रिश्तों की नाजुकता को समझें, पति-पत्नी के मधुरतम संबंधों को

हमारे भारतीय परिवेश में पति-पत्नी के मधुरतम संबंधों की भांति पत्नी के मायके से यानी दामाद का अपने ससुराल से मनमोहक आकर्षण रहा है, खासकर अपने साले-सालियों से संबंध। मानव के सभ्य होने के बाद उसके व्यक्तिगत जीवन में यह संबंध रोचकता लिए उभरा और इसका आकर्षण आज तक बदस्तूर गुनगुनाता, खिलखिलाता चला आ रहा है।
नये-नये शादी शुदा दंपतियों में नये-नवेले दुल्हों का झुकाव ज्यादातर साले-सालियों में होता है। चंद हंसी-मजाक, लुभावना आतिथ्य पति पर गहरा अक्स खींच देता है। उसे लगने लगता है मानो ये सब नदी की चंचल लहरों से हवाओं की छेड़छाड़ जैसा है। शादी के बाद अक्सर देखा गया है कि पुरूष मित्र अपने दोस्तों से पूछ बैठते हैं कहो यार, तुम्हारा ससुराल कैसा है? कितनी सालियां हैं और कितने साले?
अगर ससुराल में सालियां अधिक हैं और सुन्दर भी हों तो फिर दोस्त लोग दूल्हों को बार-बार बधाई देंगे और नये मिलने वालों से भी इसकी चर्चा करेंगे। जाहिर है यह सब सुनकर दूल्हों का सीना कुछ इंच और फूल जायेगा। संयोग से अगर किसी को ससुराल में सालियंा न मिलीं तो उसको ससुराल उतना नहीं भायेगा जितना उसके सालियों वाले दोस्तों को भाता है।
ऐसा ही कुछ मानसिक प्रभाव पत्नियों का देवरों के प्रति होता है। इसके मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं जिसे मनोवैज्ञानिक दो विपरीत सेक्स का आकर्षण कहते हैं मगर हमारे भारतीय परिवेश में इन रिश्तों को पवित्र माना जाता है। हालांकि इन रिश्तों में वह पुरानी खुशबू आज भी है लेकिन फिर भी कहीं चूक होती जा रही है।
पति-पत्नी के आपकी संबंधों में जब अचानक पता चले कि पति-पत्नी के अलगाव का कारण ‘सालीÓ बन गयी है, तब इस तरह के संबंध विचारणीय हो जाते हैं। आज ऐसे कई घर आपको अपने आस-पास मिल जायेंगे जहां तपेदिक की भांति यह बीमारी पल रही है।
मेरे पड़ोस की सीमा इसलिए पागल हो गयी क्योंकि उसके पति का संबंध अचानक अपनी साली से हो गया था। सीमा और उसके मां-बाप को इसका जब पता चला तब यह रिश्ता कुछ और ही रूप ले चुका था। अचानक सीमा की मां को पता चला कि छोटी बेटी नेहा मां बनने वाली है। तब सकते की हालत में कड़ाई से की गयी पूछताछ के बाद पता चला कि इसमें उसके बहनोई का हाथ है।
किसी तरह रातों-रात नेहा का चुपचाप एबार्शन करवाकर उसकी शादी कुछ ही दिनों के अन्दर दूसरी जगह कर दी गयी। इस बीच नेहा अपने बहनोई से मानसिक तौर पर भी जुड़ चुकी थी। वह अपने ससुराल और पति को न स्वीकार सकी और वापस मायके भाग आयी। इधर सीमा को अपने पति और बहन के विश्वासघात से तीव्र मानसिक झटका लगा और वह पागल हो गयी। पागलपन की ही स्थिति में वह छत से कूद पड़ी थी मगर बचा ली गयी।
यहां सवाल यह पैदा होता है कि आखिर ऐसे पवित्र और खूबसूरत रिश्ते अचानक इतने विकृत और बदसूरत क्यों हो जाते हैं? इनकी भावनाओं की नदी में कब और कैसे ‘सेक्सÓ के कीटाणु घुस पड़ते हैं। आज इस तरह के संबंधों की बढ़ोत्तरी सम्पूर्ण सामाजिक सोच पर सवाल खड़ा करती है।
सर्वप्रथम हमें उन कारणों को ढूंढना  है जिससे यह स्थितियां जन्म लेती हैं। अगर दुर्भाग्यवश ऐसी स्थितियां परिपक्व हो चुकी हों तो सर्वप्रथम पत्नी को चाहिए कि वह ऐसी स्थितियों को भांप कर क्रोध, व्यथा में मानसिक संतुलन न खो कर शांत और संयमित व्यवहार से कोई कारगर कदम उठाये। अक्सर ऐसा होता है कि औरतें भ्रमवश भी शक का शिकार होकर अपना जीवन तबाह कर लेती हैं। ऐसी औरतें या तो हीनता की शिकार होती हैं या उनकी मानसिक विचारधारा काफी संकीर्ण होती है।
यही अवस्था पति यानी पुरूषों के साथ भी है। इनमें भी दो तरह की मानसिकता वाले पुरूष प्राय: पति बनने के बाद उभरकर आते हैं। जो व्यक्ति जन्म से ही उच्छृंखल होते हैं, वे कभी वफादार पति जैसे एकल और सीमित मान्यता प्राप्त संस्कारों को नहीं मान सकते। उनकी स्वछंद इन्द्रियों में पत्नी और ‘सालीÓ में एक सा ही आकर्षण और चाहत महसूस होगी।
ऐसे पुरूष सिर्फ व्यवहारिकता में जीने वाले होते हैं। उनके लिए ऐसे संबंध सुविधा से ज्यादा कुछ नहीं हैं। दूसरे प्रकार के पुरूषों में घरेलू पुरूष आते हैं जो समाज और लोगों में पत्नी-भक्त के नाम से मशहूर होते हैं मगर देखा जाय तो पत्नी से डरने वाले ऐसे पुरूष अपने व्यक्तित्व को लेकर अन्दर से काफी कुंठाग्रस्त होते हैं। ऐसे लोगों में बड़ी उम्र के पुरूष भी आते हैं।
उनकी सोच अचानक स्थूल और बड़ी उम्र की पत्नी के स्थान पर अपनी  चुलबुली साली की ओर मुड़ पड़ती है। ऐसी औरतें इस स्थिति को तुरंत भाप लेती हैं। या तो वे अपने पति को डांटती हैं या फिर अपनी बहन को हमेशा के लिए घर भेज देती हैं। ऐसी पत्नी द्वारा तिरस्कृत पुरूष अक्सर रास्ते में आते-जाते औरतों या लड़कियों को घूरते या अपनी पत्नी को ‘दीदी’ संबोधन देने वाली पड़ोसन को तुरंत साली का रिश्ता बना, वक्त बेवक्त मजाक करने से नहीं चूकते।
आमतौर पर हम साली और बहनोई के सामान्य संबंधों की अपेक्षा असामान्य संबंधों पर अगर गौर करें तो ये सवाल आपको खुद हल होते नजर आयेंगे कि ऐसे संबंध कब विकृत बनते हैं? आमतौर पर इसके जिम्मेदार पुरूष ही होते हैं क्योंकि उनकी उम्र और अनुभव की बजाय सालियां अनुभवहीन और छोटी उम्र की होती हैं। बाद में मज़ाक सिर्फ साधारण शब्दों का मजाक नहीं रह जाता। बहुत सी लड़कियां बहनोई द्वारा की गयी हरकतों का जिक्र शुरू में संकोचवश बहन से नहीं कर पाती जो बाद में किसी भूल का कारण भी बन जाता है।
ऐसी घटनाओं को प्रोत्साहित करने वाले प्राय: पुरूष ही होते हैं। पतियों को चाहिए कि वे अपनी गलती के लिए पत्नी से क्षमा मांगें नहीं तो उनकी विवेकहीनता के कारण कई जिंदगियां एक साथ तबाह होंगी और बच्चों पर इसका बुरा असर पड़ेगा। (उर्वशी)

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