जहां मानवता की शर्त पर पूरी होती हैं मुरादें

चमत्कारों की तमाम घटनाएं धर्म ग्रंथों में भरी पड़ी हैं। ये विषय हमें अवैज्ञानिक लगते हैं। हमारे गले नहीं उतरते हैं। अमूनन यह मानकर संतोष करना पड़ता है कि वे सतयुग, द्वापर त्रोतायुग की बातें हैं। अवतारों-पैगम्बरों व दरवेशों की बातें हैं। अब कलयुग है। फिर भी जेहन में एक सवाल कौंध जाता है कि आज चमत्कार क्यों नहीं होते ? उत्तर मिलता है-असत्य प्रबल है, सत्य निर्बल है, इसलिए। आज के दौर में भी यदा-कदा कुछेक चमत्कार होते हैं जिनका संतोष जनक जवाब वर्तमान के समृद्ध विज्ञान के पास तो कम से कम नहीं है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित शक्ति पीठों, साधना स्थलों पर अवाम का हजूम उमड़ता है। सुनने पढऩे को मिलता है कि यहाँ आकर लोग प्रेतबाधा, रोग, गृहबाधा, कंगाली आदि से मुक्त होते हैं। उनकी मन्नतें पूरी होती है। कईयों को पूर्व जन्म के संस्कारों या उनकी अपात्रता के चलते कुछ नहीं भी मिलता है। ऐसा ही एक शक्तिपीठ है उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जनपद में मां विंध्यवासिनी शक्तिपीठ।
शाहगंज रोड पर पूर्वांचल विवि. के पास से जंगीपुर खुर्द गांव को निकालने  वाले लिंक रोड पर शांतिनगर की मार्केट में स्थित है यह देवालय। देखने पर तनिक भी किसी धर्मस्थल का आभास नहीं होता। मंदिर के संस्थापक मुखिया, पुजारी हंसराज यादव जी को देखकर भी नहीं लगता कि वे हमारे-आपसे किंचित विशिष्ट हैं। साधारण से इंसान के रूप में सुलभ इनको व यहाँ के शक्तिपीठ को देखकर खास कुछ भी नहीं लगता। अव्वल तो उलटे पांव वापस आ जाने का जी करता है मगर इस रहस्यमय दुनियां का यथार्थ दृश्यभान स्वरूप से सर्वथा भिन्न है। बताते हैं कि यहां आकर कोई भी निराश नहीं लौटता। सारी मन्नतें पूरी होती हैं मगर मानवता की शर्त पर। इस दर पर शिरकत करने वाले को सदाचार, अपनत्व, नि:स्वार्थ प्रेम, ममता-समता संवेदना सरीखे मानवीय गुणों को अंगीकार करने और ईष्र्या, बैट, राग, द्वेष जैसे दुर्गुणों को त्यागने का सत्संकल्प लेना पड़ता है। यही और सिर्फ यही यहाँ का चढ़ावा है, दक्षिणा है।
पुजारी हंसराज जी इतने निरामय, निष्काम, निर्मल हैं कि चढ़ावे के नाम पर कुछ भी धन स्वीकारने की स्थिति में नहीं मिलते हैं। फीचर तैयार करने के लिए लेखक को फोटो लेने देना तक इन्हें गवारा नहीं हुआ। श्रद्धालु के न मानने अथवा दु:खी होने पर वे अगर उसकी इच्छानुसार कुछ स्वीकार करते भी हैं तो उसका संपर्क-सूत्र भी उन्हें रखना पड़ता है। उसके नाम पर समय-समय पर विशेष पूजा-अनुष्ठान करने और पत्र या फोन द्वारा यथा आवश्यकता उसे मार्गदर्शन देते रहने की उनकी मंशा रहती है। उनकी दृष्टि में जरूरी लगने पर असका प्रतिदान लौटा देने की मंशा भी रहती है।
जीवन की सार्थकता के संदर्भ में पूछने पर वे बताते हैं-‘हम जैसे हैं, वैसे नजर नहीं आना चाहते। हमें जैसा होना चाहिए, वैसा पाखंडमय स्वरूप धारण कर लेते हैं। अंदर से अपने को धोखा देते हैं और बाहर से दूसरों को। ओढ़ा हुआ यह आचरण संकट में डालता है। उस आचरण को खुद में बदलाव लाकर वास्तविक बनाना विकल्प है। अच्छा दिखने का पाखंड करने की बजाय अच्छा बनने में जीवन की सार्थकता है।
अच्छेपन की अवधारणा अथवा स्वरूप की प्रमाणिकता के बारे में जिज्ञासा व्यक्त करने पर वे बताते है व्यक्ति धन से प्रभावित होता-पटता है, नारी देह से या फिर खुशामद अथवां चापलूसी से। जो इस घिनौने तथ्य का अपवाद है वही मनुष्य है। वही प्रमाणिक चरित्र है। वे कहते हैं जिंदगी सेंसिटिविटी है, संवेदना शीलता है। जीवन भाषण, प्रवचन, लेखन का विशेषण नहीं क्रियाशीलता वन विज्ञान है। अस्तित्व सर्वत्र सर्वव्यापक है।
सामने वाले को अस्तित्व का अंग मानकर उसके प्रति संवेदना-सहानुभूति रखकर यथा संभव उसके हित चिंतन-कर्म में निरत रहना मनुष्यता का प्रथम कदम है। यही अंतिम कदम भी बन जाता है। ऐसे में विश्व ब्रह्मांड में व्याप्त देवीय शक्तियां आपको केंद्र बनायेगी। सत्यशील होने पर आप अपने भी पार उठ सकेंगे-बिओंड योर सेल्फ। तब घटित होता है परम। तब मिलती है वास्तविक-संतुलित सहजता, शांति, समृद्धि और परम तृप्ति। शक्ति पीठ अथवा सदगुरू मात्र माध्यम रहता है।
वे कहते हैं-सर्जना न प्रयोजन शून्य है और न इसमें कुछ कभी अकारण घटता है। अगर आपके जीवन में बुरा घट रहा है तो उसके पीछे विद्यमान कारणों का निवारण करना ही होगा। सदाचरण से रूपांतरण होता है और पात्रता मिलती है। पात्रता नसीब होने पर मंजिल स्वत: कदम चूमती नजर आती है।………………….  (उर्वशी)

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