मेंहदी का प्रयोग व महत्त्व

मेंहदी का भारत में प्राचीन काल से ही बड़ा महत्त्व रहा है। मेंहदी को लेटिन भाषा में लासोनियाएल्वा कहते हैं। यह लोइथ्रासीज जाति की वनस्पति है। इसे उर्दू में ‘हीनाÓ नाम से जाना जाता है। इसका प्रयोग पांच हजार वर्षों से किया जा रहा है।
प्राचीन काल से ही नारियों एवं किशोरियों ने विभिन्न साधनों के द्वारा अपने आपको आकर्षक दिखाने की इसी कोशिश में मेंहदी उनके हाथ लगी। और बाद में तो नारी के सोलह श्रृंगारों में मेंहदी का भी महत्त्वपूर्ण स्थान बन गया।
भारतीय समाज में हाथों और पैरों पर लगी मेंहदी सुन्दरता की निशानी मानी जाती है। मेंहदी ने सिंदूर के समान ही प्रतिष्ठा पायी है। दुल्हन के हाथों व पैरों में लगी मेंहदी एक अलग ही आकर्षण पैदा करती है।
यहां अनेक त्योहारों पर मेंहदी लगायी जाती है। हरियाली तीज, होली, दीपावली, रक्षाबन्धन, वर सप्तमी और करवाचौथ जैसे त्यौहार हाथों और पैरों पर मेंहदी लगाये बिना अधूरे से रहते हैं।
उत्तर भारत में विवाह से पहली रात्रि का बड़ा महत्त्व होता है। ससुराल से भेजी गयी मेंहदी लड़की के हाथों और पैरों में लगायी जाती है। बहुत सी किशोरियां अंधविश्वास की वजह से शादी से पूर्व ही अपने हाथों पर मेंहदी रचाकर यह देखती हैं कि यह कितनी गहरी रची है। इससे वे अपने भावी साथी के प्रेम का अंदाजा लगाती हैं कि वह उसे कितना चाहेगा। मेहंदी जितनी ज्यादा गहरी रचेगी, उसका भावी पति उसे उतना ही ज्यादा प्यार करेगा।
शादी विवाह की मंगल बेला पर मेंहदी रचाना शुभ माना जाता है और शादी के शुभ अवसर पर मेंहदी लगाने में प्रवीण महिलाओं को बुलाया जाता है। दुल्हन के मेंहदी रचे हाथों पैरों को देखने को बहुत सी किशोरियां लालायित रहती हैं।
मेंहदी रचाने से पहले उसे तैयार करना जान लेना चाहिए। मेंहदी घोलने के अनेक तरीके हैं जैसे गांव में मेंहदी के पौधे होते हैं लेकिन शहरों में सूखी पत्तियां या सूखा पाउडर ही मिल पाता है। बाजारों में मिलने वाली मेंहदी नुकसानदायक हो सकती है क्योंकि इसमें कृत्रिम रंग मिलाये जाते
हैं।
मेंहदी का पाउडर खरीदते समय यह जानना बहुत आवश्यक है कि पाउडर पुराना तो नहीं है क्योंकि पुराना पाउडर अच्छा रंग नहीं लाता, न ही रचाते समय उसका पतला तार बन पाता है। मेंहदी में मिट्टी का तेल मिलाने से यह अधिक रंग लाती है। मेंहदी में सरसों का बारीक पिसा हुआ पाउडर मिलाने से मेंहदी अधिक लाल रचती है। मेंहदी को भिण्डी व अरबी के लेस वाली पानी व कत्था मिलाकर घोलना चाहिए।
मेंहदी न केवल सौंदर्य का ही साधन है बल्कि आयुर्वेद में इसे जीवनोपयोगी और स्वास्थ्यवर्धक औषधि के रूप में माना गया है। पुरूष इसका उपयोग सिर तथा दाढ़ी के सफेद बालों को लाल रंगने के लिए करते हैं जिससे उनका व्यक्तित्व कभी कभी बहुत ही आकर्षक बन जाता है। साथ ही यह बालों के लिए कंडीशनर का काम करती है। इसके फूलों से इत्र भी बनाया जाता है। मई जून के महीने में हाथ व पैरों तथा सिर में मेहदी लगाने से ठंड पहुंचती हैं।
मेंहदी चर्मरोगों के लिए बहुत ही प्रभावी औषधि है। शारीरिक गर्मी, मिर्गी तिल्ली तथा बालों को झडऩे से रोकने में काफी कामयाब रहती है।
जलने तथा कटने की अवस्था में भी मेंहदी का लेप करने से बहुत लाभ पहुंचता है।
शहद और मिश्री के साथ मेंहदी के पत्ते खाने से श्वास कफ दमा और खांसी में आराम मिलता है। अनिद्रा की अवस्था में भी यह बहुत उपयोग है। मेंहदी के फूलों को तकिये में रखकर सोने से नींद गहरी आने लगती है।
इस प्रकार मेंहदी हमारे जीवन में बहुत उपयोगी है। मेंहदी भारतीय समाज में धार्मिक सामाजिक और कलात्क रूप से छाई हुई है। इसका प्रयोग एवं महत्त्व दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। मेंहदी का प्रचलन एवं लोकप्रियता और भी बढऩे की संभावनायें हैं। (उर्वशी)



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *