क्या आपका विवाह होने वाला है

जिस प्रकार हर चीज का एक खास मौसम होता है उसी तरह शादी-ब्याह का
भी विशेष मौसम होता है। इन दिनों शादियों की काफी गहमा-गहमी रहती
है। घर में शादी के कार्डों का ढेर लगा रहता है। अ ाज यहां तो कल वहां। कुल
मिलाकर हम सभी इन दिनों शादी-ब्याह के चक्करों में व्यस्त होते हैं।
शादी का अ र्थ है दो अ लग-अ लग जिंदगियों या दो व्यक्तियों का मेल। कहते
हैं कि यह रिश्ता स्वर्ग से बनता है। फिर भी कुंडलियां मिलाई जाती हैं,
इश्तहार दिए जाते हैं। काफी भाग-दौ$ड होती है। वर वधू की तलाश में जो
अ पना निजी फैसला कर लेते हैं। अ धिकतर लोग अ पने माता-पिता के फैसले
को ही मान कूद प$डते हैं विवाह कुंड में।
ऐसे में दिल मिल जाएं तो अ पना भला, घर का भला नहीं तो लोगों का भला
जिन्हें नित नया तमाशा बिना टिकट देखने को मिल जाता है। बातों में बात
चली तो एक उदाहरण देखिए। हाल ही किसी की शादी पर देने के लिए
तोहफे की बात हो रही थी। मेरे मित्र ने सलाह दी कि एक ‘हैलमेटÓ दे दो।
अ ाखिर उसने ऐसा क्यों कहा? उसके लिए तो चाहे व्यंग्य था पर मेरे लिए
सवाल जिस का हल सीधा जरूर है पर कुछ क$डवा भी।
यह प्रश्न इसलिए पैदा हुअ ा कि अ ाजकल विवाह केवल मजाक बन रही तो
रह गया है जिसमें गलती सिर्फ एक पक्ष की नहीं बल्कि दोनों पक्षों की होती
हैं वर यानी ल$डका अ थवा वधू यानी ल$डकी, दोनों अ पने अ पने सपने सजाते
हैं अ ौर कल्पना को ही हकीकत में पाना चाहते हैं। जब ये कल्पनाएं साकार
नहीं होती तो समस्त कुंठाएं विवाद का रूप ले लेती हैं। जैसे एक ल$डका
कल्पना करता है सीधी-सादी ल$डकी जो फैशनपसंद हो। ऐसे में ल$डका
जरूर रोक टोक करेगा अ ौर ल$डकी इतनी अ ासानी से मानने वाली नहीं
क्योंकि कुछ ल$डकियां जिद्दी स्वभाव की होती हैं अ ौर ल$डके भी। ऐसे में
दोनों अ पनी अ पनी बात एक दूसरे पर थोपते हैं अ ौर कोई भी समझौते को

राजी नहीं होता।
अब दोष किसको दिया जाए कल्पनाअ ों को या हकीकत को। जब विवाह हो
ही गया फिर कल्पनाअों का क्या काम। ऐसे में ल$डके-ल$डकी का फर्ज है
अ ापस में एक दूसरे की अादतों को समझ लें अौर एक दूसरे के अ रमानों की
कदर करें। तभी जिंदगी सुखमय बन पाएगी।
विवाह से पूर्व ही अ पने को तैयार कर कल्पनाअ को छो$ड हकीकत से
समझौता कर लें तो अ च्छा है क्योंकि वह ल$डकी जो विवाह के बाद दूसरे
माहौल में जाती है, कुछ समय अ पने को बिल्कुल अ केली पाती है। ऐसे में
यदि पति का सहयोग न मिले तो वह मन से टूट जाती है अ ौर शायद फिर
संभल नहीं पाती अ ौर अ क्सर टकराव होता रहता है अ ौर ल$डकी का फर्ज भी
हो जाता है वह जैसे माहौल में जाए, वैसे ही स्वयं को ढाल ले।
वर को या वर पक्ष को यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि सिर्फ अ पनी ही
बात मनवाएं, हर ढंग उनके जैसा हो। कुछ बदलाव उनमें भी अ ाना चाहिए
यानी थो$डा अ ाप अ ागे ब$ढें, कुछ वो, थो$डा अ ाप मानें, थो$डा वे। तभी तो गा$डी
चलेगी। यदि ऐसा न हो तो गा$डी पटरी से उतर अ लग-थलग हो जाएगी।
अ ाप ल$डकी की भावनाअ ों की कदर करें, उसकी बात को मानें, तभी अ पेक्षा
करें कि वह अ ापकी भावनाअ ों की कदर करेगी अ ौर बात मानेगी। हमें एक
दूसरे पर अ पनी इच्छाएं भी नहीं लादनी चाहिए। सिर्फ समझ एवं अ ापसी
समझौते से ही विवाह को सुखमय बनाया जा सकता है।
इस प्रकार शादी का बंधन मधुर हो पाएगा अ न्यथा क$डवाहट से भर नीरस हो
जाएगा। शादी कीजिए, बरबादी नहीं, घर बसाइए, बिगा$डें नहीं। ह्रश्वयार से
सजाएं, संवारें। उसे अ ापसी मनमुटाव या जिद में नष्ट न करें। विवाह दो
अ ात्माअ ों का मेल ही रहे, टूटन नहीं।

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