अमरनाथ-आस्था और प्राकृतिक सौन्दर्य का तालमेल है जहां

देवभूमि हिमालय सनातन संस्कृति का संदेश देने वाले अडिग विश्वास का प्रतीक है। पर्वत श्रृंखलाओं के बीच महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थान हैं। दिव्यधाम बाबा अमरनाथ की गुफा भी कश्मीर में पहलगांव से 48 किलोमीटर दूर 14 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित है। धार्मिक भावना को अतिरिक्त हिमाच्छादित पर्वत शिखर, कलकल करते झरनों, आकाश को चूमने का प्रयत्न करते उच्च पर्वत शिखरों के लुभावने दृश्यों का अवलोकन कर यात्री अनोखे सुख में खोने लगता है। साथ ही धर्म और सौंदर्य का मणि कांचन संयोग भी सबसे बड़ा आकर्षक है।
बाबा अमरनाथ गुफा की यात्र को छड़ी यात्रा भी कहते हैं। छड़ी से तात्पर्य बल्लम सहित लकड़ी, अथवा बांस की नुकीली छड़ी से है जिसे उठाए कश्मीरी महंत इस महान यात्रा का मार्गदर्शन करते हैं। यात्रा श्रीनगर के दशनामी अखाड़े से पूर्णिमा के दस दिन पूर्व आरंभ होती है। देश और विदेशों से मिलकर 4० हजार के करीब यात्री प्रत्येक वर्ष यहां पहुंचते हैं। अमरनाथ की गुफा के अभियान में एक अव्यक्त और अवर्णनीय आनंद निहित है। अंतरात्मा की कोई शक्ति निरंतर इस यात्र की प्रेरणा देती है। जीवन की पुकार की चरैवेति चरैवेति अर्थात चलना, चलते रहना है। पैदल चलने पर प्रकृति का प्यार मिलता है।
अमरनाथ जाने के लिए केवल एक पहाड़ी पगडंडी है। यात्री घोड़ों अथवा डांडी पर भी जाते हैं। वर्ष में एक बार अगस्त मास में अथवा श्रावण पूर्णिमा को यात्री हजारों मील तय करके देश के कोने-कोने से जम्मू पहुंचते हैं। जम्मू से यात्रा के लिए सैंकड़ों बसों को यात्रियों को पहलगाम तक पहुंचाने के लिए तैयार रखा जाता है। रक्षा बंधन के तीन दिन पूर्व से ही सारा पहलगाम, घोड़ों बंबुओं और अनेकानेक परिधानों से भरा रहता है। कई भाषा और कई प्रांत के यात्री यहां आकर विश्राम करते हैं और यात्रा का सामान खरीदते हैं। कंबल, टार्च, कपड़े के जूते और छड़ी तथा छतरी साथ में रखना जहां आवश्यक होता है वहीं आंखों को चकाचौंध से बचाने के लिए चश्मा लेना भी जरूरी है।
रात भर जागरण चलता रहता है। गीत-भजन होते हैं। श्रीनगर के दशनामी अखाड़े से छड़ी का जुलूस भी यहां पहुंच जाता है। सबसे आगे चांदी की छड़ी लेकर बड़े महंत सूर्योदय से पूर्व पहलगाव से बाबा अमरनाथ की जय जयकार करते हुए निकलते हैं और इस जुलूस के पीछे हजारों यात्री चलते हैं।
पहलगाव में अधिकांश यात्री शिविरों में ठहरते हैं। कई तरह के सस्ते होटल भी हैं। कुछ होटल तो केवल श्रावण महीने में ही खोले जाते हैं। पहलगाव एक रमणीक स्थान है।
रात्रि विश्राम के पश्चात प्रात: छड़ी यात्री का जुलूस अमरनाथ की जय जयकार करता निकल पड़ता है चंदनवाड़ी की ओर। चंदनवाड़ी तक तो मोटर, जीप अथवा टै्रक से भी जाने का मार्ग है लेकिन श्रावणी पूर्णिमा को जाने वाले यात्री पैदल जाना ही पसंद करते हैं।
घोड़े भी यहां सामान रखने और सवारी के लिए मिलते हैं। पिकनिक का आनंद लेने वाले यात्री एक घोड़े पर समान रखते हैं और दूसरे पर सवारी करते हैं। घोड़े वालों की यूनियन और उनका रेट भी निर्धारित है।
यात्रा का पहला पड़ाव चंदनवाड़ी है और यहां बहुत शानदार चांदनी रात होती है। कुछ विश्रामगृह और रोड भी सरकार ने बनाए हैं। यहां के घोड़ों पर दुकानें भी यात्र में जाती हैं और डॉक्टरों का प्रबंध भी रहता है।
चंदनवाड़ी में रात 4 बजे दशनामी अखाड़े में आरती-पूजा करके यात्री निकल पड़ते हैं शेषनाग झील की ओर। हमने भी उनका अनुसरण किया। यात्र के समय गुफाद्वार पर जाने का मार्ग वन वे कर दिया जाता है जिससे घोड़ों और पैदल चलते वालों को कोई अड़चन न हो।
शेषनाग सरोवर:- शेषनाग संसार के श्रेष्ठ सरोवरों में एक है। चारों ओर से हिममंडित पर्वतमालाएं खड़ी हैं। चरणों में कुंडली मारकर सर्प बैठा जैसा लगता हैं नीला शांत जल और उसपर बहुत हल्की बर्फ की परत। झील पर प्रतिबिम्ब पड़ रहा है ब्रहमा, विष्णु, महेश नामक पर्वत श्रेणियों का जो बर्फ के गहने पहने खड़े हैं। इस अलौकिक शाश्वत सौंदर्य की महिमा निराली है। कहते हैं कि भगवान शंकर ने अमरनाथ गुफा में जाने के पूर्व गले का नाग यहां प्रहरी बनाकर छोड़ दिया था जिससे आगे कोई न जा सके। यहां से वनस्पति का भी लोप होने लगता है।
प्रात: छड़ी की आरती में पहुंचे और वहां से चल दिए क्षितिज से उठते हुए बड़े लाल लाल गुब्बारे को देखते हुए। मार्ग सैंकड़ों फुट नीचे मटियाले सांप की तरह घाटियों में रेंगता सरकता चला आ रहा था। सामने की पहाड़ी का शिखर सिर पर अड़ा बिलकुल नजदीक दिखाई देता था। अब ऊपर पहुंचते हैं तो नीचे चल रहे यात्री चींटियों की कतार जैसे लगते हैं। जब हम महागुनस की सबसे ऊंची चोटी पर थे। नीचे उतरने लगे तो संकरी पहाड़ी, राह राह में धूप पड़े तुषार की छिटकती जोत, चमक गिरि श्रृंग की एक दरार से दूध की धार से उतरते पहाड़ी झरने, कहीं-कहीं पत्थरों को चूर-चूर कर कूद रहे थे। 
गुनस चोटी की ऊंचाई 435० मी है। सपाट चढ़ाई और आक्सीजन की कमी, कदम-कदम पर रूकना पड़ता है और फिर रपटीली उतराई घाटी में हमें बलपूर्वक नीचे की ओर चलना पड़ता है। फिसलते बर्फीले मार्ग से हम अब 13 किलोमीटर चलकर अंतिम पड़ाव पंच तारिणी पहुंच गए  थे।
पंचतारिणी प्रात: जब चले तो सूरज की किरणें शिखरों से अठखेलियां कर रही थी। हवा जरा तेज हो गई। यह दो गिरि श्रेणियों के बीच का रास्ता है। बादलों की दौड़, बिजली का चमकना प्रारंभ हो गया था। मार्ग तो दूर आगे चलते चलते हम स्वयं को भूलने लगते हैं। धीरे-धीरे ऊपर उठ रहे हैं। अगल बगल की पहाडिय़ां करीब खिसकती नजर आती हैं। फिर दूध की सफेद बर्फ पर तीखी चढ़ाई चढऩी पड़ी। सारा रास्ता पर्वतों को काट काटकर बनाया गया है। आगे पूरा मार्ग बर्फीला है। कहते हैं कि भैरवनाथ प्रहरी की तरह अमरनाथ गुफा के पूर्व में खड़े हैं।
छड़ी का जुलूस समाप्त होने लगा था। यात्री बिखर गए थे और कुछ गुफाद्वार के समीप ही बर्फ मिश्रित अमर गंगा के झरने के नीचे स्नान करने पहुंच रहे थे। बड़े महंतजी ने छड़ी को हिमालय के समीप रखकर पूजा आरंभ कर दी थी। बारी-बारी से दर्शनार्थी ऊपर चढ़ रहे थे। गुफाद्वार पर भीड़ थी। बाबा अमरनाथ की जय-जयकार से दसों दिशाएं गूंजने लगी। दो बजे तक पूजा कार्य चलता रहा। इसके तुरंत बाद यात्री वापस पंचतारिणी की तरफ लौटने लगे क्योंकि अमरनाथ में रात्रि बिताने के साधन नहीं हैं। वापा पंचतरिणी आकर ही विश्राम करना पड़ता है।
यह थी हमारी दिव्यधाम अमरनाथ की पावन यात्र। यहां केवल रक्षाबंधन को ही पूर्ण हिमलिंग के दर्शन होते हैं। गुफा में कहां से पानी टपकता है, कैसे बारह फुट का हिमलिंग वर्ष में केवल एक ही बार और एक ही तिथि को बनता है, यह अभी तक रहस्य ही रहा है और संसार के सबसे बड़े आश्चर्यों में से एक है। इसके बाद ही पार्वती और गणेश की हिम-कृतियां भी स्वयं बनती और पिघलती हैं। ……………(उर्वशी)

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One thought on “अमरनाथ-आस्था और प्राकृतिक सौन्दर्य का तालमेल है जहां

  • April 26, 2018 at 11:36 am
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    अमरनाथ-आस्था और प्राकृतिक सौन्दर्य का तालमेल है जहां

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