केले के छिलके का कमाल देख कर रह जायेंगे दांग

नंदू टे्रन में सफर कर रहा था। वह अपने मामा के यहां खरोरापुर गांव जा रहा था। दोपहर का समय था। नंदू खिड़की के पास वाली सीट पर बैठा बाहर के दृश्यों का आनंद ले रहा था।
टे्रन में कुछ यात्री सो रहे थे, तो कुछ जगे हुए थे। टे्रन घने जंगल से गुजर रही थी। तभी टे्रन में गोली चलने की आवाज गूंजी। सभी यात्री चौंक गए। जो यात्री सो रहे थे, वे भी हड़बड़ाकर उठ बैठे। सभी एक दूसरे को सवालिया निगाहों से देखने लगे।
तभी नंदू के डिब्बे में एक डाकू घुसा। वह बंदूक थामे गरजा, ‘जिसके पास जो कुछ भी है, उसे तुरंत मेरे हवाले कर दो वरना अंजाम बहुत बुरा होगा।Ó
डाकू यात्रियों की ओर बंदूक ताने खड़ा था। अचानक एक बूढ़ा व्यक्ति चीखा, ‘बचाओ….बचाओ…….।Ó
डाकू उस बूढ़े व्यक्ति के सीने में बंदूक टिकाकर बोला, ‘चुप बुड्ढे वरना मौत की नींद सुला दूंगा।Ó
बूढ़ा व्यक्ति डर के मारे चुप हो गया। एक यात्री को चुपचाप बैठा देखकर डाकू गरजा, ‘अबे, तुम्हारे बैग में क्या है?Ó
‘कपड़े वगैरह हैं।Ó
डाकू ने उसे तमाचा जड़ते हुए कहा, ‘झूठ बोलता है….. चल बैग खोलकर दिखा।’
यात्री कांपते हाथों से बैग खोलने लगा। बैग के खुलते ही डाकू की आंखें चमक उठीं। बैग में 5०० रूपए के नोटों की 1० गड्डियां रखी थीं। डाकू ने उस यात्री को दूसरा तमाचा जड़ते हुए कहा, ‘मुझसे छिपा रहा था। समझदारी इसी में है कि अपने सारे गहने, रूपए-पैसे मेरी झोली में डाल दे।’
नंदू अपनी सीट पर चुपचाप बैठा सब कुछ देख रहा था। डाकू की करतूत देखकर उसका खून खौल रहा था लेकिन वह कुछ करने में सक्षम नहीं था। फिर भी उसका दिमाग ऐसी योजना बनाने की कोशिश कर रहा था, जिससे वह डाकू को सबक सिखा सके।
अब डाकू ने नंदू के पास आकर पूछा, ‘अरे छोकरे, जो कुछ तुम्हारे पास है, खुद ही निकालकर देगा या मुझे निकालना पड़ेगा?Ó
‘नहीं, मैं खुद ही निकालकर दूंगा,Ó कहते हुए नंदू ने जेब में रखे 2०० रूपए डाकू को दे दिए।
डाकू फिर बोला, ‘अबे, तेरे थैले में और क्या है? चल, दिखा।Ó
नंदू ने अपना थैला खोलकर दिखा दिया। उसका थैला केलों से भरा था, जिन्हें वह मामा के यहां ले जा रहा था। थैले में केले देखकर डाकू दूसरे यात्री के पास चल दिया। तभी केलों को देखकर अचानक नंदू के दिमाग में एक योजना आई। उसने तुरंत एक केला निकाला और उसका छिलका उतार दिया और मौका देखने लगा। डाकू बारी-बारी से सभी यात्रियों से सामान, रूपए-पैसे ले रहा था। नंदू की नजरें डाकू के पैरों पर टिकी थीं।
तभी डाकू टे्रन के गेट की ओर बढ़ा। नंदू को मौका मिला। उसने केले का छिलका चुपके से डाकू के पैरों के आगे फेंक दिया। डाकू का दायां पैर केले के छिलके पर पड़ा और वह फिसलकर धड़ाम से गिर पड़ा। बंदूक उसके हाथ से छूट
गई।
नंदू ने तुरंत लपककर डाकू की बंदूक उठा ली और फिर एक पैर डाकू के पेट पर रखकर बंदूक उसके सीने की ओर तानते हुए बोला, ‘अब तुम्हारी जान मेरी मु_ी में है। बोल, सुला दूं तुम्हें मौत की नींद?Ó
‘नहीं….नहीं…., मुझे माफ कर दे बेटा। मैं अब ऐसा काम नहीं करूंगा,Ó डाकू हाथ जोड़कर नंदू से जान की भीख मांगने लगा। टे्रन के यात्री खड़े-खड़े आश्चर्य से नजारा देख रहे थे।
‘आप लोग खड़े-खड़े क्या देख रहे हैं? रस्सी लाकर इस बदमाश को बांध दीजिए,’ नंदू ने यात्रियों से कहा।
यह सुनते ही सभी यात्री डाकू के ऊपर टूट पड़े। उसके हाथ-पैरों को मजबूती से बांध दिया। यात्रियों की खुशी की सीमा न थी। सभी नंदू के साहस की प्रशंसा कर रहे थे। नंदू की वजह से वे लुटने से बच गए।
स्टेशन पर डाकू को रेलवे पुलिस को सौंप दिया। रेलवे पुलिस ने नंदू को उसकी बहादुरी के लिए 25 हजार रूपए का पुरस्कार देने की घोषणा की। (उर्वशी)

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