कहीं पति भारी तो कहीं पत्नी भारी

यूं तो अक्सर बड़े-बूढ़ों से हमने यही सुना है कि पति-पत्नी गाड़ी के दो पहिये हैं जिन पर जिंदगी की गाड़ी चलती है मगर यह तो बताया नहीं कि अगर एक पहिया साईकिल का हो और दूसरा स्कूटर का या एक गाड़ी का दूसरा बस का तो क्या हो? दोस्तो यहीं यह बात आती है ‘कहीं पति भारी तो कहीं पत्नी भारी।
8० प्रतिशत वैवाहिक संबंधों में हम पाते हैं कि यदि पत्नी सुशील, कर्मठ व अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग व संवेदनशील है और घर-बाहर की जिम्मेदारी, फिर बात चाहे काम की हो, गृहस्थी या रिश्तों की, हर कसौटी पर खरी हो, फिर भी इन सारे गुणों के बावजूद सब बातों को नजरअंदाज कर उस पर किसी न किसी बात को ढूंढ कर उंगली उठती ही रहती है चाहे वो फिर पति महाशय हों, सास-ससुर, जेठ, देवर, ननद या अन्य सगे संबंधी।
ऐसे में बेचारी पत्नी टूट कर, मन मसोस कर जिंदगी से हार मान कर रह जाती है। आखिर करे भी तो क्या करे? यहां उस की अच्छाई ही उस की दुश्मन है।
वहीं दूसरी ओर एक तेज़ तर्रार पत्नी जिसे सिर्फ ‘मैं प्यारा है, बाकी घर का कोई भी सदस्य चाहे बड़ा हो या छोटा, उस की बला से। घर के चौके की तो बात ही मत करना, बड़ों का सम्मान व छोटों को प्यार किस चिडिय़ा का नाम है, क्या पता। चाल-ढाल घमंड ऐसा जो सिर चढ़ कर बोले बस ‘मैं ही ‘मैं हूं।
ऐसे में पति महाशय खिसियाये से पानी भरते हैं। पत्नी को कुछ कहें तो एक टका-सा ज़वाब। मुझ से उम्मीद मत करना मैं दूसरी औरतों की तरह झुक जाऊंगी, मुझे आंख मत दिखाना। जब ये हाल पति देव का है तो डर के मारे सब घर वालों की घिग्गी बंद, कहीं हमें भी कुछ उल्टा-पुल्टा न सुनना पड़े। आखिर अपनी इज्जत कौन दाव पर रखें।
अब आप ही निर्णय लें इन दोनों परिस्थितियों में सही कौन गलत कौन?
यह ऐसा मापदंड है जिस का उत्तर देना इतना भी आसान नहीं क्योंकि दोनों परिस्थितियों में जिम्मेदार हम कहीं न कहीं स्वयं ही हैं।
यदि पहली स्थिति को देखें तो जान-बूझकर दु:ख दे रहे हैं और ठीक उसी प्रकार दूसरी स्थिति जान-बूझ कर सह रहे हैं।
एक जगह हम गुणों को स्वीकारना व मान देना नहीं चाहते, दूसरी जगह अवगुणों के आगे हमारा बस नहीं।
दोनों ही स्थितियां पराकाष्ठा की हैं। यदि रिश्तों को आत्मीयता, मधुरता, अपनेपन से सजाया व संवारा जाए तो शायद ऐसी कोई परिस्थिति जन्म ही न ले जहां आप को इस स्थिति से गुजरना पड़े ‘कहीं पति भारी तो कहीं पत्नी भारी।
जब हम विवाह के पवित्र बंधन में बंधते हैं तो प्यार के सात फेरों के साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ जाती है जिसे निभाना जितना पत्नी का फर्ज है उतना पति का भी क्योंकि एक पति ही वो शख्स है जिस के बंधन में बंधी वह सारे रिश्ते -नाते पीछे छोड़ आई है, यहां भी अगर उसे साथ न मिला, प्यार न मिला तो किस विश्वास से वह आगे बढ़ पाएगी। इसी प्रकार केवल पति की आशाएं व अपेक्षाए नहीं होती खुद को लेकर, अपने परिवार को लेकर बल्कि पत्नी की भी होती हैं, जिस का हाथ थाम वह चली आई सब कुछ पीछे छोड़ कर। जिम्मेदारी उस परिवार की भी है जहां वो बहू बन कर आई है।
सब का प्यार, सम्मान, विश्वास पा कर ही वह घर-परिवार के पौधे को सींच पाएगी क्योंकि अपने बाबुल का घर छोड़ अपने पिया के घर आई है कुछ सपने लिए, कुछ आशाएं लिए और अपने पति के प्यार से वंचित, घर में बड़ों के प्यार, छोटों के सम्मान से वंचित वह जाए भी तो अब कहां जाए। कुछ गलती तो नहीं कि उसने बहू बन कर। ऐसे में जिंदगी व रिश्ते सिर्फ एक औपचारिकता भर ही रह जाते हैं जिसे जिम्मेदारी समझ कर निभाया तो जा सकता है पर जिया नहीं जा सकता।
दूसरी ओर एक लड़की जब किसी के घर बहू बन कर आती है तो आज़ाद ख्याल पसंद ज्यादातर लड़कियों की कोशिश यही रहती है कि अलग घर बसाएं, जिंदगी अपने अंदाज से जियें न कोई रोक-टोक हो, न कोई जिम्मेदारी बस एक आजाद जिंदगी ‘हम और तुमÓ, बस ‘तुम और हम।
ऐसे में यदि लड़का हंसी खुशी राज़ी हो जाए तो दोनों हाथ में लड्डू और यदि नहीं तो घर का माहौल हर पल ऐसा मानो जंग का मैदान हो-बात-बात पर पति से तूं-तूं मैं-मैं, सास-ससुर, ननद-ननदोई, भाई-बहन किसी से बात करना न गंवारा, न बड़ों का मान न छोटों को दुलार, बस माथे पर हमेशा बल, बात-बात पर तेवर, तुनकना, मनमानी, न घर का कुछ ख्याल न रिश्तों का सम्मान।
आखिर ऐसे में परिवार वालों से क्या गलती हो गई जो एक लड़की को सर्वगुण संपन्न, पढ़ी-लिखी जान अपने घर की बहू की चाहत में ब्याह कर ले आए। शादी क्या हुई भैय्या, न घर के रहे न घाट के।
यही स्थितियां हैं जो धीरे-धीरे बढ़ते-बढ़ते इतनी बढ़ चुकी हैं कि शादी से पहले तलाक का नाम आने लगा है। शादी हुई नहीं….. बस तलाक।
आज की युवा पीढ़ी को कौन समझाए कि रिश्तों की समझ, प्यार, अपनापन, आदर सम्मान से सीख और समझ बड़ी से बड़ी डिग्री या नौकरी नहीं दे सकती। यह आप को खुद पाना, समझना और देना होगा नहीं तो यूं ही घर बसने से पहले उजड़ते रहेंगे, रिश्ते बनने से पहले टूटते रहेंगे।
इसलिए आप सभी से यही गुज़ारिश है कि विवाह को परस्पर प्यार, माधुर्य व आत्मीयता से सजाएं संवारें। एक सूत्र में सभी रिश्तों को पिरो कर संजोएं न कि उसे ‘मैं’ के हथौड़े से लहूलुहान करें। ध्यान रहे गाड़ी वही सीधी सपाट चलेगी जिस के दोनों पहियों का नाप, भार हो एक समान न कि-
‘कहीं पति भारी तो कहीं पत्नी
पति-पत्नी साथ-साथ चलें, एक दूसरे को प्यार, सम्मान, अपनापन दें, तभी घर का हर सदस्य भी खुश रह सकेगा।………… (उर्वशी)

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One thought on “कहीं पति भारी तो कहीं पत्नी भारी

  • April 26, 2018 at 9:51 am
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    अगर एक पहिया साईकिल का हो और दूसरा स्कूटर का या एक गाड़ी का दूसरा बस का तो क्या हो? दोस्तो यहीं यह बात आती है ‘कहीं पति भारी तो कहीं पत्नी भारी।

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