला में भी लक्ष्मी की एक विशालकाय सुंदर, आलीशान प्रतिमा है जिसके एक हाथ में द्वीप प्रज्जवलित है जो लक्ष्मी प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम में सुरक्षित है।
इस तरह हमारे देश के अतिरिक्त विदेशों में भी धन-लक्ष्मी की पूजा की विभिन्न परम्पराएं कायम हैं जिनमें सर्वमान्य यह है कि धन लक्ष्मी सुख, समृद्घि व सम्पन्नता की प्रतीक है। इसलिये उनकी विभिन्न तरह से विभिन्न देशों में पूजा की जाती है।
=ईश्वरदास ‘पीयूष’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *