बड़ा पवित्र रिश्ता है देवर – भाभी का

देवर भाभी का रिश्ता आदिकाल से चला आ रहा है। सामान्य तौर पर इसे हंसी-मजाक वाला रिश्ता ही माना जाता है परंतु अगर गहराई से देखा जाए तो इसके अंदर अनगिनत तथ्य छिपे होते हैं।
एक ओर देवर नई नवेली दुल्हन को भाभी के रूप में पाकर खुशी के मारे फूला नहीं समाता, वहीं दुल्हन को देवर के रूप में एक ऐसा व्यक्ति मिल जाता है जो उसके छोटे-मोटे कामों में सहयोग देकर खाली समय में मन बहलाने का साधन भी बनता है। जहां देवर भाभी से हंसी-मजाक में कुछ ऐसी समस्याओं को कह डालता है जो किसी दूसरे से कहने में संकोच हो, वहीं अगर भाभी एक सुलझे दिमाग की पढ़ी-लिखी नेक और ईमानदार औरत हो तो उसकी कितनी ही समस्याओं के समाधान में सहायता कर बुरी संगत में पड़ने से भी बचाती है तथा ऊंचा उठाती है।
देवर जब युवावस्था में प्रवेश करता है तो उसे एक ऐसी महिला की जरूरत महसूस होती है जिससे मजाक के रूप में अपने अरमानों को व्यक्त कर दिल का बोझ हल्का कर सके। ऐसे समय में अगर भाभी शरीफ औरत हो तो उस वक्त एक अच्छी भूमिका निभा सकती है और उसे ऊंच नीच का भेद समझाकर भावनाओं में बहकने भी नहीं देती। उसके लिए देवर ही घर का एक ऐसा सदस्य होता है जिस पर अपना प्रेम लुटाकर भाई को भाई से जोड़ कर रख सकती है।
मां के बाद भाभी ही घर की एक ऐसी औरत होती है जो परिवार को टूटने से बचा कर भाई को भाई का दुश्मन बनने से रोक सकती है। देवर-भाभी का रिश्ता गंगाजल की धारा सा पवित्रा होता है। अगर भाभी एक शरीफ और पढ़ी-लिखी नेक ईमानदार औरत है और देवर की नीयत में भी खोट न हो तो ऐसा परिवार कभी नहीं टूटता। सही अर्थों में देवर भाभी का रिश्ता परिवार को एकजुट बनाए रखने में पुल का काम करता है बस! जरूरत है इस बात को समझने की जिससे आज का परिवार टूटने से बच सके।
—— (उर्वशी)
——- तारकेश्वर कुमार बरनाल

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