पत्नी का तन और मन कैसे जीतें

कोई भी पुरुष जब किसी स्त्री से विवाह कर लेता है तो उसके बाद उस पुरुष का अपनी पत्नी पर पूरा अधिकार हो जाता है। पत्नी को पति के अनुसार ही अपनी आगे की जिंदगी बितानी पड़ती है। मां-बाप के घर के बाद पति का घर ही पत्नी का आसरा होता है। पत्नी जब अपने आपको पूरी तरह से पति के आसरे छोड़ देती है तो पति का भी फर्ज बनता है कि वह भी उसका अच्छी तरह से ख्याल रखे, वह अपनी पत्नी के सुख-दुख का पूरा ध्यान रखे। हर पत्नी शादी के बाद अपने तन और मन को पति के लिए समर्पित कर देती है क्योंकि वह जानती है कि शादी के बाद पति को सबसे पहले अपनी पत्नी का शरीर चाहिए होता है। इसको इस तरह से भी देखा जा सकता है कि शादी के बाद पत्नी के लिए समर्पण जरूरी हो जाता है लेकिन यह समर्पण का भाव स्त्री के लिए हमेशा एक समान नहीं रहता कभी-कभी तो स्त्री में यह समर्पण का भाव पूरे उत्साह के साथ रहता है जिसमें वह पति के साथ संबंध बनाते समय पूरा आनंद उठाती है परंतु कभी-कभी उसके लिए यह समर्पण मजबूरी बन जाता है जिसमें स्त्री हर प्रकार के आनंद से वंचित रहती है। इसलिए पुरुष को चाहिए कि जो चीज अपनी है ही उस पर जोर-जबर्दस्ती क्या करना। जब पत्नी अपने पति को हर प्रकार के सुख देने के लिए हर समय तैयार रहती है तो फिर पति अपनी पत्नी की इच्छाओं का ख्याल क्यों नहीं रखता।
महान लोगों के अनुसार पत्नी का तन तो हर समय पति के लिए तैयार रहता है लेकिन उसका मन जीतना पति के लिए आसान नहीं होता है। अगर पति अपनी पत्नी का तन प्राप्त करने से पहले उसका मन जीत ले तो इसके बाद पत्नी के द्वारा पति को मिलने वाले शारीरिक सुख का आनंद बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। ऐसे पुरुष बहुत ही कम होते हैं जो इस बात को जानते हैं कि पत्नी का तन जीतने के लिए पहले उसका मन जीतना जरूरी है। पत्नियां भी अपने पति से यही आशा करती हैं कि उनका पति उनके तन से पहले उनके मन पर कब्जा करे क्योंकि इससे वह अपने आपको संबंधों के लिए तैयार कर पाती है।
ऐसे पुरुष जो सिर्फ अपनी पत्नी का तन पाना चाहते हैं उनकी अक्सर यह शिकायत रहती है कि सेक्स संबंध बनाते समय उनको पूरा आनंद प्राप्त नहीं होता। इसका कारण भी वह अक्सर अपनी पत्नियों को ही मानते हैं लेकिन वह नहीं जानते कि इसका कारण वह स्वयं ही है।
संतान न होने की स्थिति में पत्नी को दोष देना-
अक्सर शादी होने के कुछ समय के बाद ही ससुराल वाले बहू से अपेक्षा करने लग जाते हैं कि उनकी बहू जल्द ही उनको पोते-पोतियों की खुशखबरी सुनाएगी। शादी को पूरा 1 साल भी नहीं होता कि सब बहू को परेशान करने लगते हैं कि वह कब खुशखबरी सुनाएगी। लेकिन जब बहू उनका यह सपना पूरा नहीं करती तो सब मिलकर बहू को दोष देने लगते हैं। इतनी बातें तो शादी होने के 1 साल के अन्दर-अन्दर होने लगती हैं, लेकिन जब शादी को 3-4 साल बीत जाते हैं तो बहू को बांझ, बंजर जमीन आदि नामों से पुकारा जाने लगता है। घर में छोटी-छोटी बातों पर उसको धिक्कारा जाने लगता है। हद तो तब हो जाती है जब शादी के 6-7 सालों में जब बहू मां नहीं बन पाती तो घर वाले अपने लड़के की दूसरी शादी करवाने के लिए विचार करने लगते हैं। यही हालात तब पैदा हो जाते हैं जब लड़के की दूसरी पत्नी भी मां नहीं बन पाती और उसे भी यही सब सहना पड़ता है। लेकिन कोई लड़के की तरफ ध्यान नहीं देता कि लड़की अगर मां नहीं बन पा रही तो इसमें लड़के का दोष भी हो सकता है और उसकी भी जांच कराई जाए।
संतान न होना असल में ऐसी समस्या है जिसका सामना कर पाना पति और पत्नी दोनों के लिए ही बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए सबसे अच्छा रास्ता यही होता है कि संतान न होने की स्थिति में पति को अपनी पत्नी के साथ-साथ अपना भी चेकअप करवा लेना चाहिए। इससे अगर पत्नी के अंदर कोई समस्या न होकर पति के अंदर कोई समस्या हो तो उसको दूर किया जा सके।
लड़का न होने पर पत्नी को दोष देना-
हमारे समाज में आज भी बहुत सी जगहों पर लड़के-लड़की में काफी भेदभाव माना जाता है। ऐसे लोगों का मानना होता है कि अगर घर में लड़का पैदा नहीं होगा तो उनका वंश आगे नहीं बढ़ेगा। इसी
“धारणा” के अंतर्गत ऐसे लोग जब तक घर में लड़का पैदा नहीं होता तब तक अपने घर की बहू को बच्चे पैदा करने के लिए उकसाते रहते हैं चाहे लड़के के चक्कर में कितनी ही लड़कियां पैदा क्यों न हो जाएं। ऐसे लोग स्त्री की हालत नहीं देखते हैं कि उसका शरीर बच्चे पैदा करने में सक्षम है भी या नहीं। बहुत से ऐसे मामलों में लड़का पैदा करने के चक्कर में स्त्री की स्थिति इस मोड़ पर आ जाती है कि उस समय बच्चा होने पर या तो मां को बचा लिया जाए या फिर बच्चे को ही। इस तरह के मामलों में भी दोष स्त्री को ही दिया जाता है कि उसमें लड़का पैदा करने की क्षमता ही नहीं है। स्त्री को दिन-रात प्रताड़ित किया जाता है लड़का पैदा करने के लिए। ऐसे मामलों में हद तो तब हो जाती है जब खुद पति ही लड़का पैदा न होने का दोष अपनी पत्नी को ही देने लगता है। इस समय जब पत्नी को अपने पति का सहारा चाहिए होता है लेकिन पति ही उसे प्रताड़ित करे तो पत्नी का तो पूरा मनोबल टूटना स्वाभाविक है। आज के आधुनिक युग में लोगों की लड़के-लड़कियों के मामलों में ऐसी सोच रखना हमें दूसरे देशों के मुकाबले पिछड़ा साबित करती है। ऐसी सोच रखने वाले लोगों को यह समझाना बहुत जरूरी है कि गर्भ-में-लड़के-या-लड़की-का-पता-लगाना” यह निर्भर होता है पति और पत्नी दोनों के गुणसूत्रों पर। हर स्त्री-पुरूष की शरीर रचना में 46 गुणसूत्र काफी महत्वपूर्ण होते हैं। पुरुष के
“शुक्राणु” तथा स्त्री के रज (अंडाणु) में एक-एक केंद्रक होता है। हर केंद्रक में 46 गुण सूत्रों में से 23 गुणसूत्र प्रजनन”
प्रजनन की क्षमता रखने वाले होते हैं। स्त्री-पुरुष के 23-23 गुणसूत्रों के योग से प्रजनन क्रिया सम्पन्न होती है। पुरुष के 22+एक्स अथवा 22+वाई और स्त्री के 22+एक्स तथा 22+एक्स के आपस में मिलने से स्त्री को गर्भ ठहरता है। लड़का या लड़की होने का निर्धारण (लड़का होना है या लड़की) पुरुष के एक्स-वाई तथा स्त्री के एक्स-एक्स के आपस में मिलने से होता है। अगर पुरुष का एक्स गुण सूत्र स्त्री के एक्स गुण सूत्र के साथ मिलता है तो स्त्री के गर्भ में लड़की ठहरती है और अगर पुरुष का वाई गुण सूत्र स्त्री के एक्स गुण सूत्र के साथ मिलता है तो स्त्री के गर्भ में लड़का ठहरता है। इसलिए अगर स्त्री के सिर्फ लड़की पैदा होती है तो इसका दोष स्त्री को देना बिल्कुल सही नहीं है क्योंकि स्त्री के तो एक्स-एक्स गुणसूत्र होते हैं जबकि पुरुष के एक्स-वाई गुण सूत्र होते हैं। लड़का पैदा करने के लिए स्त्री के एक्स गुण सूत्र का पुरुष के वाई गुणसूत्र से मिलना जरूरी होता है लेकिन अगर स्त्री के एक्स गुणसूत्र के साथ पुरुष का भी एक्स गुणसूत्र मिलता है तो सिर्फ लड़की ही पैदा होती है। इसलिए जो लोग लड़कियां पैदा होने का दोष सिर्फ स्त्री को देते हैं उनके लिए यह जानना जरूरी है कि लड़का-लड़का पैदा करने के लिए मुख्य भूमिका पुरुष की ही होती है।
पत्नी को अपने हर सुख-दुख में शामिल करें-
हर व्यक्ति के साथ सुख और दुख का बहुत ही गहरा रिश्ता होता है। अपनी पूरी जिंदगी में हर इन्सान को इन सुख-दुखों से गुजरना पड़ता है। लेकिन जो इन्सान इन मुश्किल हालतों में भी डटकर खड़ा रहता है वह ही अपनी इन समस्याओं से मुक्ति पा लेता है। विद्वानों का यह कहना है कि अगर सुख को किसी और के साथ बांट लिया जाए तो उसका मजा और भी बढ़ जाता है और अगर दुख को किसी और के साथ बांट लिया जाए तो वह कम हो जाता है। एक व्यक्ति के लिए सुख-दुख बांटने के लिए उसकी पत्नी से बढ़कर और दूसरा कोई साथी नहीं होता है क्योंकि एक पत्नी ही होती है जो पति के हर सुख हो या दुख उसमें उसके साथ खड़ी रहती है और उसे हौसला देती है। कई मामलों में तो पत्नी की एक सलाह ही पति को बहुत बड़ी परेशानियों को दूर कर देती है।
बहुत से व्यक्तियों के जीवन में जब भी कोई सुख या दुख के पल आते हैं तो वह व्यक्ति
शराब:- या दूसरे नशे में अपने सुख को बढ़ाना चाहता है या फिर उस नशे में डूबकर अपने गम को भुलाना चाहता है। ऐसे समय में अगर पत्नी को ही इन सुख और दुखों में शामिल किया जाए तो व्यक्ति को किसी तरह के नशे में डूबने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
पत्नी के सामने दूसरी स्त्रियों की प्रशंसा करना हर इंसान के अंदर श्रेष्ठता, हीनता और “जलन” जैसी भावनाएं हर समय मौजूद रहती हैं चाहे वह पति हो या पत्नी। अक्सर शादी के बाद पति अपनी पत्नी को अपने पहले अफेयर के बारे में बताता है। वह अपनी पत्नी की तुलना दूसरी लड़कियों से करने लगता है जोकि बिल्कुल ही ठीक नहीं है क्योंकि कोई भी पत्नी यह बर्दाश्त नहीं कर सकती कि उसका पति उसके सामने किसी दूसरी लड़की की प्रशंसा करे। इन बातों की वजह से कई बार पति और पत्नी के बीच में नौबत तलाक तक पहुंच जाती है। बहुत से पुरुष जो महिला साथियों के साथ काम करते हैं वह अक्सर शाम को आफिस आदि से आने के बाद अपनी पत्नी को उनकी बातें बताने लगते हैं, उनके रूप-रंग की तारीफ करने लगते हैं, आफिस में उनके द्वारा लाने वाले खाने के बारे में बताने लगते हैं कि वह कितना अच्छा खाना बनाती है लेकिन इन सबके बीच में वह यह नहीं सोचता कि अपनी जिस पत्नी को वह मजे ले-लेकर दूसरी लड़कियों के बारे में बता रहा है उसके दिल पर क्या बीत रही होगी। बहुत से पुरुष तो अपनी पत्नी के साथ सेक्स संबंध बनाते समय भी दूसरी लड़कियों की तारीफ करने से बाज नहीं आते हैं जिसका नतीजा यह होता है कि पत्नी को सेक्स संबंधों में किसी प्रकार का आनंद नहीं आता है। इन सबके कारण स्त्री कुछ ही समय में चिड़चिड़ी हो जाती है और छोटी-छोटी बातों पर लड़ने-झगड़ने लगती है। इन सबसे बचने का तरीका यही है कि पति को अपनी पत्नी के सामने दूसरी स्त्रियों की प्रशंसा नहीं करनी चाहिए, जहां तक हो सके अपनी पत्नी की ही ज्यादा से ज्यादा तारीफ करें।
शराब पीकर सेक्स करना- बहुत से सेक्स विद्वानों का मानना है कि सिर्फ सेक्स ही एक ऐसी क्रिया है जो पुरुष और स्त्री को एक-दूसरे के बिल्कुल तन और मन के करीब कर देती है। इसलिए सेक्स संबंधों का शादीशुदा जीवन में महत्व बढ़ जाता है। अगर स्त्री या पुरुष में से कोई भी अपने बीच में होने वाले सेक्स संबंधों से असंतुष्ट हैं तो वह दिमागी रूप से खुद को अस्वस्थ महसूस करते हैं। यह समस्या पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को ज्यादा परेशान करती है अर्थात ज्यादातर मामलों में स्त्री को सेक्स संबंधों में असंतुष्ट ही रहती है। पुरुषों के साथ चाहे किसी भी तरह की सेक्स संबंधी परेशानी हो उसका सबसे बुरा असर स्त्री पर ही पड़ता है। इसके अलावा जब कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ होता है, सेक्स संबंधों में पूरी तरह से सक्षम होता है लेकिन अगर शराब पीकर सेक्स संबंध बनाता है तो भी स्त्री इन संबंधों का पूरी तरह से आनंद नहीं उठा पाती। इन बातों को ज्यादातर पुरुष या तो समझते नहीं है या समझते हैं भी तो इसे अनदेखा कर देते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि पत्नी अपने तन से तो पति के नजदीक हो जाती है लेकिन मन से वह उससे दूर ही रहती है।
स्त्रियों को अक्सर शराब की दुर्गंध बर्दाश्त नहीं होती है इसी कारण जब पति शराब पीकर पत्नी के साथ संबंध बनाता है और पत्नी के साथ चुंबन आदि करता है तो उसकी सांसों में से आने वाली शराब की दुर्गंध के कारण पत्नी अपना चेहरा इधर-उधर घुमाने लगती है। उसकी कोशिश यही रहती है कि उसका पति उससे दूर ही रहे। शराब पीकर सेक्स संबंध बनाने वाले पुरुषों के लिए सेक्स संबंध सिर्फ सजा के तौर पर ही बनते हैं। कुछ समय के बाद ऐसे पतियों की पत्नियां अपने पति से कटी-कटी रहने लगती हैं, सेक्स के प्रति उनकी रुचि समाप्त होने लगती है। ऐसे लोगों का कहना होता है कि उनकी पत्नियां सेक्स संबंधों के समय उनके साथ किसी प्रकार का सहयोग नहीं करती। अगर किसी व्यक्ति को शराब पीने की बुरी लत लगी हो तो उसे चाहिए कि उसे जिस समय सेक्स संबंध बनाने हो उस समय शराब नहीं पीनी चाहिए। कई लोगों का यह भी मानना होता है कि शराब पीकर सेक्स संबंध बनाने से ज्यादा आनंद आता है लेकिन यह बात बिल्कुल गलत है। शराब पीकर सेक्स संबंध सिर्फ कुछ समय के लिए ही होते हैं उसके बाद पुरुष की सेक्स संबंध बनाने की क्षमता पहले से भी कम हो जाती है।
पत्नी के बीमार होने पर- अक्सर स्त्रियां घर के काम-काज के कारण या बच्चों आदि में पड़कर अपने स्वास्थ्य की तरफ ध्यान नहीं देती हैं। छोटी-मोटी बीमारियों की तो वे बिल्कुल ही परवाह नहीं करती और घर के कामकाज में ही लगी रहती हैं। ऐसे में पति का यह फर्ज बनता है कि वह अपनी पत्नी का ध्यान रखें। पत्नी को यदि कोई रोग हो तो उसकी पूरी देखभाल करने का जिम्मा उसके पति पर ही आ जाता है। अगर स्त्री संयुक्त परिवार में रहती है तो घर के दूसरे लोग उसका पूरा सहयोग करते हैं लेकिन दिक्कत तो तब आती है जब पति और पत्नी अकेले रहते हैं। ऐसे में पत्नी का अपने पति के अलावा देखभाल करने का कोई आसरा नहीं रह जाता।
बहुत से लोग ऐसे होते हैं कि उनको पत्नी की किसी तरह की रोग या परेशानी नजर ही नहीं आती। उसको समय पर खाना चाहिए होता है, समय पर धुले हुए कपड़े चाहिए होते हैं। अगर यह सब समय पर नहीं मिलता तो वह गुस्से में भर जाता है और पत्नी को बुरा-भला कहने लगता है। ऐसे में पत्नी अगर अपने पति को यह बताती है कि उसकी तबीयत खराब थी जिसके कारण वह घर का कामकाज नहीं कर पाती तब भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, वह उल्टा अपनी पत्नी से सहानुभूति जताने के बजाय उल्टा-सीधा बोलने लगता है। ऐसे पति यह नहीं देखते कि जब वह खुद बीमार होता है या घर का कोई और सदस्य बीमार होता है तो वही पत्नी अपना सब कुछ भूलकर उनकी देखभाल में लग जाती है। उस समय उसे अपने खाने-पीने का भी ध्यान नहीं रहता। ऐसा माना जाता है कि रोग के समय रोगी को जितना लाभ अपने परिजनों की सेवा सुश्रुषा, सहानुभूति और अपनेपन द्वारा मिलता है। इससे रोगी को मानसिक रूप से ताकत मिलती है, आशा जागती है, रोग दूर भागते हैं। रोग के समय जिस व्यक्ति की देखभाल ठीक तरह से नहीं हो पाती है वह जल्दी ठीक भी नहीं होता है। इसलिए हर पति का यह फर्ज होता है कि अगर उसकी पत्नी की तबीयत खराब है तो उसको अपनी पत्नी का पूरा ख्याल रखना चाहिए। इसके लिए अगर पति को अपने काम से छुट्टी लेकर भी अपनी पत्नी की देखभाल करनी पड़े तो उसे यह भी करना चाहिए।
गर्भावस्था में खास सावधानी- कोई भी स्त्री जब पहली बार गर्भवती होती है या ऐसी स्त्री जो शादी के काफी दिनों बाद गर्भवती हुई हो, दोनों ही स्थितियों में उसे खास देखभाल की जरूरत पड़ती है। इस समय बहुत सी स्त्रियां अंदर से डरी हुई होती हैं। ऐसी स्थिति में पुरुष पर दो तरह की जिम्मेदारियां आ जाती हैं। एक तो उसे अपनी पत्नी का पूरा ख्याल रखना पड़ता है और दूसरा खुद पर संयम रखना होता है। अक्सर
गर्भधारण के कुछ समय के बाद ही स्त्री की खुद के प्रति संवेदनशीलता कम रहती है जो गर्भ ठहरने के पांचवें महीने के बाद बढ़ने लगती है। इस समय तक स्त्री को अपने गर्भ में पल रहे बच्चे की उपस्थिति का साफ-साफ पता चलने लगता है। गर्भवती स्त्री को बच्चे का गर्भ में हाथ-पैर चलाना, करवट लेना आदि महसूस होने लगता है। इसी के साथ उसके भीतर मातृत्व की भावना भी जागने लगती है। यह स्थिति गर्भवती स्त्री के लिए विशेष महत्व की होती है, इसलिए उनकी देखभाल करने का दायित्व भी बढ़ जाता है। पुरुष को ऐसी अवस्था में पत्नी के साथ किसी भी प्रकार का बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका असर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी पड़ सकता है। इसलिए हर पति को चाहिए कि स्त्री की
गर्भावस्था में उसका पूरा ध्यान रखें, समय-समय पर उसको दवाईयां दें, उसको समय पर खाना खिलाएं। इससे पत्नी को मानसिक रूप से काफी सहारा मिलता है और वह एक नए जीव को जन्म देने के लिए तैयार हो जाती है
स्त्री के गर्भवती होते ही उसके पति के आत्मसंयम की परीक्षा चालू हो जाती है। इस समय उसके पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर एक तरह से प्रतिबंध लग जाता है। गर्भावस्था के समय के शुरुआती 2 महीनों में तथा आखिरी 2 महीनों में सेक्स करना बिल्कुल ही गलत माना जाता है। इसके अलावा बाकी महीनों में गर्भवती स्त्री के साथ सेक्स संबंध बनाए तो जा सकते हैं लेकिन बहुत ही सावधानी के साथ। कुछ पतियों के लिए इस स्थिति का सामना कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है उनके लिए इतने ज्यादा समय तक सेक्स से दूर रहना एक समस्या हो जाती है। कुछ पुरुष इससे बचने के लिए दूसरा रास्ता निकाल लेते हैं।
कुछ पुरुष हस्तमैथुन-तथा-गुदामैथुन” करने लगते है तो कुछ नवम-अध्याय-मुख-मैथुन” की तरफ अग्रसर होने लगते हैं। आमतौर पर स्त्रियां गुदामैथुन और मुखमैथुन को पसंद नहीं करती हैं लेकिन जब पुरुष जबर्दस्ती करता है तो वह मना ही नहीं कर पाती है। वह पुरुष को मनमानी तो करने देती है परंतु उसके मन की भावनाएं भी आहत होने लगती हैं। इसलिए ऐसे समय खुद पर काबू रखना बहुत ही जरूरी होता है।
घर का काम करने में पत्नी का हाथ बंटाना- अक्सर पत्नी को घर के कामकाज में, बच्चों को संभालने में, मेहमानों की आवभगत करने में इतनी शारीरिक और मानसिक थकान”
थकान हो जाती है जिसके कारण वह बीमार हो जाती है। ऐसे में स्त्री को महसूस होता है कि कोई ऐसा हो जो उसके कामकाज में थोड़ा हाथ बंटा लें ताकि उसे भी राहत मिले। ऐसे में पुरुष को चाहिए कि वह घर का कुछ काम अपने जिम्मे पर ले ले जिससे कि उसकी पत्नी को भी थोड़ा आराम मिल सके। आजकल ज्यादातर घरों में पति और पत्नी दोनों ही काम करते हैं इसलिए सुबह के काम पति और पत्नी को मिलकर ही करना चाहिए। इसमें चाय-नाश्ते से लेकर खाना बनाना तथा घर की साफ-सफाई शामिल होती है। पत्नी का हाथ बंटाते हुए कहीं भी हीनता का शिकार नहीं होना चाहिए। बहुत से पुरुष कुर्सी पर बैठे-बैठे,
चाय “चाय” पीते हुए, अखबार पढ़ते हुए काफी समय खराब कर देते हैं और फिर आफिस का समय होते ही वह अपनी पत्नी पर काम को जल्दी-जल्दी निपटाने के लिए चिल्लाने लगता है। पत्नी का तो सारा समय ही घर के छोटे-मोटे कामों को करने में ही निकल जाता है। इसलिए पति को खुद ही आगे आकर अपनी पत्नी का हाथ बंटाना चाहिए। पति अगर सारे कामों में पत्नी का हाथ नहीं बंटा सकता तो कुछ काम जैसे सुबह का नाश्ता बनाते समय पत्नी का हाथ बंटा देना, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना और भी कई छोटे-छोटे काम हैं जिनमें वह अपनी पत्नी का हाथ नहीं बंटा सकता है। ऐसा करने से पत्नी के सारे काम जल्दी ही निपट जाते हैं और उसे किसी तरह की शारीरिक और
मानसिक-दु:ख” मानसिक परेशानियां भी नहीं होती।

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