प्यार के नाम पर धब्बा है लिव इन रिलेशनशिप

आज के भौतिकवादी युग ने स्त्री-पुरूष के आपसी रिश्ते को काफी प्रभावित किया है। पहले स्त्री-पुरूष का दांपत्य जीवन विवाह के बाद ही शुरु हो पाता था पर आधुनिकता की दौड़ में अब बिना विवाह किए भी साथ-साथ पति-पत्नी के समान एक साथ रहने का रिवाज-सा बनता जा रहा है जिसे ‘लिविंग टुगेदर’ का नाम दिया गया है।
‘लिविंग टुगेदर’ अर्थात् दांपत्यहीन सहवास स्त्री-पुरूष की शारीरिक भूख को मिटाते रहने का एक अच्छा तरीका माना जाने लगा है। आधुनिकता का दम भरने वाले कुछ आजाद प्रवृत्ति के लोगों का यह मानना है कि बिना विवाह किए साथ-साथ रहकर जीवन के सुख-दुख को आपस में बांटने में हर्ज ही क्या है?
अनब्याहे बाशिंदों का तर्क है कि साथ-साथ रहकर वे जायजा ले लेते हैं कि विवाह के बाद आगे पटरी खाएगी कि नहीं? इनका यह भी मानना होता है कि जब तक चाहें साथ रहें और जब न चाहें तो साथ छोड़कर अलग रहने लगें। न ही कोई कानूनी झंझट और न ही समाज या अन्य लोगों का खौफ। शादी के बाद अगर पटरी नहीं खाती तो तलाक की समस्याओं के साथ ही ‘विवाहिता’ की मुहर लग जाती है परन्तु ‘लिविंग टुगेदर’ में ऐसी स्थिति नहीं आती। पति-पत्नी की तरह साथ-साथ रहकर सभी आनन्दों को भोगा जा सकता है और खटपट होते ही दूसरे साथी का चुनाव किया जा सकता है।
‘लिविंग टुगेदर’ की ‘थ्योरी’ और ‘प्रेक्टिकल’ में बहुत अंतर होता है। जितना सरल यह सब कहने में होता है, उतना सरल अनब्याहे बाशिंदों का जीवन नहीं होता। प्रारंभ में उन्माद और यौवन के जोश में आकर इस प्रकार की सहभागिता भले ही अच्छी लगती हो परन्तु रेत का बना घरौंदा कितने दिनों तक टिक सकता है?
समाज और लोगों की परवाह भले ही न की जाए परन्तु संतान होने के बाद तो समस्याएं अवश्य ही उठ खड़ी होती हैं। पुरूष की बेवफाई स्त्री को भारी पड़ सकती है। उस समय न तो कानून ही उसका साथ देगा और न समाज। विवाहविहीन सहवास को कानून अपराध मानता है। इस प्रकार के बच्चे को कानूनन नाजायज समझा जाता है और इस प्रकार से जन्मे बच्चे को भी कानून नाजायज करार ठहराकर कोई सहायता नहीं कर पाता है। ऐसे जोड़ों के बच्चे अपने अधिकार से वंचित और प्रताडि़त भी होते रहते हैं।
विवाहपूर्व एक साथ रहने पर यह आवश्यक नहीं होता कि स्त्री और पुरूष के संबंधों में प्रगाढ़ता हो ही जाय। पुरूष को विवाह के बाद स्त्री से जिस वस्तु को पाने की इच्छा बनी रहती है, वह तो उसे विवाह पूर्व भी मिल ही रही है। फिर वह उससे प्रगाढ़ता और लगाव लगाने की क्यों सोचे। पुरूष निरंतर यौन सुख पाता है परन्तु स्त्री के हाथ सब कुछ देकर भी लगती है, एक अतृप्त भावनात्मक एवं असुरक्षित विचलित मानसिक स्थिति।
‘लिविंग टुगेदर’ में नारी ही हमेशा छली जाती है:-  इस व्यवस्था में नारी ही हमेशा छली जाती है। वह स्थायित्व और निष्ठा की भीख मांगती है लेकिन ये दोनों ही वस्तुएं उसे नहीं मिलती। ‘लिविंग टुगेदर’ के सिद्धान्त को मानने वाले जोड़े शारीरिक संबंध बनाते समय अक्सर जन्मनिरोधक वस्तुओं को अपनाकर संतान पैदा करने से बचते रहते हैं। इसके पीछे पुरूष का यही उद्देश्य रहता है कि बच्चों के पैदा होने से इन्द्रिय सुख में व्यवधान पड़ जाएगा।
प्राय: ‘लिविंग टुगेदर’ के लिए लड़की ही अधिक उत्साहित दिखाई देती है। लड़की साथ रहने का उद्देश्य विवाह समझती है इसीलिये बार-बार अपने ब्वायफ्रेंड से शादी करने की बात पूछती रहती है। लड़का साथ तो रहना चाहता है परन्तु शादी करके माथे पर जंजाल नहीं लेना चाहता। वह हमेशा लड़की को गोल मटोल उत्तर देकर टालता रहता है और लड़की हतोत्साहित होती रहती है।
‘लिविंग टुगेदर’ का प्रमुख कारण विचारों की अपरिपक्वता, अनुभवहीनता या फिर हताशा ही होता है। जब ऐसा लगता है कि हमें कोई नहीं चाहता, उम्र ढल रही है, तभी किसी के साथ रहने की आवश्यकता महसूस होती है। किसी कार्यालय में साथ-साथ काम करने वाले सहकर्मी के साथ भी लड़की सुरक्षा के दृष्टिकोण से रहना चाहती है।
देहाकर्षण से खिंचकर बिना किसी उद्देश्य या निष्ठा के साथ-साथ रहना अपरिपक्वता ही होती है। एक-दूसरे को समझने में समय, त्याग और प्रयास का बड़ा हाथ होता है। जहां ‘सेक्स’ ही जीवन का लक्ष्य होता है, वहां अन्य अनुभव अथवा परिपक्वता की गुंजाइश कम रहती है। इसीलिए एक सामान्य और अनुभवजन्य जीवन के लिए ‘लिविंग टुगेदर’ से बचकर ही रहना चाहिए।
प्यार की शाश्वतता पर भरोसा नहीं रहता:- ‘लिविंग टुगेदर’ प्यार की डींगें तो बघारता है लेकिन प्यार की शाश्वतता पर वह भरोसा नहीं करता। जो रिश्ता अविश्वास पर टिका होता है वह कितने दिनों तक कायम रहने वाला होगा? विवाह जैसी सुख-सुविधा भोगना परन्तु जिम्मेदारियों से कतराना, ऐसा व्यवहार स्वस्थ समाज की संरचना नहीं कर सकता। बिना किसी दायित्व के लापरवाही के साथ इंद्रिय सुख भोगने के पागलपन को जीवन का सब-कुछ समझने के कारण ही आज विश्व के बहुत से देश सामाजिक व पारिवारिक अशांति की चपेट में हैं।
स्वच्छंदता बहुत जल्दी उबाऊ बन जाती है और अंतत: दिशाहीनता की स्थिति में पहुंचा देती है। तमाम रिश्तों को नकारते हुए ‘लिविंग टुगेदर’ की पद्धति हद दर्जे का खुदगर्ज और आत्मकेन्द्रित बनाने वाली होती है। विवाह अनुशासनपूर्वक जीने के आनंद मार्ग को खोलने वाली संस्था होती है। बंदिशों के कारण यह कुछ लोगों को बुरा अवश्य लग सकता है परन्तु इसके अच्छे परिणामों को कोई नकार नहीं सकता।
एक छत के नीचे हमबिस्तर, हमप्याला, हमनिवाला वाली जिंदगी यौवन में रोमांटिक तो बहुत लगती है पर ‘लिविंग टुगेदर’ की कोई प्रासंगिकता नजर नहीं आती। सच्चाई तो यह है कि यह एक वर्ग विशेष की विलासप्रियता व सेक्स स्वच्छंदता का प्रतीक है। यह एक भूल-भुलैया है जहां लाख सिर पटकने के बाद भी बाहर निकलने का रास्ता मुश्किल से ही मिलता है और वह भी यौवन के सभी तत्वों को लुटाने के बाद ही।……………….. (उर्वशी)

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